गुरुवार, 24 जनवरी 2013

अरविन्‍द कुमार की कहानी - होर्डिंग पर स्त्री

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कहानी

होर्डिंग पर स्त्री

अरविन्‍द कुमार

बेशरमी की हद हो गई है। देखो कैसे चूम रही है ? एक आगे से एक पीछे से, एक दायें से, और एक बायें से। और कोई शरम नाम की चीज बची है इनके पास लगता है सबकी सब घोल़कर पी गयीं पेप्‍सी की तरह। नारीवादी संगठन मूकदर्शी बने हुए हैं। सब खुले आम हो रहा है- ऐसे सारे संगठनों को आग लगा देना चाहिए। अन्‍य कोई मामला होता है तो ये संगठन आसमान सिर पे उठा लेते हैं। सबके सब तमाशा देख रहें, और ये बड़ी राजनीतिज्ञ विधान सभा, नगर पालिका, संसद में महिला सांसद चुनी गई महिलाएं क्‍या कर रही हैं ?

अभी यदि कोई पुरूष लेखक महिलाओं के विरुद्ध लिख दे तो ये बड़ी महिला लेखिकायें उनके खि़लाफ़ हो हंगामा खड़ा कर देती है। आज कलम को पेपर से हटाकर मेज़ पर रख दिया। समझ में नहीं आता क्‍या करूँ ? वह साइकिल चलाता जा रहा था। होर्डिंग जो चौराहों पर लगी थीं उन पर उसकी नज़र पड़ती जाती थी। एक खामोशी‘‘ क्‍या हुआ ? आपका चेहरा लटका हुआ दिखाई पड़ रहा है।

''ऐसे ही।‘‘

''कुछ तो ?‘‘ रण्‍व ने पूछा।

साइकिल दोनों की पास ही होकर चल रही थी।

''जी में आता है शहर में लगी हुई सारी होर्डिंग पर जिन पर महिलाओं के चित्र बने हुए हैं। जलाकर ख़ाक कर दूँ।‘‘

''कहाँ․कहाँ तक जलाओगे भाई साहब- शुभम्‌।‘‘ वह भी शायद ऐसा ही कुछ सोच रहा था।

''यार, एक बात समझ में आ रही। इतने दिन हो गए है इस शहर में रहते हुए कई साल बीत गये हैं, पूरा शहर का चप्‍पा-चप्‍पा घूम चुका हूँ मुझे कहीं भी पुरूष कम कपड़ों में होर्डिंग पर दिखाई ही नहीं देता। वह तो पूरे कपड़ों में ही दिखाई पड़ता।‘‘

तभी अचानक रण्‍व ने होर्डिंग की तरफ इशारा करते हुए पूछा, ''सामने होर्डिंग देख रहे हो, आदमी को बाका़यादा सूट․बूट, टाई बेल्‍ट, पहनाकर चुस्‍त․दुरूस्‍त दिखाया गया है।‘‘

उसके मन में उबकाई सी आ गई, जब उसकी सामने लगी तस्‍वीर पर नज़र पड़ी। जाने कौन․कौन सी संस्‍कृतियों का पर्दापरण हो गया है। मुझे तो स्‍त्री․विमर्श के नाम पर मतली․सी होने लगती है, दलित․विमर्श के नाम पर तो चिढ़ होने लगी है कि कहते कुछ हैं करते कुछ है। जैसे ही वह बोलना बन्‍द करता है। यही सब फि़तूर उसके मन में आने लगता। रण्‍व कहां चुप रहने वाला था उसने टोक ही दिया।

''महाशय ! कहाँ खोए हुए हैं। ये बताइए, कौन सी संस्‍कृति चल रही है।‘‘

''सीधा सा उत्त्‍ार है - उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति।‘‘

''फिर काहे अपना मन खराब कर रहे है।‘‘

''मन खराब करने की बात नहीं है।‘‘

''इससे क्‍या निष्‍कर्ष निकाला।‘‘

''निष्‍कर्ष क्‍या रास्‍ते चलते निकाला जाता है।‘‘

''उसके लिए आपको क्‍या फाइव स्‍टार होटल चाहिए। जिसमें बैठकर निष्‍कर्ष निकालेगें․ मालूम है इसका क्‍या निष्‍कर्ष है ?‘‘

''मुझे नहीं मालूम।‘‘

''स्‍त्री․विमर्श चल रहा है और आप जो फुटपाथ गूदड़ में लिपटे आदमियों, आये दिन अखबारों में किसान की आत्‍म हत्‍या, किसी नारी की लुटती आबरू, दलित कही जाने वाली जातियों के जलते मकान, यह ताज़ा सबूत हैं कि ये सब दलित․विमर्श के अन्‍तर्गत ही है।‘‘

''होर्डिंग पर स्‍त्री․विमर्श।‘‘ ताज्‍़ज़ुब सा होता है उसे।

''और बताऊँ आपको इन कपड़ों में कितनी हॉट․हॉट लगती हैं वो उसका लुक भी अच्‍छा दिखेगा। इन कपड़ों में बाप भी देख कर शर्मायेंगे नहीं, यह ज्ञात होना चाहिए। आखिर वो ऊपर कैसे बढ़ेगीं ? कोई तो मंजिल पाने का रास्‍ता तय करना ही है।‘‘

''चुपकर !‘‘

''क्‍यों खीज लगती है ?‘‘ रण्‍व ने मेरे चेहरे की तरफ देखा। साइकिल हम दोनों की अपनी रफ़्तार से चलती जा रही थी, अपने गन्‍तव्‍य तक पहुँचने का समय एक घण्‍टा लगता। करीब 35 मिनट इसी समस्‍या को लेकर बीत गया। अब दोनों चुप थे। आगे क्‍या बात․चीत की जाए जिससे कि जो समय शेष बचा है उसका सदुपयोग किया जा सके। आखिर उसने पूछ ही लिया है।

''अब आपकी क्‍या राय है इन होर्डिंग पर ?‘‘

''यही की बाज़ार में माल बिकाऊ है जिस तरीके से खरीद पाएँ खरीद लीजिए। वरना कोई दूसरा बाज़ी मार ले जायेगा, आप हाथ मलते रह जायेगे।‘‘

''अब समझे आप शुभम्‌ जी।‘‘

दोनों हँसते हुए आगे․बढ़ते जा रहे थे․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․

2 blogger-facebook:

  1. आज के समय में सब चलता है ....
    सुंदर प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह एक विचार करने वाली बात है।
    बहुत अच्छी

    उत्तर देंहटाएं

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