रविवार, 27 जनवरी 2013

विजेंद्र शर्मा का आलेख - विवादों की जन्मस्थली ....जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

विवादों की जन्मस्थली ....जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

पिछले दो-तीन सालों से राजस्थान की राजधानी जयपुर में जनवरी माह में होने वाले जयपुर साहित्य उत्सव ने सुर्ख़ियों में बने रहने के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। गुलाबी नगरी में होने वाला ये आयोजन पहली बार ज़ियादा सुर्ख़ियों में तब आया जब इसके एक सेशन में अंग्रेजी के कुख्यात लेखक सुहेल सेठ मंच पर ही मदिरा सेवन करते हुए देखे गए। इस कु-कृत्य का विरोध होना जायज़ था और हुआ भी ,उत्सव में शाम को सजने वाली शराब से सराबोर महफ़िलों ने भी लोगों का ध्यान बड़ा आकर्षित किया। इस उत्सव के आयोजकों ने जैसे ही इसमें ग्लैमर का तड़का लगाया भीड़ के साथ–साथ प्रायोजक भी कतार में आकर खड़े होने लगे। मात्र दो–चार लाख के मामूली बजट से शुरू हुए इस मेले का बाज़ार आज करोड़ों तक पहुँच गया।

साहित्य के नाम पर होने वाले इस उत्सव को विश्व के नक्शे पर जगह दिलाने के लिए आयोजकों ने बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत जानबूझकर गत वर्ष सलमान रुश्दी का नाम उछाला। ये लोग जानते थे कि प्रशासन रुश्दी को यहाँ आने तो नहीं देगा मगर उसके नाम और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हम इस “जयपुर लिकर उत्सव “को मक़बूल (प्रसिद्ध ) ज़रूर कर देंगे। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आयोजक अपनी चाल में क़ामयाब हो गए , दो बेशर्म लेखक बड़ी बेहयाई के साथ सलमान रुश्दी की प्रतिबंधित किताब के अंश पढ़ गए और हमारा लचर निज़ाम लाचार खड़ा रहा। पूरे उत्सव के दौरान खुलेआम सिगरेट का धुंआ तमाम पाबंदियों के बावजूद भी वातावरण को प्रदूषित करता रहा और बहुत सी फ़िल्मी हस्तियों का साहित्य के प्रति दिखावटी लगाव देखने को मिला ख़ासकर “ बाबू जी ज़रा धीरे चलो “ जैसे आइटम गीत पर थिरकने वाली याना गुप्ता का साहित्य प्रेम।

डिग्गी पैलेस में होने वाले साहित्य के महाकुम्भ जैसे विशेषण से चर्चित कर दिए गए इस आयोजन से साहित्य का कोई भला होगा ऐसी उम्मीद इस साल भी नहीं थी। जानबूझकर इस बार भी विवादों के शामियाने डिग्गी पैलेस में लगाए गए। उन निर्लज्ज लेखकों को पुनः बुलाने की क्या ज़रुरत थी जिन्होंने पिछले साल रुश्दी की प्रतिबंधित पुस्तक के अंश पढ़े।

पाक सेना ने हमारे दो जवानो को सरहद पर बर्बरता से शहीद कर देती है और एक जवान का सर तक काट कर वे लोग ले जाते हैं ,पाकिस्तान की हुकूमत इस घिनौने कृत्य पर संवेदना तक प्रकट नहीं करती ,फिर क्या ज़रूरी था कि वहाँ के साहित्यकारों को यहाँ बुलाया जाए।

ये सब भी जानबूझ कर किया गया ताकि आयोजन को सुर्ख़ियों में जगह मिलती रहे। अगर भारतीय सेना ने पाक सेना के किसी जवान का यूँ सर काटा होता और ऐसा कोई आयोजन पाकिस्तान में होता तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि वहाँ से हमारे साहित्यकारों का कार्यक्रम में भाग लेना तो दूर उनका वापिस आना तक मुश्किल हो जाता। पंच सितारा होटल में बैठकर अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले लेखक आवाम के दर्द को कहाँ समझ सकते हैं।

अंग्रेजी साहित्य को विशेष तरजीह देने वाले इस उत्सव के आयोजकों ने हिंदी,उर्दू ,और यहाँ की एक-आध ज़ुबान के सेशन रखवा कर थोड़ी मेहरबानी ज़रूर कर दी। अदब के नाम पर होने वाले इस मनोरंजन उत्सव का जब-जब जिस किसी ने विरोध किया उन्हें आयोजकों ने अगली बार आमंत्रित कर लिया या एक आध सेशन में जगह दे दी। जो अख़बार इस मेले की कल तक मुखालफ़त कर रहे थे आज वे ही इसके मीडिया पार्टनर बने हुए हैं। कुछ स्थानीय साहित्यकार और स्वयम्भू साहित्यकार भी पिछले साल खुलेआम इस आयोजन के विरोध में थे मगर इसबार आयोजकों ने बड़ी चतुराई से इन्हें एक –आध सेशन का झुनझुना खेलने के लिए दे दिया और इन अदीबों को ऐसे लग रहा है जैसे इन्हें पदम् विभूषण मिल गया हो।

इस फेस्टिवल का पहला दिन ही एकबार फिर विवादों के साथ शुरू हुआ , आदरणीया महाश्वेता देवी जी ने जमकर नक्सलियों का दर्द लोगों से बांटा ,उन्होंने कहा कि नक्सलियों को सपने देखने का हक़ है काश महाश्वेता देवी जी को नक्सलियों के हाथों शहीद हुए जवानो के सपनों की भी फ़िक्र होती। क्या ज़रूरत थी साहित्य के नाम पर होने वाले उत्सव में इस तरह की बेहूदा बात करने की।

विज्ञापन जगत से फिल्मों में गीतकार हो गए प्रसून जोशी इस मेले के ब्रांड एम्बेसडरों में से एक हैं। प्रसून जी ने पता नहीं क्या सोचकर कहा कि भगवान् कृष्ण भी इव टीजर थे। बड़े अफ़सोस की बात है कि अपने आप को गीतकार कहने वाला कृष्ण के व्यापक दर्शन से ही नावाकिफ़ है समझ में नहीं आता कुछ हटकर बोलने के रौ में ये चमक –धमक वाले लोग इतनी बेतुकी बातें क्यूँ कह जाते हैं। जावेद अख्तर साहब ने भी कुछ हट कर कहने के चक्कर में यहाँ तक कह दिया कि “एक माँ बच्चे के सबसे क़रीब होती है , वही बच्चे को असली तालीम देती है , एक माँ को धर्म से दूर रहना चाहिए ताकि बच्चे को वो सही शिक्षा दे सके।””क्या धर्म किसी माँ को अपने बच्चे को सही तालीम देने से रोकता है ? इस बेतुके बयान का कोई सर पाँव नज़र नहीं आता।

जिस दिन ये मेला शुरू हुआ उस दिन राजस्थान के एक जाने-माने चैनल पर नीचे पट्टी पर ख़बर चल रही थी की प्रसून जोशी जयपुर पहुंचे ..मैरिट होटल में रुकेंगे ....क्या यही मेयार रह गया है ख़बर का ?

लाखों रुपये प्रसून जोशी , जावेद अख्तर , शबाना आज़मी और गुलज़ार साहब को आयोजकों ने शिरकत करने के दियें होंगे और सुना है कि गुलज़ार तो इस बार सिर्फ़ श्रोता का किरदार अदा करने आयें हैं ,यक़ीनन गुलज़ार साहब को श्रोता बनने की भी काफ़ी मोटी रकम मिली होगी।

एक तरफ़ एक सच्चा क़लमकार पैसों के अभाव में अपनी रचनाओं का अपनी डायरी में ही क़त्ल कर देता है दूसरी तरफ़ साहित्य के नाम पर होने वाले इस आयोजन में करोड़ों रुपये सिर्फ़ कुछ स्वयम्भू अदीबों के ठहरने और इनके आने की फीस में उड़ा दिए जाते है ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है।

मुझे तो क्या क़लम से सच्ची मुहब्बत करने वाला हर शख्स जयपुर के इस साहित्य उत्सव को अब यही समझने लगा है :--

जहां अदब के नाम पर , मौज मस्तियाँ जाम।

जयपुर में साहित्य का , कैसा है ये धाम।!

दो साल पहले जयपुर के एक प्रतिष्ठित साहित्यिक प्रकाशक ने दस साहित्यिक किताबों का मूल्य मात्र सौ रुपये रखा , साहित्य के क्षेत्र में ये एक क्रांतिकारी पहल थी , दस लेखकों का क़लाम बहुत से लोगों तक पहुंचा। अदब की दुनिया में ये क़दम एक साहसिक क़दम था और इसकी पज़ीराई भी बहुत हुई। उस वक़्त फेसबुक की वाल पर कुछ दोगले किस्म के अपने आप को अदीब कहने वाले लोगों ने बहुत कुछ लिखा। लेखक के हित का मुद्दा उन्होंने बड़े ज़ोर-शोर से उठाया मगर इस आयोजन के एक सेशन में जगह भर मिल जाने से यही लोग फूले नहीं समा रहें हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखनी के साथ होता हुआ भद्दा मज़ाक क्या इन्हें अब नज़र नहीं आता ? क़लम के इन नकली सिपाहियों को ये सब नज़र तो आता है मगर सुर्ख़ियों में बने रहने की चाह ने इन्हें शब्द के साधक से शब्द का सौदागर बना दिया है।

विवाद का कोई भी मौका ये फेस्टिवल अपने हाथ से जाने ही नहीं देता ,मेले के तीसरे दिन साहित्य के मंच पर ज़ात-पात पे उतर आये समाज शास्त्री आशीष नंदी को अचानक क्या हुआ कि उन्होंने यहाँ तक कह डाला की दलित और पिछड़े ज़ियादा भ्रष्टाचारी है। मीडिया की बदौलत जब ये बात फैली तो दस मिनट के अन्दर – अन्दर नंदी की गन्दी ज़ुबान एक दम पलट गयी वे अपने दिए बयान पर सफाई देने लगे। क्या पूरे मुल्क ने सुना नहीं वो बयान , पहले कहना फिर मुकर जाना ये सब क्या है :--

पहले बोले जोश में , गए बाद में नाट।

सरेआम नंदी गए , अपना थूका चाट।!

किसी साहित्यिक मंच पे ऐसी बहस का सबब समझ से परे है या फिर ये है कि लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का सारा ठेका “जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” के आयोजकों ने ले रखा है।

ऐसे बयान के बाद प्रशासन को चाहिए था की नंदी और आयोजकों को तुरंत गिरफ़्तार करते मगर इनके खिलाफ़ मुकद्दमा भी लोगों के दवाब के बाद दर्ज किया गया।

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा एक युवा लेखक की कहानी को ये कहकर लौटा दिया गया था की आप के अफ़साने में अश्लीलता बहुत है , साहित्य में ऐसी कहानी का कोई स्थान नहीं हो सकता और इधर जयपुर साहित्य उत्सव के आयोजकों ने उस अश्लील कथाकार गौरव सोलंकी को बाकायदा आने का न्योता दिया है। ऐसा लेखक नई नस्ल को क्या सिखाएगा , ज़हनी तौर से बीमार इस तरह के लेखकों का एहतराम करके आयोजक क्या साबित करना चाहते है।

अभी तक हुई इस मेले की तमाम कारगुजारियों को देखते हुए कहीं से भी नहीं लगता कि इस उत्सव में अदब का भला किसी भी ज़ाविये से हुआ है। अब तो ये सवाल उठता है कि इस आयोजन के साथ साहित्य का नाम क्यूँ चस्पा किया जा रहा है। भविष्य में अगर ये आयोजन हो तो “ जयपुर साहित्य उत्सव “ के नाम की जगह इसका नाम “जयपुर मनोरंजन महोत्सव “ कर देना चाहिए।

राजस्थान के साथ –साथ हिन्दोस्तान के तमाम अदीबों से मेरी गुज़ारिश है कि

अदब के नाम पर जयपुर में हर साल होने वाली इस नौटंकी पे लगाम लगनी चाहिए क़लम के सही मायने में पुजारियों को इस आयोजन का बहिष्कार करना चाहिए। सात से आठ करोड़ के बजट वाले इस आयोजन से आख़िर कुछ विवादों और आयोजकों की जेबों के भराव के अलावा क्या निकल कर आता है।

ऐसे आयोजन से अच्छी तो हमारी ग़रीब साहित्य अकादमियां हैं जो तंग-हालत में भी कम से कम सौ-दो सौ किताबों को छपवाने के लिए लेखकों को आर्थिक सहयोग देती हैं। हमारी अपनी तहज़ीब को मिटाने पे तुले इस “लिटरेचर उत्सव” में जगह पाकर धन्य हुए हिंदी, उर्दू ,राजस्थानी या अन्य हिन्दुस्तानी ज़ुबान के क़लमकार कभी ये क्यूँ नहीं सोचते कि अना नाम की भी कोई शैय होती है। जहां इनकी भाषा के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव हो वहाँ बैठकर ये लोग सांस कैसे ले लेते हैं।

इस नौटंकी के प्रायोजकों का जहां तक सवाल है उन्हें भी अपने फैसले पे एकबार फिर से गौर करना चाहिए। अगर कोई साहित्यिक संस्था इन लोगों के पास थोड़ी इमदाद के लिए जाती है तो इनकी नाक ,भोंहें सिकुड़ने लगती हैं मगर जयपुर की पवित्र धरा पर होने वाले इस मौज़-मस्ती के मेले के लिए लाखों रुपये देने के लिए इन प्रायोजकों में होड़ लगी रहती है।

साहित्य की आत्मा को चोट पहुंचाने के सिवाय इस उत्सव ने अगर किसी का भला किया है तो वो है जयपुर के होटल व्यवसाय का , बड़े- बड़े कारोबारियों का और आयोजकों का , ईश्वर करे जयपुर का नाम विश्व मान-चित्र में छाया रहे ,यहाँ का कारोबार फले-फूले मगर साहित्य के नाम का दुरूपयोग करके नहीं।

इसी विश्वास और उम्मीद के साथ कि आने वाले साल में अगर ये उत्सव हो तो विशुद्ध साहित्य का हो, अगर फिर इसी तरह का मेला लगना है तो इसके आयोजक मुस्तक़बिल में अदब के कांधों पे बन्दूकसाज़ी ना करें।

कविता है ज़ख़्मी यहाँ ,ग़ज़ल रही है कूक।

कांधे पर साहित्य के , चला रहे बन्दूक।!

विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

7 blogger-facebook:

  1. आपकी बात सही है लेकिन क्या तस्वीर बदलेगी? क्या ऐसे आयोजन बंद होंगे। मुझे तो नहीं लगता। साहित्य पर हावी लामबंदी ऐसे आयोजनों को ही बढ़ावा देगी।

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  2. सच क्या है अब ये रहने दो

    जैसे बहती है गंगा,बहने दो

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  3. vijendra sharma ji ne apne Qalam ke zariye jaipur sahitya utsav ki tasveer khinch kar rakh dee hai.pakistan ke sahityakaron ke baare me unhone jo kuch bhi likha hai sach par aadharit hai,pakistaniyo'n ko is mahol me nahi bulana chahiye tha jab unki fauj ne hamare do jawano ko bahut kayarta purwak halak kar diya,is silsiley me aek bat mai vijendra sharma ji ke madhyam se aap sab logo'n ko batana chahta hoo'n ki har sal''sarhado'n ke aage''ke nam se '''hello hindustan'''akhbar ke chief editor shri parveen sharma ji ne pakistani shaiero'n ko sirf is liye nahi bulaya ki pakistani sarkar ne ya waha'n ke shaiero'n adeebo'n ya press ne koi bhi apni galti sweekar nahi ki bulki ulte wo ilzam hamare desh par lagate rahe.mai shri parveen sharma ke is hausle ko apna salam pesh karta hoo'n, kyon ki hamare desh ko praveen sharma jaise sapooto'n ki zaroorat hai? vijendra sharma ji ne jis satya se parda uthaya hai bahut se log is aayojan ke baare me nahi jante they,ki waha'n is tarah ka kritya sahitya ke nam par ho raha hai,uska bahiskar hindustan ki sarkar aur sahitya karo'n ko karna chahiye,sahitya-kar aam insano'n se o'oncha hota hai uska ye chehra jaipur sahitya sammelan ke nam par bhai vijendra sharma ji ne apne lekh me dikhaya hai,jis ke liye hum sab unke aabhari hai'n.

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  4. http://www.facebook.com/photo.php?fbid=466331916748307&set=a.166294063418762.30803.100001145071296&type=1&theater vijendra sharma ji ''hello hindustan''ki ye khabar mere tippadi ke sath zaroor dene ki kripa karei'n.

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  5. आपने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के श्याम पक्ष से परिचित कराया--सच्चाई जानकार अफ़सोस हुआ ...एक भ्रम था मन में --जो टूट गया --आभार!!

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  6. आपने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के श्याम पक्ष से परिचित कराया--सच्चाई जानकार अफ़सोस हुआ ...एक भ्रम था मन में --जो टूट गया --आभार!!

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  7. Dwivedi D.S5:58 pm

    BHAI SHARMA JI BAHUT HEE SAMVEDANAA KE SATH SATY KO HUM TAK PANHUCHAYAA. AAP KO BAHUT-BAHUT DHANYAVAD

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