मंगलवार, 15 जनवरी 2013

पुस्तक समीक्षा - हंस के दोहे

पुस्तक-समीक्षा

दोहा के महत्व को पुनर्स्थापित करने का प्रयास : 'हंस के दोहे'

पुस्तक का नाम - 'हंस' के दोहे (दोहा संग्रह )

रचयिता - बाल कवि 'हंस'

समीक्षक - मनोज 'आजिज़'

प्रकाशक- भारतीय बाल साहित्य परिषद्, कदमा ,जमशेदपुर-05

मूल्य- 40

श्री हरे राम राय 'हंस' (बाल कवि  'हंस')जमशेदपुर के  (झारखण्ड) हिंदी और भोजपुरी के एक चर्चित कवि हैं। इन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में काफी कार्य किया है और भारतीय बाल साहित्य परिषद् के सचिव हैं। 

बाल कवि 'हंस' की सरस्वती बन्दना,मेरा घर आदि चर्चित रचनाएँ हैं। 'हंस' जी प्राचीन छंद के लेखन में काफी रूचि लेते हैं। इन्होंने भारी संख्या में दोहों,चौपाइओ और अन्य 

छंदों में रचनाएँ की हैं। 'हंस' के दोहे इनका नवीनतम दोहा संग्रह है जिसमें 144 दोहे शामिल हैं। इन दोहों का विषय घर-परिवार , वर्तमान ग्रामीण व शहरी परिवेश और आधुनिक विसंगतियां हैं। उदाहरण के रूप में ये दोहे देखे जा सकते हैं--

1. 'हंसा' है परदेश में जगे गाँव के प्रेत 

    धीरे-धीरे जोतते धरते मेरे खेत 

2. 'हंसा' पंडित आज के 'चन्दन टीका ज्ञान 

    वेद नहीं लवेद पढ़े रहे दान में ध्यान 

3. नेता करे घोटाले बंद,जाम हड़ताल 

   रोज कमा के खा रहे उसे न रोटी दाल 

4. 'हंसा' सुनिए ध्यान से राजनीति की रीति 

    धरम जाति की ओट में तोड़ो समता प्रीति 

इसकी प्रस्तावना में डॉ बच्चन पाठक 'सलिल' ने दोहा की उत्पत्ति और विकास की चर्चा करते हुए रहीम के उस दोहे का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है -- 'थोड़े शब्दों में दीर्घ अर्थ प्रदान करने वाला छंद दोहा ही है।'' डॉ 'सलिल' के अनुसार इन दोहों में विभिन्न विषय चर्चित हैं। साथ ही इस संग्रह में संग्रहित कुछ निर्गुणों का भी उल्लेख किया गया है। निर्गुण आत्मा को दुल्हन,परमात्मा को प्रियतम, संसार को फुलवारी आदि के प्रतीक दिए जाते हैं।

आज कविता के साथ खिलवाड़ हो रहा है। कविता चाहे छंद युक्त हो या मुक्त छंद में लिखी गयी हो किन्तु वह सार्थक होनी चाहिए और उसका कोई न कोई सन्देश होना चाहिए।

'हंस' के दोहे इस कसौटी पर संतोषप्रद प्रतीत होंगे । आज दोहा लेखन विलुप्त होता जा रहा है, वैसी अवस्था में 'हंस' जी का यह प्रयास सार्थक एवं प्रशंसनीय है। इस कृति का हिंदी जगत में स्वागत है।

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