सोमवार, 21 जनवरी 2013

रमा शंकर शुक्ल की कहानी - उस औरत की क्या गलती थी!!

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उस औरत की क्या गलती थी!!

डा0 रमा शंकर शुक्ल

उसका अपना बेटा आज पंद्रह साल का है। पति सरकारी विभाग में इंजीनियर है। जेठ उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में कार्मिक निदेशक हैं। ससुर सेवानिवृत्त शिक्षक। भरा-पूरा परिवार है। धन-धान्य से छलक रहा है घर। फिर भी उसे सुकून नहीं है। वह पति से मेंटेनेस का मुक़दमा लड़ रही है। कोर्ट से लौटने के बाद हर बार वह अपने कमरे में बैठ घंटों रोती रहती है। कभी बनारस तो कभी मिर्ज़ापुर दौड़ती रहती है।

गैरों में प्यार देख उसे सुकून मिलता है पर पर अपने घर में बेगानगी का बोध होता है।

मै हैरान था। ये अतृप्त महिला का विकृत मनोशास्त्र तो नहीं। आखिर क्यों नहीं रह सकती पति के साथ ससुराल में। नहीं पटती तो तलाक क्यों नहीं ले लेती। घर वाले अच्छे नहीं लगते, दुर्व्यवहार करते हैं तो घर क्यों नहीं छोड़ देती। और यदि उसी घर में रहना है तो फिर एडजस्ट कर ले। रार और प्यार एक साथ छह रही है। स्त्री स्वतन्त्रता का यह कौन सा रूप है।

सारी बातें मोबाइल पर ही होती थीं। मैंने उसे देखा भी तो नहीं था। कौन सलाह दूं। यह जिद है या नारी सशक्तिकरण का अति प्रतादक रूप!

एक दिन वह आ ही गयी। सामने बैठी थी। सौम्यता की प्रतिमूर्ति। पर जबरदस्त दृढ़ता थी। भरी हुई देह बड़ी-बड़ी आँखें। सधे हुए शब्द। धारा प्रवाह बोलती। कहीं कोई त्रुटि नहीं।

उसने अपना फैसला सुना दिया, वे लोग चार लाख देकर चलता करना चाहते हैं। बीस साल पहले मेरे पिता ने दो लाख नकद और जेवर आदि मिलाकर कुल सात लाख में किया था विवाह मेरा। तब विवाह के समझौते में लड़के की सरकारी नौकरी, ससुराल की प्रापर्टी, खेत-बारी सभी आधारों का मूल्याङ्कन किया गया था। आज उनका वेतन अस्सी हजार है। कोई जिम्मेदारी भी नहीं है। इसलिए मेरी हिस्सेदारी केवल चार लाख नहीं बन सकती।

क्या आप केवल हिस्से की फिराक में हैं? मैंने पूछा था।

नहीं। घर में कोई जब हिस्से की बात करने लगे तो उसका कारण ठीक से समझ लेना चाहिए। इसका मतलब होता है कि अब उस घर के लोगों के प्रति प्रेम की संभावना समाप्त हो चुकी है। या फिर उनके प्रेम का कोई मूल्य ही नहीं रह गया है। जो प्यार अनमोल है, यदि धन उससे ज्यादा अनमोल है तो सामान्य सी बात है कि प्यार में प्यार नहीं छल है।

मुझे वह महिला स्वार्थी लगी। पचा नहीं पाया, बुरा नहीं मानिए, पर मुझे आपकी सोच बहुत स्वार्थी प्रतीत हो रही है। क्या महिलायें अपने औरत होने और क़ानून का इतना दुरुपयोग कर सकती है?

वह खामोश हो गयी। चेहरा ग्लानि और क्षोभ से लाल हो गया। कुछ देर तक वह खामोश होकर आँख बंद किये बैठी रही। फिर दोनों कोरों से आंसुओं की बूंदें ढुलक कर गालों पर फ़ैल गयी। उसने होठों को भींच लिया। बोली, सब कुछ बताउंगी आपको। क्योंकि अब बताना जरूरी लगने लगा है। बस, मै अपनी जिंदगी और कुछ सुनहरे पलों का तमाशा नहीं बनाना चाहती थी।

आज जिस घर को मेरा ससुराल बना दिया गया है, वास्तव में है नहीं। यह तो थोप दिया गया। यह मेरा पति भी नहीं। हाँ, इस थोपे हुए रिश्ते को बचाने की मैंने न चाहते हुए भी कोशिश की। मेरा बेटा उसी का परिणाम है।

मैंने तो जहाँ से जिंदगी शुरू की थी और सपनो का संसार खडा किया था, उसे तो जमीदोज कर दिया गया। मेरी खुद की जाति, धर्म और अपनों ने। रमण और हम साथ पढ़ते थे। वह परिंदे की तरह पूरे आसमान में उड़ने वाला प्राणी। एक भोली मनुष्यता और चिंतन का खुला आकाश था उसके पास। बोलता तो जैसे संगीत बजता हो। हसता तो सुबह लजा जाए। उसने दायरे में रहकर जीना नहीं सीखा था। उसके लिए कुछ भी असम्भव न था। वह विश्व मानव था। हम अक्सर साथ रहते। हम उसके भीतर महक रहे थे और वह मेरे भीतर फ़ैल रहा था। उसके घर वाले हमारे प्यार को देख फूल की तरह खिल जाते।

रमण शिक्षा विभाग में अधिकारी हो गया। हमारे लिए इससे बड़ी ख़ुशी का दिन और क्या हो सकता है। मित्रों और उसके परिजनों ने सही समय देख हमारा कोर्ट में विवाह करा दिया। सास ने प्यार से गले लगाया तो ससुर ने गहनों से झोली भर दी। मित्रों ने शुभकामनाओं से मन भिंगो दिया।

हम चले गए कानपुर। चार दिन कैसे बीत गए, पता ही न चला। पांचवें दिन चाचा और पिता जी पहुंचे। हम दोनों को जी भर कर आशीष दिए। बोले, अब चल हमने तुम्हारा रिश्ता स्वीकार कर लिया। अब सम्मान के साथ सबके सामने विदा हो कर आना। हमारे भी तो कुछ अरमान हैं। तू मेरी इकलौती औलाद। बेटी विदा करने का सपना किस्से पूरा करूंगा।

मन भर आया। आँखों से आंसू निकला पड़े। रमण चाचा की गाडी में बैठे और पापा ने हमें अपनी गाडी में बिठा लिया। रास्ते में प्यास लगी तो पापा ने पास राखी बोतल से पानी पिला दिया। जाने क्या था उसमे। मैं बेहोश हो गयी। होश आया तो मैं एक कमरे में पड़ी थी। चाचा कानों के पास पिस्तौल सटाए खड़े थे। दहाड़े, इस कागज़ पर दस्तखत कर नहीं तो रमण मार दिया जायेगा। मैं रमण-रमण चिल्लाती रही। पर मेरी आवाज मकान में ही घुट कर रह गयी। रमण की जिंदगी देखूं या मौत। छोटा भाई बगल में रो रहा था। एक आदमी उसकी कनपटी पर बंदूक लगाये बैठा था। चारों और मौत थी। मैंने कागज़ पर दस्तखत कर दिए। देख भी नहीं पायी की उस पर क्या लिखा है। मैं फिर बेहोश हो गयी।

इस बार होश आया तो मैं अपने घर में थी। हर किसी को हमसे मिलने की मनाही कर दी गयी। पिता और चाचा ने सब कुछ छिपाकर राज से शादी कर दी। नयी ससुराल आ तो गयी, पर यहाँ न मैं थी और न ही मेरी जिंदगी। माँ रोती रहती। फोन पर कहती बेटी, लड़की और गाय एक ही हैं। अब तू उसे ही अपना घर समझ। भूल जाना रमण को नहीं तो ये सब मार डालेंगे उसे।

आप बताइये भाई साहब। मैं क्या करती। चाचा कितने लोगों का क़त्ल कर चुके थे। एक रमण का भी कर देते तो उनके लिए कौन बड़ी बात होती।

राज इंजीनियर थे। पर मनोविकृत थे। दिन भर दवाएं खाते। वे भी किसी से पहले प्रेम करते थे। उसका दिन भर फोन आता। हम चुपचाप देखते रहते। दिन भर शौचालय जाते। दिन भर हाथ धोते। मुझे दया आती। कई बार विस्तर गन्दा कर देते। मैं साफ़ करती। पूरे आठ साल बीत गए। इसी तरह की जिंदगी जीते हुए। बीटा बड़ा हो रहा था।

एक दिन मेरी सहेली ने फोन कर अपनी बेटी की शादी में बुलाया। वहां पहुंचे तो हमारे सभी पुराने मित्र जुटे थे। रमण भी आये थे अपनी पत्नी के साथ। उस दिन सहेली ने चोरी से हमारे मोबाइल में एक-दूसरे का नंबर डाल दिया।

रमण ने बताया कि तुम्हारे जाने के बाद ये लोग हमें एक अनजानी जगह ले गए। वहां मारा-पीटा। बोले की तलाक के पेपर पर हस्ताक्षर करो नहीं तो उसे गोली मार देंगे। हार कर मैंने दस्तखत कर दिया। दो साल तक तुम्हारा इंतज़ार करता रहा। बहुत पता किया, पर कुछ हासिल न हुआ। आखिर में घर वालों के दबाव में विवाह कर लिया।

इसके बाद हमारे भीतर का प्रेम फिर जिन्दा हो गया। राज को एक दिन शक हुआ। उन्होंने बड़े प्रेम से अपनी जिंदगी के बारे में बताया। कहा कि मैं अब भी उससे प्रेम करता हूँ। तुम्हारा भी कुछ ऐसा हो तो बता दो। हम अपने प्रेम को जी सकते हैं।

मुझे उस दिन फिर अपने प्यार के प्रति उम्मीद जगी। मैंने सब कुछ सच-सच बता दिया। बस, यही भूल हो गयी।

राज हमें लेकर गाँव आ गए। फिर एक कोठरी में हमें बंदी बना दिया गया। नौकरानी खाना देकर चली जाती। बस। फिर घर से हमारा कोई मतलब न रह गया। आये दिन कोई न कोई बहाना बनाकर मुझे पीटा जाने लगा।

मेरा धैर्य टूट गया। अन्ना जी के आन्दोलन से बड़ी प्रेरणा मिली। मैंने प्रताड़ना के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया। घर की दहलीज लांघ गयी। डट कर प्रतिरोध करना शुरू कर दी। तय कर लिया कि अब अपने औरत होने का प्रमाणदूँगी। मैंने कोर्ट में केस फ़ाइल कर दिया। महिला आयोग गयी। थाने में कई बार शिकायत की, पर जेठ के प्रभाव के कारण हर फ़ाइल दबा दी गयी। वे लोग हमारी समाजसेवा को चरित्रहीनता से जोड़ कर दुष्प्रचार कर रहे हैं। मैं अन्ना जी के साथ दो साल काम की हूँ। अब मुझे अपने लिए ही नहीं, पूरे नारी स्वाभिमान की लड़ाई लड़नी है। मैं न तो तलाक दूंगी और न ही उसके साथ रहूंगी। मैं अकेले रहूंगी और अपनी हिस्सेदारी ले कर रहूंगी

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तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर

उत्तर प्रदेश, 231001

मो0 09452638649

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