शनिवार, 26 जनवरी 2013

दीप्ति शर्मा की कविताएँ


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1.सुनसान रास्ते

डर सा लगता है
अकेले चलने में
अँधियारे और तन्हा से
उन सुनसान रस्तों पर ।

जहाँ कोई नहीं गुजरता
बस एक एहसास है मेरा
जो विचरता है ठहरता है
और फिर चल पड़ता है
उन सुनसान रस्तों पर ।

चौराहे तो बहुत हैं पर
कोई सिग्नल नही
ना कोई आवाज़ आती है
जो रोक सके मुझे
उन सुनसान रस्तों पर ।

गहरे कोहरे और
जोरदार बारिश में भी
पलते हैं ख्याल
जो उड़ते दिखायी देते हैं
बादलों की तरह
और मेरा साथ देते हैं
उन सुनसान रस्तों पर ।

मैं तो बस चलती हूँ
अपने अहसास लिये
कुछ ख़्वाब लिये और
छोड़ जाती हूँ पदचाप
मंज़िल पाने की चाह में
उन सुनसान रस्तों पर ।
© दीप्ति शर्मा

2.शब्द

वो शब्द छोड़ दिये हैं असहाय
विचरने को खुले आसमान में
वो असहाय हैं, निरुत्तर हैं
कुछ कह नहीं पा रहे या
कभी सुने नहीं जाते
रौंध दिये जाते हैं सरेआम
इन खुली सड़को पर
संसद भवन के बाहर
और न्यायालय में भी
सब बहरे हैं शायद या
अब मेरे शब्दों में दम नहीं
जो निढाल हो जाते हैं
और अक्सर बैखोफ हो घुमते
कुछ शब्द जो भारी पड़ जाते हैं
मेरे शब्दों से...
आवाज़ तक दबा देते हैं
तो क्यों ना छोड़ दूँ
अपने इन शब्दों को
खुलेआम इन सड़कों पर
विचरने दूँ अंजान लोगों में
शायद यूँ ही आ जाये
सलीका इन्हें जीने का ।
© दीप्ति शर्मा

3. फसल

वर्षों पहले बोयी और
आँसूओं से सींची फसल
अब बड़ी हो गयी है
नहीं जानती मैं!!
कैसे काट पाऊँगी उसे
वो तो डटकर खड़ी हो गयी है
आज सबसे बड़ी हो गयी है
कुछ गुरूर है उसको
मुझे झकझोर देने का
मेरे सपनों को तोड़ देने का
अपने अहं से इतरा और
गुनगुना रही वो
अब खड़ी हो गयी है
आज सबसे बड़ी हो गयी है ।
वो पक जायेगी एक दिन
और बालियाँ भी आयेंगी
फिर भी क्या वो मुझे
इसी तरह चिढायेगी
और मुस्कुराकर इठलायेगी
या हालातों से टूट जायेगी
पर जानती हूँ एक ना एक दिन
वो सूख जायेगी
पर खुद ब खुद

© दीप्ति शर्मा

4.वो अधजली लौ

रौशनी तो उतनी ही देती है
कि सारा जहाँ जगमगा दे
निरंतर जल हर चेहरे पर
खुशियों की नदियाँ बहा दे
फिर भी नकारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

मूक बन हर विपत्ति सह
पराश्रयी बन जलती जाती
परिंदों को आकर्षित कर
जलाने का पाप भी सह जाती
फिर भी दुत्कारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

जीवन पथ पर तिल तिल जलती
आघृणि नहीं बन कर शशि
हर घर को तेज से अपने
रौशन करते हुए है चलती
फिर भी धिक्कारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

अपना अस्तित्व कब खोज पायेगी
दूसरों के लिये नहीं अपने लिये
ये भी मुस्कुराकर जी जायेगी
बनावटी नहीं खालिस बन
कब पहचानी जायेगी??
वो अधजली लौ

© दीप्ति शर्मा

5..जिंदगी

जिंदगी की सच्चाई
को छुपाते हुए
हर हाल में बस
मुस्कुराते हुए
गुजर जाता है लम्हा
कभी कभी ।
गुजरे इस लम्हें में
क्या जीवन भी
गुजर सकता है?
शायद हाँ
शायद नहीं भी
बिन सच्चाई अपनाये
ना जिंदगी को समझाये
गुजर तो नहीं सकता
हाँ कट सकता है लम्हा
सच की यादों में
कुछ किस्से पिरोकर
विश्वास के धागे में
लम्हा बढ़ सकता है
जीवन कट सकता है
पर अगर कहीं
सच्चाई मिल जाये
जो विश्वास में
तो एक एक मोती
हकीक़त का जैसे
जुड़ने लगेगा
तब ये लम्हा
गुज़रने लगेगा
और जिंदगी भी
गुजर जायेगी
हँसते हँसते ।
© दीप्ति शर्मा


blog - www.deepti09sharma.blogspot.com

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  1. अच्छी रचनाएँ ....बधाई

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  2. बेहतरीन कविताएं

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  3. अभिनन्दन! बहुत सुन्दर!

    उत्तर देंहटाएं
  4. behd hi umda rchnaye h aapki,,,,,,,,,,,,i like it

    उत्तर देंहटाएं
  5. गहरे कोहरे और
    जोरदार बारिश में भी
    पलते हैं ख्याल
    जो उड़ते दिखायी देते हैं
    बादलों की तरह
    और मेरा साथ देते हैं
    उन सुनसान रस्तों पर ।
    यहाँ भी आपको ढूंढ ही लिया दीप्ति शर्मा जी ! बहुत सुन्दर शब्द ! अभी एक ही रचना पढ़ी है , इसलिए एक ही रचना के लिए कहूँगा , बहुत खूब !


    उत्तर देंहटाएं
  6. गहरे कोहरे और
    जोरदार बारिश में भी
    पलते हैं ख्याल
    जो उड़ते दिखायी देते हैं
    बादलों की तरह
    और मेरा साथ देते हैं
    उन सुनसान रस्तों पर ।


    यहाँ भी आपको ढूंढ ही लिया दीप्ति शर्मा जी ! बहुत सुन्दर शब्द ! अभी एक ही रचना पढ़ी है , इसलिए एक ही रचना के लिए कहूँगा , बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं
  7. गहरे कोहरे और
    जोरदार बारिश में भी
    पलते हैं ख्याल
    जो उड़ते दिखायी देते हैं
    बादलों की तरह
    और मेरा साथ देते हैं
    उन सुनसान रस्तों पर ।


    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दीप्ति शर्मा जी ! मैंने पहले भी इस कविता पर अपने विचार दिए थे किन्तु दीखते नहीं ?

    उत्तर देंहटाएं
  8. आवाज़ तक दबा देते हैं
    तो क्यों ना छोड़ दूँ
    अपने इन शब्दों को
    खुलेआम इन सड़कों पर
    विचरने दूँ अंजान लोगों में
    शायद यूँ ही आ जाये
    सलीका इन्हें जीने का ।

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दीप्ति शर्मा जी ! लेकिन शब्द असहाय नहीं हो सकते


    उत्तर देंहटाएं
  9. कुछ गुरूर है उसको
    मुझे झकझोर देने का
    मेरे सपनों को तोड़ देने का
    अपने अहं से इतरा और
    गुनगुना रही वो
    अब खड़ी हो गयी है
    आज सबसे बड़ी हो गयी है ।


    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दीप्ति शर्मा जी ! बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  10. जीवन पथ पर तिल तिल जलती
    आघृणि नहीं बन कर शशि
    हर घर को तेज से अपने
    रौशन करते हुए है चलती
    फिर भी धिक्कारी जाती है क्यों??
    वो अधजली लौ


    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दीप्ति शर्मा जी ! बहुत सुन्दर ! एक से एक बेहतरीन प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  11. पर अगर कहीं
    सच्चाई मिल जाये
    जो विश्वास में
    तो एक एक मोती
    हकीक़त का जैसे
    जुड़ने लगेगा
    तब ये लम्हा
    गुज़रने लगेगा
    और जिंदगी भी
    गुजर जायेगी
    हँसते हँसते ।


    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दीप्ति शर्मा जी ! बहुत सुन्दर ! एक से एक बेहतरीन प्रस्तुति ! सुन्दर , अति सुन्दर शब्द

    उत्तर देंहटाएं

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