सोमवार, 21 जनवरी 2013

सुरेश सर्वेद की कहानी - बंदी

बंदी

त्येन्द्र ने सुन रखा था कि पैदल यात्रा से शांति के साथ बड़ा पुण्य मिलता है.आवागमन के साधन होने के बावजूद वह ईश्वर - दर्शन के लिए पैदल ही निकल पड़ा कई दिनों चलने के बाद आखिरकार वह देवस्थान पर पहुंच गया.

देवस्थान का पुजारी अभी - अभी पट बंद कर रहा था.सत्येन्द्र ने उससे कहा - मैं ईश्वर का दर्शन करने आया हूं. मुझे ईश्वर का दर्शन करने दें...।

पुजारी ने साफ इंकारते हुए कहा - भइया, ईश्वर से मैं नहीं मिला सकता.यदि ईश्वर से मिलने लालायित हो तो मैनेजर से संपर्क करो.

- मैनेजर से क्यों संपर्क करुं ? ईश्वर का पुजारी तो तुम हो न ?

- पुजारी हूं तो क्या हुआ.यहां का सर्वेसर्वा ट्रस्ट का अध्यक्ष होता है.हम ठहरे कर्मचारी.यदि बिना अनुमति ईश्वर का दर्शन करा दिया तो मुझे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.तब तो तुम नहीं आओगे मेरे बाल - बच्चे के पेट पालने..।

सत्येन्द्र , मैनेजर के पास गया.मैनेजर ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा.उसके वेशभूषा को देखकर समझ गया कि यह फटेहाल है.सत्येन्द्र ने उसके समक्ष ईश्वर दर्शन की ईच्छा व्यक्त की . मैनेजर उसे देवस्थान के अध्यक्ष के समक्ष ले गया.अध्यक्ष ने सत्येन्द्र से पूछा -तुम्हारा परिचय, यदि ईश्वर का दर्शन करना चाहते हो तो चढ़ौत्री करने क्या लाये हो. हीरा - सोना - चांदी ?

सत्येन्द्र ने अपना रोना रोया. कहा - मैं एक छोटा कृषक हूं.मेरे पास थोड़ी सी जमीन है. मुश्किल से परिवार का भरण पोषण हो पाता है तब भला कहां से सोना - चांदी ला पाता.

- तब फिर क्यों समय बे समय पट खुलवाना चाहते हो. बेहतर है आमजन की तरह जब देवस्थान का पट खुलेगा, दर्शन कर लेना और चलता बनना.

- मैं ईश्वर के समक्ष कुछ क्षण बैठकर पूजा अर्चना करना चाहता हूं.

- खाली हाथ यह संभव नहीं है.

- मगर क्यों ?

- महज ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखने भर से हम यदि सबको ईश्वर के समक्ष बैठकर पूजा - अर्चना करने दिया तब तो आम और खास में अंतर ही क्या रह जायेगा.ईश्वर की पूजा कई प्रकार से की जाती है.यह पूजा सूची है.इसमें से तुम्हें कुछ न कुछ करना होगा तभी तुम ईश्वर के समक्ष जाकर पूजा पाठ कर सकते हो.

अध्यक्ष ने एक सूची दे दी.सत्येन्द्र ने सूची देखी.सूची देखकर सत्येन्द्र का गला सूख गया.बड़ी मुश्किल से थूंक निगल कर बोला - क्या ईश्वर के समक्ष बैठकर पूजा करना बिना खर्च के बिलकुल संभव नहीं ?

- हां...।

- मगर हमने जो सुन रखा था कि ईश्वर श्रद्धा से दर्शन देता है. जो कोई उसे मन से पूजता है ईश्वर उसे अपने पास बुला लेता है. अपने चरण कमल में स्थान दे देता है.ईश्वर को रुपये पैसे की आवश्यकता नहीं होती. स्वच्छ आत्मा और उसके प्रति निष्ठा ही बहुत है. क्या ये सारी बातें असत्य है ?

अध्यक्ष ने हंसकर कहा - असत्य, यह असत्य ही नहीं दिग्भ्रमित करने वाले वाक्य है.तुम्हारा भला इसी में है कि तुम व्यर्थ समय मत गंवाओं और हृदय की बात हृदय में रखकर आम जन की तरह दर्शन करो और चुपचाप चले जाओ..।

- ऐसे कैसे लौट जाऊं ! मैं ईश्वर के दर्शन करते हुए कुछ क्षण बिताने आया हूं.यह काम हुए बिना मेरा लौटना संभव नहीं.

- यह धाक कहीं और जमाना हम पर नहीं.हम तुम्हारी श्रद्धा और ईश्वर के प्रति तुम्हारे मन में महज सच्ची लगन के कारण ही नियम नहीं तोड़ सकते.

सत्येन्द्र परास्त नहीं हुआ.वह बाहर आ अनशन पर बैठ गया.

देवालय में स्थापित ईश्वर ने अध्यक्ष और सत्येन्द्र के मध्य हुए संवाद को सुन लिया.उसे यह अच्छी तरह ज्ञात था कि सत्येन्द्र उसका अनन्य भक्त है.और उसके भक्त का अपमान हुआ था.ईश्वर छटपटा उठा.पर उसका देवालय से बाहर निकलना मुश्किल था.दरबान थे. पुजारी थे.उनसे छिपकर निकलना आसान नहीं था.पर देखे द्य्श्य ने उसमें इतनी शक्ति भर दी थी कि वह बाहर निकलने लगा.जैसे ही उसने देवालय से निकलना चाहा कि अध्यक्ष उसके चरणों पर था.अध्यक्ष ने कहा - ईश्वर, आप ये अधर्म करने क्यों चले ?हमसे ऐसी क्या गलती हो गई कि आप उस भिखारी के पीछे जाने पर उतारुं हैं ?

- वह मेरा परम भक्त है और भक्तों से मिलना मेरा परम धर्म है .

- मैंने कब कहा कि भक्तों से भेंट न करें , पर ऐसे भक्तों से मिलने से क्या फायदा ? ये लोग तो अपने और अपने परिवार की देखभाल नहीं कर पाते.ये लोग दिन - रात मिट्टी से सने रहते हैं.बरसात के पानी की तरह इनके शरीर से पसीना टपकते रहता है जिससे दुर्गंध आती है.दिन - रात कमाकर भी ये भरपेट भोजन नहीं कर पाते.तब फिर इनसे भक्ति क्या होगी.ये काम चलाऊ भक्ति करके आपको प्रभावित करते रहते हैं ...। असली भक्त तो हम हैं.देखिए, आपके समक्ष कौन खड़ा है.यह वही व्यापारी है जिसने पांच टीन शुद्ध घी यज्ञ के अग्निकुंड में झोंक दिया था.यह अब उद्योगपति बन गया है.इसकी इच्छा आपके रहने के स्थान को सुन्दर और वैभवशाली बनाने का है.

ईश्वर पर अध्यक्ष की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.उसने कहा - इससे मुझे कोई सरोकार नहीं.मैं अपने उस दीन - हीन भक्त से मिलना चाहता हूं.

- आपकी यह इच्छा भी पूर्ण होगी मगर इस भक्त की इच्छा पूर्ण होने के बाद ही...।

ईश्वर ने अध्यक्ष का कहना मान लिया.उद्योगपति ने पूरे देवस्थान को संगमरमर से जड़वा दिया.वाकई देवस्थान का रुप ही बदल गया.उद्योगपति ने हीरे - जवाहरत जड़ित माला पहनाई.ईश्वर को इससे कोई मतलब नहीं था.वह तो उस भक्त से मिलने को अधीर था जो उसे आत्मा से मानता था.उसे सत्येन्द्र के पास जाने की जल्दी थी.उसने चौखट पर पैर रखा था कि अध्यक्ष जिन्न की तरह उपस्थित हुआ और ईश्वर के चरणों की वंदना करने लगा.

ईश्वर का यशगान हो रहा था मगर ईश्वर तटस्थ रहा.अध्यक्ष ने कहा - ईश्वर, हम आपको प्रसन्न रखने सदैव तत्पर रहते हैं पर आप हमसे नाराज रहते हैं.देखिए, आपके समक्ष कौन खड़ा है.

अध्यक्ष के संकेत की ओर ईश्वर ने द्य्ष्टि डाली.सामने सज्जन की तरह दिखने वाला एक व्यक्ति खड़ा था.उसके मुख पर शांति छाई हुई थी.वह मंद - मंद मुस्करा रहा था.

विगत माह से ईश्वर सुनते आया था कि कोई विशिष्ट व्यक्ति आने वाला है.समाचार पत्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन उसके आगमन का समाचार प्रतिदिन बिखेर रहे थे. ईश्वर समझ गया कि आगंतुक मंत्री है.

अध्यक्ष ने आगे कहा - ईश्वर, यह चढ़ौत्री करने एक लाख रुपये नकद लाया है.इसे स्वीकारिये और इसे मंत्री पद पर चिरस्थायी रहने का आर्शिवाद दीजिए. इसकी इच्छा है कि आप एक वर्ष तक इसका ही अन्न ग्रहण करें.सुबह - शाम छप्पन प्रकार के व्यंजन परोसे जायेंगे.

ईश्वर चुप रहा.इससे अध्यक्ष समझ गया कि ईश्वर ने स्वीकृति दे दी है.

जब भी धनी या नामी गिरामी व्यक्ति ईश्वर के पास आता.पूजा पाठ करता तो ईश्वर क्रोध से तमतमा जाता.उस पर पानी का छिंटा पड़ता तो वह कंपकंपा जाता.मेवा - मिष्ठान्न की सुगंध से उसे उबकाई आने लगती. गुंगुल - अगरबत्तियों के धुओं से उसका दम घुंटने लगता.न चाहते हुए भी उसे सब स्वीकारना पड़ रहा था.उस पर जबरदस्ती का राज किया जा रहा था.

आखिर जब सहनशक्ति ने जवाब दे दिया तब ईश्वर क्रांति पर उतर आया.उसके दरवाजा तोड़कर बाहर कदम रखते ही अध्यक्ष उसके समक्ष हाथ जोड़े खड़ा हो गया.उसे देख ईश्वर झल्लाया - क्यों, क्या और कोईविशिष्ट लोग आये हैं... ?

- नहीं...।

- फिर इस तरह हाथ जोड़ने का तात्पर्य ?

ईश्वर तमतमाया था.अध्यक्ष की आंखें डबडबा आयी थीं. ईश्वर का क्रोध शांत हो गया.धीरे से पूछा - सदैव प्रसन्न रहने वाले अध्यक्ष की आंखों में आंसू.. आखिर क्यों...?

- आप अपने भक्त सत्येन्द्र से मिलना चाहते थे न. आप तो सर्वज्ञाता कहलाते है पर क्या आपको यह मालूम है कि आपका परम भक्त अब आपसे कभी नहीं मिल सकते, कभी नहीं...? हां, बेचारे सत्येन्द्र ने आपसे भेंट करने की ठानी थी.इसलिए वह भूखा -प्यासा आपके इंतजार में बैठ गया.वह भूख - प्यास से मर गया पर आपने उसकी सुध लेने की आवश्यकता ही नहीं समझी.ऐसा क्यों.....?

सुनकर ईश्वर की सारी शक्ति क्षीण हो गई.वह जहां का तहां जड़वत् खड़ा रहा.उसे जोरदार झटका यह सोचकर लगा कि जिस अध्यक्ष के कारण वह सत्येन्द्र से नहीं मिल सका. उसे दर्शन नहीं दे सका वही प्रश्न कर रहा है.सारा दोष अध्यक्ष का है और पूरा दोषारोपण मुझ पर कर रहा है.उसे अनुभव हुआ - वास्तव में मैं न अंर्तयामी हूं, न भक्तवत्सल, न दीन हीनों का रक्षक. मैं तो एक बंदी हूं.... सिर्फ बंदी.. उसके सिवा कुछ नहीं....।

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सांई मंदिर के पीछे

वार्ड नं․ - 16, तुलसीपुर

राजनांदगांव छ․ग․

9424111060

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