शनिवार, 26 जनवरी 2013

गोविन्द बैरवा की कहानी - शुरा

शुरा (कहानी)

- गोविन्‍द बैरवा

‘‘क्‍यों?,रे शुरा। आज मुँह लटकाए क्‍यों बैठा है।‘‘ सुदामा घर से बाहर निकलकर देखता है कि शुरा नाम का कुत्ता दोनों पैरों के बीच मुँह छुपाकर बैठा हुआ था। शुरा की नजर सिर्फ जमीन पर ही लगी हुई थी। सुदामा की आवाज को सुनकर एक बार सिर ऊँचा कर सुदामा को देखने के बाद फिर वहीं स्‍थिति में सिर नीचा कर खामोश स्‍थिति में बैठा नजर आया।

सुदामा व शुरा का संबंध वात्‍सल्‍य प्रेम से जुड़ा हुआ था। आखिर निसंतान सुदामा को शुरा रूप में वात्‍सल्‍य प्रेम का सरोवर मिला। शुरा व सुदामा का प्रेम रूपी सरोवर में स्‍वार्थ, ईर्ष्‍या, द्वेष के साथ बनावटीपन का रूझान लेश मात्र भी नहीं था। दोनों का प्रेम, स्‍नेह, सहानुभूति के साथ एक-दूसरे की आंतरिक भावात्‍मक सहृदय से जुड़ा हुआ था। यह प्रेम एक मन का, दूसरे मन से, संवेदना के स्‍तर से बंधा हुआ।

‘‘देख शुरा। तू इस तरह मुँह लटकाए बैठा रहेगा तो, मैं तुझसे बात नहीं करूँगा।‘‘ सुदामा आवाज में कठोरता लाकर शुरा से कहने लगा। कहने के साथ धीरे से शुरा के सिर पर थप्‍पड़ मारकर, दुलारता हुआ नजर आता है। शुरा की स्‍थिति वहीं की वहीं नजर आ रही थी। सुदामा ने शुरा को इस स्‍थिति में पहले कभी नहीं देखा था। गाँव में लोगों को परेशान करने वाला शुरा, आज इतना शांत, हताश, खामोश सुदामा को नजर आना, चिन्‍ता का विषय उजागर करवा रहा था।

बार-बार सुदामा के पूछने से, शुरा अचानक खड़ा हुआ। आँसुओं से भरी आँखें, सुदामा की तरफ ले जाकर कुछ देर एकटक देखता रहा। फिर मुँह नीचा कर, बाहर की तरफ ले जाने वाले रास्‍तें पर, धीरे-धीरे चलने लगा।

सुदामा, शुरा को जाता देखकर आवाज लगाता है-‘‘अरे! शुरा। रूक, रूकना। कहाँ जा रहा है।‘‘ शुरा लम्‍बी जीभ बाहर लटकाए, जमीन पर नजरें गडाऐ हुए चला जा रहा था। अधिकतर शुरा के कान ऊँचे उठे नजर आते थे, वे भी सिर पर पड़े हुए थे। लगातार तेज गति से निकलती सांसों का आवागमन भी अहसास करा रहा था कि शुरा के जीवन में कुछ घटा है। जिसका प्रभाव शुरा के मन को अन्‍दर ही अन्‍दर विरह-वेदना में जला रहा है।

शुरा बाहर चला जाता है। सुदामा वहीं चौखट पर बैठा-बैठा शुरा से संबंधित बीते दौर को याद करता है। शुरा, सुदामा की चौखट पर तीन वर्ष पहले आया था। शुरा की माँ! भूरी( कुत्तियाँ) का नाम गाँव वालों ने इस कारण दिया की सभी गाँव के कुत्‍ते-कुत्‍तियों में भूरी के शरीर का रंग भूरा था।

सर्दी के दिनों में भूरी ने तीन पिल्‍लों को जन्‍म दिया। दो पिल्‍ले तो काले रंग के व एक पिल्‍ला भूरा रंग लेकर धरती पर जन्‍म लेकर आया। कुछ ही दिनों में भूरी अचानक पिल्‍लों को छोड़कर चल बसी। दो काले रंग के पिल्‍लें सर्दी के प्रकोप को सहन नहीं कर पाये। माँ! के पीछे-पीछे वह भी चल बसे।

भूरे रंग का दुबला-पतला पिल्‍ला सर्दी के प्रकोप से बचता हुआ, एक रात सुदामा की चौखट पर जोर-जोर से चिल्‍लाने लगा। रात के समय सर्दी का प्रकोप ज्‍यादा था। सुदामा के मन में गर्म बिस्‍तर से बाहर निकलकर चिल्‍लाते पिल्‍ले को देखने की इच्‍छा ही नहीं हो रही थी। पर बार-बार हृदयविराधक पुकार सुदामा की आत्‍मा को विवश कराकर बाहर चिल्‍लाते पिल्‍ले की तरफ बढ़ने का रूझान जाग्रत कर रही थी। सुदामा ने पत्‍नी को जगाने का प्रयास किया पर गहरी नींद के कारण जगा नहीं पाया। आखिर सुदामा दरवाजा खोलने स्‍वयं ही उठता है। दरवाजा खोलकर देखता है, दोनों पैरों के बीच सिर को छुपाऐ, भूरे रंग का पिल्‍ला नजर आता है। सुदामा का मन पिल्‍ले की तरफ भावना के स्‍तर पर जुड़ जाता है। अन्‍दर से गर्म कपड़ा लाकर पिल्‍लें के ऊपर डाल देता हैं। रोज-रोज का अपनापन एक-दूसरे की संवेदना को, भावना के स्‍तर पर बाँधने का परिवेश जोड़ने लगता है। आज सुदामा व शुरा के प्रेम को गाँव के सभी लोग भावना के स्‍तर पर महसूस करते है।

‘‘शुरा मैं जानता हूँ, कि तू बहादुर है। अन्‍यथा तेरा नाम में भूरा से शुरा नहीं रखता। याद है मुझे वह रात की घटना, जिस रात दो चोर घर में घुसकर चाकू की नोंक पर सारा सामान लेकर जाने वाले थे। पर तूने उन चोरों को छटी का दूध याद दिला दिया। उसी दिन से मेरे साथ गाँव के लोग तुझे शुरा नाम से पुकारने लग गये।‘‘ सुदामा चौखट पर बैठा-बैठा अपने-आप से बातें कर रहा था।

‘‘अजी!, चौखट पर बैठे-बैठे किससे बातें कर रहे हो?, जिसे सुनना चाहिए, वह तो चला गया। ना जाने क्‍यों दो-तीन दिन से शुरा ऐसा व्‍यवहार कर रहा है।‘‘ सुदामा की पत्‍नी दरवाजे पर आकर कहने लगती है।

‘‘ये शुरा को, आज क्‍या हो गया।‘‘ सुदामा, पत्‍नी की तरफ देखकर कहने लगा लगता है।

‘‘अजी!, आपने तो आज देखा है। मैं, पिछले दो रोज से यह देख रही हूँ। वो देखो दो रोज की रोटियाँ वैसे की वैसे पड़ी है। कहती हूँ, तो थोड़ी देर मुँह लटकाए एकटक देखता है, फिर उलटे पैर बाहर चला जाता है।‘‘

पत्‍नी की बातें सुनकर सुदामा कहने लगता है-‘‘क्‍या? कहाँ। पिछले दो रोज से शुरा रोटी नहीं खा रहा है।‘‘ सुदामा के चेहरे पर चिन्‍ता अब ज्‍यादा बढ़ गई थीं।

पत्‍नी सुदामा को कहने लगी-‘‘ये शुरा। पहले अगर थोड़ी देर रोटी देने में देरी होती तो, पुरा घर भौं-भौं की आवाज लगाकर सिर पर ले लेता था। परसों सविता काकी के घर सत्‍यनारायण की कथा थी। मैं, भी कथा का लाभ लेने पहुंच गई। सोचा आकर खाना बना लूंगी। पर देर तक चलती कथा के कारण रूकी रही। इतने में, ये शुरा इतनी औरतों के बीच में मुझे ढूंढ़कर जोर-जोर से भौंकने लगा। सभी कथा सुनने वालों का ध्‍यान शुरा की तरफ खींचने लगा। आखिर मुझे कथा को छोड़कर इसके लिए रोटी बनानी पड़ी । तब कही जाकर इसका कहर शांत हुआ।‘‘

सुदामा, पत्‍नी द्वारा शुरा की शरारत को सुनकर बाहर की तरफ चलने लगा। सुदामा को जाता देख पत्‍नी पीछे से पुकारती हुई कहने लगी-‘‘अजी!, आप अब कहाँ जा रहे हो?, खाना लगा दिया है। खाकर चले जाना।‘‘ पत्‍नी की पुकार सुनकर भी सुदामा अनसुनी करते हुए आगे बढ़ते हुए मोहल्‍ले की तरफ चलने लगता है।

अरे!, ओ! सुदामा। कहाँ जा रहे हो इस वक्‍त।‘‘ लकड़ी हाथ में लिए कालूकाका सुदामा की तरफ बढ़ते हुए चले आ रहे थे। सुदामा के करीब आकर कहने लगे-‘‘क्‍या बात है, सुदामा। परेशान नजर आ रहे हो। लगता है, किसी से नाराज हो।‘‘ सुदामा की आँखें कालूकाका को कम व इधर-उधर ज्‍यादा दौड़ रही थी। आखिर सुदामा, शुरा की खोज करने, घर से बाहर निकला था।

‘‘अरे!, बोल तो सही। क्‍या? ढूंढ़ रहा है।‘‘ सुदामा के कंधे को अपनी तरफ खींचकर कालूकाका बोलने लगे।

बार-बार कालूकाका के पूछने पर सुदामा मुँह लटकाए हुए कहने लगता है-‘‘ये शुरा भी, ना जाने कहाँ चला गया, इस वक्‍त।‘‘ सुदामा की चिन्‍ता सुनकर कालूकाका तुरन्‍त बोलने लगे-‘‘तेरा शुरा तो मेरे खेत पर बैठा है।‘‘

सुदामा के मन में शुरा के प्रति बनी चिन्‍ता कुछ कम हुई। ‘‘शुरा, वहाँ क्‍या?,कर रहा है।‘‘ सुदामा, कालूकाका की तरफ देखकर कहने लगे।

‘‘अरे!, सुदामा। मेरे खेत पर रहने वाली छितरी (कुत्‍तियाँ का नाम) को पनघट पर रहने वाला लालियाँ ( कुत्‍ते का नाम) ने कुछ रोज पहले घायल कर दिया था। लालियाँ के दाँतों का घाव छितरी के जीवन को समाप्‍त कर गया। दो रोज पहले ही छितरी की मृत्‍यु हुई है। वह जहाँ मरी, वहीं तेरा शुरा दो रोज से मुँह लटकाए बैठा है। पहले दिन में नजर आता था। पर आज तो वह आते वक्‍त भी, मुझे दिखाई दिया।‘‘

सुदामा की मन, शुरा के मन में समाहित दुःख को अब स्‍पष्‍ट रूप से महसूस कर रहा था। आखिर अपनों से बिछड़ने का गम सभी का समान रूप से अहसास करवाता है। इंसान हो या जानवर सभी के अन्‍तर्गत संवेदना का बहाव समान रूप से बहता है। इंसान अपनी वेदना शब्‍दों के साथ व्‍यक्‍त करता है। पर जानवर विभावों का सहारा लेकर व्‍यक्‍त करते है। जिसे भावात्‍मक स्‍तर से जुड़ा मन ही महसूस करता है। सुदामा का मन, शुरा की यथास्‍थिति से पूर्णःरूप से भावना के स्‍तर से बँधा हुआ था।

‘‘शुरा, अरे! शुरा। इतना बढ़ा दुःख अपने मन में लिए फिरता है, बेटा। मुझे माफ करना, शुरा बेटा। जो मैं तेरी वेदना समझ नहीं सका।‘‘ शुरा के सिर पर हाथ फेरते हुऐ सुदामा, वेदनामयी भावात्‍मक शब्‍द व्‍यक्‍त करते है।

शुरा, छितरी के मरने के स्‍थान पर सिर झुकाकर बैठा हुआ था। सुदामा द्वारा मिलती संवेदना का प्रभाव शुरा की आँखों में भरे आंसू पलक बन्‍द करते ही लकीर बनकर धरती में समाहित हो रहे थे।

‘‘शुरा, घर चल। तेरी माँ! विमला( सुदामा की पत्‍नी) राह देख रही होगी।‘‘ सुदामा ने अपने हाथों से शुरा को खड़ा किया। शुरा वह स्‍थान छोड़ना नहीं चाहता था। सुदामा के बार-बार समझाने पर शुरा साथ चलने लगा। सुदामा के चलन में भी चिन्‍ता रूपी थकान थी। शुरा के चलन में भी हृदयविदारक वेदना झलक रही थी। शुरा, धरती पर नजर गड़ाऐ, चुपचाप धीर-धीरे सुदामा के पीछे चल रहा था। शुरा के शरीर की सारी शक्‍ति समाप्‍त हुई नजर आ रही थी। क्‍योंकि प्रत्‍येक बढ़ते कदम अपने स्‍तर से लडखडाते हुए, जमीन पर पड़ रहे थे। ऐसा महसूस होता है कि शुरा के पीठ पर समता से ज्‍यादा बोझ रख दिया हो।

दरवाजे की चौखट पर विमला खड़ी नजर आती है। सुदामा को देखकर कहने लगती है-‘‘कहाँ, चले गये थे।‘‘ सुदामा का चेहरे पर हताशा का आलम था। पत्‍नी की तरफ देखकर, पीछे आते शुरा को देखने लग जाता है। पत्‍नी समझ जाती है, कि शुरा के पीछे गये थे।

‘‘कालूकाका के खेत पर रहने वाली छितरी (कुत्‍तियाँ) को पनघट पर रहने वाले लालियाँ (कुत्‍तें) ने मार दिया।‘‘ सुदामा, पत्‍नी को दबी आवाज में बताने लगता है।

‘‘अजी! तभी, हीरा बूआ आज पनघट पर मुझे कह रही थी। अरी! विमला, तेरे शुरा और यहाँ पनघट पर रहने वाले लालियाँ में जोरदार लड़ाई दो रोज पहले हुई। शुरा का क्रोध उस दिन ज्‍यादा दिखाई दे रहा था। लालियाँ को चाहता, तो वहीं चीत कर देता। पर तेरा शुरा ने ऐसा नहीं किया। उसने लालियाँ को इतना मजबूर कर दिया कि उसे गाँव छोड़कर जाना पड़ा।‘‘ विमला अपने पति सुदामा को शुरा की वीरता के साथ समझ को व्‍यक्‍त कर रही थी।

सुदामा पत्‍नी के मुँह से पनघट की घटना सुनकर सोचने लगा कि कितना समझदार है, मेरा शुरा। आज दुनियाँ क्रोध में इतना पागल हो जाती है कि हित-अहित का ध्‍यान ही नहीं रख पाता। इतना कष्‍टदायक दुःख में भी शुरा ने लालियाँ को चीत नहीं किया। उसे गाँव से बाहर निकालना गहरी समझ का कार्य था। असामाजिक तत्‍वों को गाँव से बाहर रखना अतिआवश्‍यक, अन्‍यथा किसी और को भी नुकसान पहुँचा सकते है। शुरा का यही निर्णय कर लालियाँ को गाँव से बाहर कर दिया।

‘‘खाना लगा दूँ।‘‘ सुदामा की तरफ देखकर विमला कहने लगी।

‘‘नहीं।‘‘ शुरा की तरफ देखता हुआ, सुदामा कहने लगा।

शुरा के नजदीक जाकर सुदामा कुछ देर खड़ा रहता है। अपने दोनों हाथों से शुरा के सिर पर हाथ फेरते हुए, वहीं बैठ जाता है। शुरा भी सुदामा के पास जमीन पर बैठ जाता है। बड़े प्‍यार से शुरा को पुचकारते हुऐ, सुदामा कहने लगता है-‘‘बेटा!, मैंने तेरा नाम शुरा इसलिए नहीं रखा कि तू परिस्‍थितियों के सामने अपने आप को बेबस सा महसूस करे। जीवन की गतिविधियाँ हैं बेटा!, जिसमें इन्‍सान सोच नहीं पाता, वैसा खेल समय हमसे खिलाता है। पर इस खेल में हताश वहीं होता है, जो अपने आप को घटना के अंतर्गत ही समाहित समझता है।‘‘

सुदामा के ज्ञान भरे शब्‍दों को शुरा बड़ी खामोशी से सुन रहा था। सुदामा के बार-बार हाथों के स्‍पर्श से शुरा के मन में समाहित वेदना आँसुओं के साथ आँख से बाहर निकल रही थी।

‘‘तू, तो मेरा शुरा है। तू ऐसे घुट-घुट कर अपने आप को समाप्‍त करेगा, तो दुनियाँ तुझे कायर समझेगी। जीवन को बेटा!, फिर से आगे नए सिरे से जोड़कर चला। मुझे विश्‍वास है शुरा, आने वाला सवेरा तेरे जीवन में व्‍याप्‍त अंधेरे को दूर करेगा। आगे तेरी इच्‍छा।‘‘ सुदामा, शुरा के पास से उठकर घर के अन्‍दर बढ़ने लगता है। दरवाजे पर खड़ी-खड़ी विमला भी सुदामा व शुरा के अन्‍दर बहते वात्‍सल्‍य प्रेम का वेदनामयी रूप को महसूस करती है। विमला की आँसुओं से भरी आँखें यह अहसास करवाती है।

‘‘अजी!, जरा बाहर जाकर देखिये तो सही। तुम्‍हारा शुरा कहाँ चढ़ गया है।‘‘ पत्‍नी के जगाने पर सुदामा बिस्‍तर छोड़कर दरवाजे की तरफ बढ़ने लगता है। सामने वाली दीवार पर शुरा ऊँचे कान खड़े किए दिखाई देता है। शरीर का संचालन भी स्‍वस्‍थ नजर आ रहा था। सुदामा की आंखें रोटी रखने के स्‍थान पर गई, तो नजर आया कि दो-तीन रोज की भूख शुरा एक साथ पुरी कर गया। पत्‍नी की तरफ देखकर सुदामा कहने लगा-‘‘काश, इंसान भी समझ पाता।‘‘

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लेखक- गोविन्‍द बैरवोध्‍व खेमाराम जी बैरवा

आर्य समाज स्‍कूल के पास, सुमेरपुर

जिला-पाली,(राजस्‍थान) पिन0कोड़-306902

मो0-9928357047, 9427962183

ई मेल-govindcug@gmail.coms

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