सोमवार, 28 जनवरी 2013

पुनीत बिसारिया का आलेख - दलित साहित्‍य : कितना दालित्‍य, कितना लालित्‍य!

दलित साहित्‍य : कितना दालित्‍य, कितना लालित्‍य!

डॉ0 पुनीत बिसारिया

बीते कुछ सालों से हिन्‍दी जगत में दलित विमर्श एक बड़ी आहट के रूप में हमारे सामने उपस्‍थित हुआ है। वास्‍तव में बीसवीं शताब्‍दी के ढलते हुए वर्षों में यह आहट मराठी से होते हुए हिन्‍दी साहित्‍य में प्रविष्‍ट हुई और देखते ही देखते इसने एक विमर्श का रूप ले लिया। इसने आते ही साहित्‍य जगत में उथल-पुथल मचा दी क्‍योंकि इसने पूर्व परंपरा को नकारते हुए हमारी अपनी परंपरा के मूल्‍य को अधिक महत्‍वपूर्ण माना, जिससे स्‍वानुभूति बनाम समानुभूति या सहानुभूति जैसे बुनियादी सवाल आए। ऐसे सवालों से ब्‍लैक लिटरेचर तथा नीग्रो लिटरेचर एवं अन्‍य भाषाओं के साहित्‍य पहले ही दो चार हो चुके थे लेकिन हिन्‍दी साहित्‍य में यह विमर्श इसलिए भी विवाद का विषय बन गया क्‍योंकि हिन्‍दी में गैर दलित लेखकों ने भी उत्‍कृष्‍ट दलित व्‍यथा का साहित्‍य लिखा है। फिर परंपरा के नकार से साहित्‍य को वे जड़ें नहीं मिल सकतीं, जिनकी आवश्‍यकता एक नवोदित विमर्श के लिए अपरिहार्य है।

शुक्रवार' पत्रिका की साहित्‍य वार्षिकी में अभी हाल में लेखन में आरक्षण' शीर्षक से एक बहस चलाई गई है, जिसमें स्‍पष्‍ट तौर पर दो खेमे दिखाई पड़ते हैं। एक खेमा गैर दलितों का है, जो यह मानता है कि साहित्‍य इस सिद्धांत को स्‍वीकार नहीं कर सकता कि भोगा हुआ यथार्थ ही लेखन को प्रामाणिकता दे सकता है, अनुभूत नहीं। इसके समर्थन में नामवर सिंह, मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, तुलसीराम, असगर वजाहत, विजय कुमार, वीरेंद्र यादव, अखिलेश, सविता सिंह, प्रियदर्शन आदि न अपने विचार रखे हैं तो विरोध में अनिता भारती का साक्षात्‍कार है। मुझे व्‍यक्‍तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि दलित विमर्श के बहाने जब हम दलित साहित्‍य पर बात करते हैं तो शायद कहीं न कहीं अपने लक्ष्‍य से भटक जाते हैं। आज आवश्‍यकता इस बात की है कि दलित साहित्‍य तथा दलित विमर्श को दो भिन्‍न भिन्‍न संदभों में देखा जाए।

दलित विमर्श दलितों के ऐतिहासिक जीवन क्रम से सम्‍बन्‍धित है, जिसके अंतर्गत दलितों के प्रादुर्भाव, उनके ऊपर किए गए अत्‍याचारों एवं उनके उत्‍थान पर विचार किया जाना चाहिए और यह कार्य समाजशास्‍त्रीय दृष्‍टिकोण को ध्‍यान में रखकर किए जाने की आवश्‍यकता है, साहित्‍य भी अपनी ओर से उसे सहयोग दे सकता है लेकिन यह कार्य मूलतः समाजशास्‍त्रियों का है। दलित साहित्‍य से तात्‍पर्य दलितों द्वारा रचा साहित्‍य' न होकर दलित व्‍यथा की मौलिक प्रस्‍तुति होनी चाहिए वरना दलित साहित्‍य अनजाने में ही प्रेमचंद, फणीश्‍वरनाथ रेणु, अमृतलाल नागर प्रभृति असंख्‍य हिन्‍दी साहित्‍यकारों के दलित लेखन को खो देगा। प्रकारांतर से इसका नुकसान दलित साहित्‍य को ही होगा क्‍योंकि उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य का एक बड़ा अंश दलित स्‍वयं ही अपनी विरासत से दूर कर चुके होंगे। यह न साहित्‍य के लिए अच्‍छा होगा न समाज के लिए। डॉ0 वीरभारत तलवार ने भी कुछ ऐसा ही कहा है,“प्रेमचंद और निराला जैसे लेखकों के सहानुभूतिपरक साहित्‍य को आज के दलित साहित्‍य की सामान्‍य ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि का अंग समझना गलत न होगा। ध्‍यान रखना चाहिए कि सन 1927-28 के बाद प्रेमचंद और निराला ने या मुल्‍कराज आनंद ने दलितों के सवाल पर जो सहानुभूतिपरक साहित्‍य लिखा, उसके पीछे गाँधी जी का अछूतोद्धार आंदोलन नहीं, अम्‍बेडकर के दलित आंदोलन का भी दबाव और असर था।

दलितों द्वारा लिखे गए साहित्‍य में अनुभूति की प्रमाणिकता होती है, इस तथ्‍य से इन्‍कार नहीं किया जा सकता लेकिन भोगा हुआ यथार्थ सिर्फ' आत्‍मकथाओं तक ही लेखक की मदद कर सकता है, अन्‍य विधाओं के लिए तो देखा गया यथार्थ' के प्रस्‍तुतीकरण की भी ज़रूरत पड़ेगी। एक बात और कि प्रत्‍येक काला अक्षर' साहित्‍य नहीं हो सकता और न ही प्रत्‍येक व्‍यथा कथा' साहित्‍य हो सकती है, उसमें साहित्‍यिकता के महत्‍वपूर्ण अवयवों जैसे- अमूर्तता, संश्‍लिष्‍टता, सघना, ऐंद्रियिकता, शैलीगत विशिष्‍टता इत्‍यादि भी अपरिहार्य हैं। अतः मेरा अभिमत है कि साहित्‍य को वर्णवादी व्‍यवस्‍था के सांचे में बाँटकर देखने की प्रवृत्‍ति ही गलत है।

आप क्‍या सोचते हैं?

4 blogger-facebook:

  1. अभी सवर्ण-दलित हवा-पानी होना शेष है.

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  2. बेनामी8:20 am


    मेरा अभिमत है कि साहित्‍य को वर्णवादी व्‍यवस्‍था के सांचे में बाँटकर देखने की प्रवृत्‍ति ही गलत है।

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  3. सच मानिये दिल कांप उठता है ,हक़ नहीं मिलने का सच देखकर,आँखे पथरा जाती है,शदियों से यही हो रहा है,जीवित है संघर्ष की उर्जा,यही विजय पथ की ओर,बढ़ने की ललकार,जान गया है शोषक समाज
    ना कोई कराह तडपाये,दो कदम सही,समानता की राह चलकर दिखाए .........
    सर्व विदित है की आदमी को जाति के नाम पर बांटने की मंशा और आदमी को आदमी होने के सुख से वंचित रखे रहने की साजिश की उपज जातिवाद है .यही जातिवाद भारतीय समाज में निम्न वर्णिक समाज के पतन का कारण है .यक़ीनन वह कथाकार,कवि उस दर्द को पीया होगा उसकी रचना वास्तविकता के नजदीक होगी,सुने सुने और दूर से देखकर किया गया लेखन सटीक तो नहीं हो सकता परन्तु बहस में पड़ने का अब वक्त नहीं है .दलित साहित्य और गैर दलित साहित्य को गंगा के दोनों किनारे मानकर राष्ट्रहित और जन हित में लेखन करने का वक्त है जिससे इन्सानिय फलेफूले और मानवीय समानता का सामराज्य स्थापित हो यही साहित्यकार का उदेश्य होता है .इसी में साहित्य और समाज का भला भी है .....डाँ .नन्द लाल भारती 07.02.2013

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  4. सच मानिये दिल कांप उठता है
    हक़ नहीं मिलने का सच देखकर
    आँखे पथरा जाती है
    शदियों से यही हो रहा है
    जीवित है संघर्ष की उर्जा
    यही विजय पथ की ओर
    बढ़ने की ललकार
    जान गया है शोषक समाज
    ना कोई कराह तडपाये
    दो कदम सही
    समानता की राह चलकर दिखाए .........
    सर्व विदित है की आदमी को जाति के नाम पर बांटने की मंशा और आदमी को आदमी होने के सुख से वंचित रखे रहने की साजिश की उपज जातिवाद है .यही जातिवाद भारतीय समाज में निम्न वर्णिक समाज के पतन का कारण है .यक़ीनन वह कथाकार,कवि उस दर्द को पीया होगा उसकी रचना वास्तविकता के नजदीक होगी,सुने सुने और दूर से देखकर किया गया लेखन सटीक तो नहीं हो सकता परन्तु बहस में पड़ने का अब वक्त नहीं है .दलित साहित्य और गैर दलित साहित्य को गंगा के दोनों किनारे मानकर राष्ट्रहित और जन हित में लेखन करने का वक्त है जिससे इन्सानिय फलेफूले और मानवीय समानता का सामराज्य स्थापित हो यही साहित्यकार का उदेश्य होता है .इसी में साहित्य और समाज का भला भी है .....डाँ .नन्द लाल भारती 07.02.2013

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