सोमवार, 21 जनवरी 2013

बलबीर राणा "भैजी" की कविता - तृष्णा भरे जीवन की तृप्ति

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बलबीर राणा "भैजी"

Camoli Uttrakhand

तृष्णा भरे जीवन की तृप्ति

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उमड घुमड काले मेघों की
घोर गर्जना सुन प्यासा चातक
निराश की निन्द्रा से जागा
सचेत मन
प्यास व्याकुल
सूखी आँखे
काली घटाओं को निहारती फिरती
तरंगित शरीर आसमान में नाच उठा
आज इन्द्रदेव प्रसन्न होने वाले हैं
झमाझम बौछारें के साथ बरसने वाले हैं
कई दिनों की प्यास बुझने वाली है
मस्त मंगल चातक दल झूम उठा
ये क्या?
निरदयी पवन का झोंका आया
उग्र गति से बदलियों को उडा ले गया
आशाओं पर तुषारपात कर गया
ऐसे ही हवा इन चातकों के जीवन में
आती जाती क्षणिक जगी
आस को तोड जाती
फिर भी चातक दाना चुगना
बन्द नहीं करता
जीवन रूपी युद्ध से मुंह नहीं मोडता
आशा और उमंग से फिर
बादलों से भरे आसमान को निहारते हुए
तृष्णा भरे जीवन को
तृप्ति से जीता


..........बलबीर राणा "भैजी"

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