सोमवार, 21 जनवरी 2013

अर्जुन प्रसाद की कहानी - खून का कपट

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खून का कपट

बालूगंज के शंकरलाल के तीन पुत्र थे। नागेंद्र, राजेश और सतीश। तीनों भाइयों में नागेंद्र सबसे बड़े थे और सतीश सबसे छोटे। उनके मँझले भाई राजेश जहाँ बडे़ भोले-भाले श्रद्धालु और शिष्ट थे, वहीं दूसरे दोनों भाई बड़े ही चालाक कूटनीतिज्ञ और एकदम स्वार्थी थे। उन्हें राजेश बाबू और उनके बीवी-बच्चों से कोई सरोकार न था। माता-पिता को दुनिया से आँख मूँदते ही उनमें फूट पड़ गई और वे एक-दूसरे से अलग हो गए। उनके संस्कार तो अलग थे ही, विचार भी अलग-अलग था। नागेंद्र और सतीश एक साथ थे। राजेश बाबू अकेले और उनसे अलग-थलग थे। अलग होने के बाद फिर तीनों में कभी पटी नहीं।

नागेंद्र बड़े ही शातिर मक्कार और चालू किस्म के थे। उनकी नजर में सब कुछ रूपया ही था। वह कहते- बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रूपइया। राजेश की शरीर थी तो बहुत दुबली-पतली, पर थे वह खूबसूरत। बड़े ही नीतिज्ञ और विनम्र, सजजन पुरूष थे। वह रूपए-पैसे को अधिक महत्व न देते थे।

उनका विचार था कि भाई कैसा भी क्यों न हो, होता वह भाई ही है। फिर बड़ा तो बड़ा ही होता है। सतीश को वह पुत्रवत मानते। क्योंकि अनुज बड़े भाई के लिए बेटे के समान ही होता है। तिस पर भी नागेंद्र का स्वभाव बड़ा ही कठोर और अधार्मिक था। वह बड़े लोभी ओर कुमार्गी पुरूष थे। धर्म और दयाभावना उनमें बिल्कुल भी न थी।

पर, सतीश दोनों भाइयों से अलग ही थे। उनमें कहीं कोई समानता न थी। अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग। बल्कि यह कहें कि सतीश चंद्र बडे काहिल और दब्बू स्वभाव के थे। उनमें बुद्धि और विवेक नाम की कोई चीज ही न थी। नागेंद्र की आज्ञा का पालन आँखें मूंदकर करते। गुलाम की भाँति बिना किसी ना-नुकर के चुपचाप नागेंद्र का कहना मानते। बचपन से ही नागेंद्र उन पर पूरी तरह हावी थे।

सतीश के अंदर पुरूषार्थ का अभाव तो था ही, उनकी चाल-ढाल भी बड़ी बेढंगी थी। बड़े मनचले भी थे। उचित-अनुचित का उन्हें कोई फर्क ही न मालूम था। नागेंद्र जो कुछ भी कहते, दीन-हीन की तरह सुन लेते। बड़े कमजोर पुरूष थे। नागेंद्र से कुछ पूछने का साहस ही न कर पाते। बड़े ही मरदूद थे वह। माँ-बाप के रहते उनमें अगाध प्रेम था। सद्भाव और अपनापन था। घर में सब कुछ ठीक चल रहा था। कहीं कुछ भी गड़बड़ न था।

लेकिन, संसार से उनके विदा होते ही भाई से भाई विछड़ गया। आपस में बँटवारा हो गया। बाप-दादे की जमीन-जायदाद सब बँट गई। धन-दौलत और खेत, मकान बँटते ही जन्म-जन्म के बौरी की भाँति भाइयों के दिल भी बँट गए। देखते ही देखते मन रूपी चमन उजड़कर विखर गया। राजेश के दो पुत्र थे और एक पुत्री। काफी छोटा परिवार था। पति-पत्नी में लगाव और बड़ी मधुरता थी। कहीं कोई अभाव न था। तीनों बच्चे अच्छे-अच्छे स्कूलों में पढ़ते-लिखते थे। उनकी पत्नी करूणा मानो ममता की मूर्ति थी। कम पढी-लिखी होने पर भी उसके विचार बहुत अच्छे थे। वह एक कुलीन घराने की बेटी थी। घर में रूपए-पैसेां की अपार दौलत थी।

वहीं नागेंद्र बाबू का परिवार बहुत लंबा था। पूरे आधे दर्जन बच्चे थे। चार पुत्र थे और दो पुत्रियां। शायद, उनका वश चलता तो क्रिकेट की पूरी टीम ही तैयार कर देते। ऐसा नहीं और बच्चे पैदा ही नहीं हुए, पैदा तो हुए लेकिन, धनाभाव में उनका पालन-पोषण भलीभाँति ठीक प्रकार से न होने से असमय ही काल के गाल में समा गए। जो बच गए, उन्हें पढ़ाना-लिखाना तो दूर, दो वक्त की रोटी भी नसीब न होती थी। सबके कपड़े मौले-कुचैले ही रहते। फटे-पुराने वस्त्र पहनने के लिए वे बेचारे विवश थे। भूखमरी ओर तंगी के चलते नागेंद्र और उनकी पत्नी में सदैव खटपट होती रहती। राजेश के बच्चों का अच्छी जगह पढ़ना-लिखना देखकर वे मन मसोसकर रह जाते। पति-पत्नी के हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न होती।

नागेंद्र की पत्नी कामिनी आए दिन उन्हें जली-कटी सुनाने लगती। कभी-कभी अपने तकदीर को कोसने लग जाती। नागेंद्र से वह जब भी शिकायत करती कि हमें और बच्चे नहीं चाहिए। जो हैं, उनका ही लालन-पालन बड़ी मुश्किल से हो पा रहा है। इतनी बड़ी फौज का गुजारा भला कैसे होगा? हमारे बच्चे आज के जमाने में भी चीथड़े पहनने को विवश हैं।

तब नागेंद्र तर्क देते कि ईश्वर ने जब जन्म दिया है तो वह पालेगा भी। तुम इतनी चिंता क्यों करती हो? तुम्हें इस बारे में फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं। क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि बच्चे भगवान की देन है। जैसे एक आँख को भी कोई आँख कहते, वैसे ही एक पुत्र को पुत्र भी नहीं। अकेला चना भाड़ थोड़े ही फोड़ सकता है। तुम जरा उनके बारे में सोचो, जिन लोगों के पास एक भी बच्चा नहीं। उनका सारा जीवन रो-रोकर गुजरता है। ये जब बड़े होकर कमाने-धमाने लगेंगे तो लोग देखते ही रह जाएंगे। थोड़ा-थोड़ा भी कमाएंगे तब भी बहुत होगा। कैसी विडम्बना है कि कोई बच्चों से परेशान है और कोई एक बच्चे के लिए तरस रहा है।

अपने इसी सोच के चलते नागेंद्र धीरे-धीरे धनहीन और दरिद्र हो गए। किंतु सतीश नि:संतान ही थे। काफी देव अर्चना के बाद भी उन्हें कोई औलाद ही न नसीब हुई। इसलिए काफी सोच-विचार के बाद वह नागेंद्र की ओर मिल गए। नागेंद्र और सतीश ने आपस में मिलते ही राजेश बाबू को अकेला छोड़ दिया। परन्तु उनसे अलग-थलग होने पर भी उन पर कोई विशेष फर्क न पड़ा।

परिवार की गाड़ी पूर्ववत चलती रही। मनुष्य कितना स्वार्थी हो गया है कि दूसरे का पनपना देखकर वह मन ही मन कुढ़ने लगता है। भाई, भाई को भी भूल जाता है। उनका रहन-सहन देखकर दोनों भाइयों को राजेश के बीवी-बच्चों से द्वेष होने लगा उनके हृदय में ईष्र्या की ज्वाला भड़क उठी। उनके नीयत में खोट आ गई। नागेंद्र सोचने लगे- सतीश बे-औलाद हैं। उनकी सारी संपत्ति तो अपनी है ही। हर्रै लगे न फिटकिरी और काम भी चोखा। राजेश के हिस्से की खेती-बाड़ी और मकान भी अगर अपने नाम हो जाय तो क्या कहने? एकदम सोने पर सुहागा होगा। सतीश की दौलत और जमीन मिलने की पति-पत्नी को आशा तो थी ही। वे राजेश का हिस्सा भी हड़पने का उपाय सोचने लगे।

नागेंद्र और उनकी पत्नी राजेश बाबू को अपने विकास मार्ग का सबसे बड़ा काँटा समझने लगे। पाप ने घेरा तो नागेंद्र, सतीश और उनकी पत्नी नेहा को राजेश बाबू के विरूद्ध भड़काना शुरू कर दिए। आहिस्ता-आहिस्ता कुछ और वक्त बीतने के बाद वह राजेश को रास्ते से हटाने की सोचने लगे। दोनों भाई अपनी-अपनी पत्नियों के साथ मिलकर षड़यंत्र रचने लगे। खून अपने खून के साथ ही छल-कपट करने की जुगत में व्यस्त हो गया।

सतीश को सच-झूठ और न्याय-अन्याय का कोई ज्ञान तो था नहीं। नागेंद्र जो कहते, मान लेते। ना-नुकर बिल्कुल भी न करते। सिर झुकाकर बड़े भाई की बड़े अदब से हामी भर देते।

नागेंद्र ने उन्हें इतना अधिक उसकाया कि सतीश की पत्नी नेहा ने एक दिन पुलिस थाने में जाकर राजेश और उनकी पत्नी करूणा के खिलाफ एक बे-बुनियाद और झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। उसने रिपोर्ट में राजेश और सुधा को नामजद करते हुए लिखाया कि मेरे मँझले जेठ राजेश और उनकी पत्नी करूणा मुझे पीहर से कम दहेज लाने के लिए मानसिक रूप से प्रताडि़त करने साथ-साथ शारीरिक रूप से भी तरह-तरह का अपार कष्ट देते हैं। वे मुझे नाहक ही आए दिन सताते रहते हैं। रात-दिन भाँति-भाँति की पीड़ा पहुँचाते हैं। जब होता है तब गाली-गलौज करते हुए दोनों मुझे डंडों से मारते-पीटते भी हैं। कभी-कभी वे हाथों से ही बाल पकड़कर मेरी ताबड़तोड़ पिटाई करते हैं। मेरी जान हरदम खतरे में है। मुझे शक है कि कहीं किसी रोज वे जान से ही न मार डालें।

थाने के दरोगा ठाकुर थानसिंह, राजेश के बड़े भाई नागेंद्र के परिचित थे ही। बड़े ही अन्याई और दुराचारी स्वभाव के थे। गरीब और शरीफों का गला रेतनें में बड़े अभ्यस्त थे। ऐसे लोगों को सताने में उन्हें बड़ा आनंद आता। हजार-दो हजार की लालच में न्याय ओर कानून को दिन दहाड़े ठेंगा दिखा देते। जनता से शिकायत मिलने पर बड़े-बड़े अफसर भी उनका बाल भी बाँका न कर पाते। बड़े नि:संकोची और रिश्वतखोर अधिकारी थे वह। नागेंद्र के मन मुताबिक मामला दर्ज करानें में सतीश और नेहा को ज्यादे मसक्कत न करनी पड़ी। आखिर चोर ने मौसेरे भाई का साथ खूब निभाया।

थानसिंह जबसे वहाँ के थाना प्रभारी बने, इलाके में गरीबों और शरीफों का जीना मानो मोहाल हो गया। किसी के दु:ख-दर्द से उन्हें कुछ लेना-देना न था। मुकदमा दर्ज होते ही नेहा का कथन सुनकर थानसिंह भड़क उठे। वह कहने लगे- अच्छा! तो उनकी यह मजाल कि मेरे इस थाने में रहते हुए भी वे तुम्हें इस कद्र सताएं? मेरा भी नाम ठाकुर थानसिंह है। इतना तेाड़ूंगा कि जिंदगी भर याद रखेंगे। उन्हें सारी उम्र जेल में सड़ा दूँगा। सबसे पहले तो जी भर मैं उनकी पिटाई करूँगा। जब मारते-मारते थक जाऊंगा तो उठाकर जेल में ठूँस दूंगा। वे भी क्या याद करेंगे? ऐसा कर दूंगा कि वे सौ बार सोचने पर विवश हो जायं कि किसी थानेदार से पाला पड़ा था।

दरोगा जी के हुक्म की तामील होते ही राजेश और करूणा आनन-फानन में हिरासत में लेकर गिरफतार कर लिए गए।थानसिंह पहले उन्हें दुश्मन की भाँति मारे-पीटे। रिश्वत ने न्याय का गला घोंट दिया। नायब कोर्ट दरोगा जी का मातहत तो था ही। सरकारी वकील सक्सेना जी भी उनके पक्ष में हो गए। पूरा अभियोजन अब राजेश और करूणा के खिलाफ था।

आखिर,जज साहब पति-पत्नी को जमानत देने में विवशता जाहिर कर दिए। फिर थानेदार साहब, पति-पत्नी को अदालत से चालान कटाकर उनकी जमानत का विरोध करते हुए हवालात भेज दिए। नागेंद्र इतने शातिर बदमाश थे कि गाँव का कोई आदमी या रिश्तेदार मारे डर के उनकी जमानत लेने को तैयार ही न हुआ। तारीख पर तारीखें पड़ती रहीं। मुकदमा लंबा खिंच गया। न्याय की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इंतजार की घडि़या लंबी होती ही हैं। ये मनुष्य को चिंतामग्न कर देती हैं।

राजेश और करूणा हवालाती बनकर तब तक जेल में ही थे कि ढाई-तीन साल का समय बीत गया। राजेश बाबू के बच्चे कुछ दिन जरा-मरा ठीक रहने के बाद भूखों मरने लगे। उनके पुत्र-पुत्री माँ-बाप के जीते जी दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए। राटियों के लाले पड़ने लगे। वे अपने माता-पिता को याद करके तड़प उठते। उनका दिन तो किसी तरह गुजर जाता पर, रात बीतने का नाम ही न लेती। तीनों बच्चें को उनकी चिंता सताने लगी। उधर कचहरी में गवाहियों का दौर चला तो सतीश और नेहा के साथ-साथ अन्य सभी सरकारी गवाहों ने भी हृदय पर पत्थर रखकर राजेश और करूणा के विरूद्ध ठोंककर गवाही दी।

तदोपरांत कोर्ट का फैसला भी आ गया और पति-पत्नी को सात-सात साल की कठोर कारावास की सजा हो गई। वे काल कोठरी में डाल दिए गए। वे जेल के जेल में ही रह गए। बच्चे उन्हें बहुत याद आते। उनकी याद आते ही वे सिहर उठते। दोनों प्राणी का कलेजा दहल उठता। उनके मुँह से आह निकल जाती। नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती। विवशतावश वे पंखहीन पक्षी की भाँति फड़फड़ाते रह जाते।

अदालती दंड मिलने के बाद नागेंद्र एक रोज उनसे मिलने जेल गए और हमदर्दी जताने की गरज से ढोंग का चोला ओढ़कर उन्हें झूठी तसल्ली देते हुए बोले- भाई, क्या करें? मजबूरी है। अच्छा-भला घर था। न जाने किसकी नजर लग गई। आज ऐसा दिन देखना पड़ रहा है। न जाने किसने सतीश का कान भरकर सारा खेल बिगाड़ दिया। लेकिन, तुम चिंता बिल्कुल भी न करो। रही बात बच्चों की तो उनकी फिक्र भी करने की जरूरत नहीं है। हम हैं न? हमारा भी कुछ फर्ज है। मैं उन्हें पढ़ाऊंगा, लिखाऊंगा। कोई तकलीफ न होने पाएगी। हम पर भरोसा रखो। आखिर हम तुम्हारे अग्रज हैं। वक्त-वक्त की बात है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

राजेश ने सोचा-जैसी बहे बयार पीठ तस दीजौ। खूँखार से खूँखार और खतरनाक, पशुवत मनुष्य भी कभी न कभी बदलता ही है। हो सकता है भाई साहब भी सुधकर रास्ते पर आ गए हों।

अत: संतुष्ट होकर वह सिर हिलाते हुए हामी भरकर बोले-ठीक है भाई साहब, उन्हें आप अपने पास ही रख लें। वरना, उनका जीवन बर्बाद होने में तनिक देर न लगेगी। एक बार धोखा देने वाले के दुबारा मित्रतापूर्ण व्यवहार को स्वार्थहीन समझने वाला सदैव धोखे में रहता है। राजेश इतने साफ दिल के इंसान थे कि नागेंद्र से एक बार तगड़ा झटका खाकर भी पुन: उनकी मीठी-मीठी बातों में आ गए।

नागेंद्र के मन में आन बगल में छुरी थी ही। पति-पत्नी को सांत्वना देकर घर लौट आए और अपने घिनौने इरादों को कामयाब बनाने में जुट गए। न जाने किस मिट्टी के बने थे वह। मानव होकर मानवता को भूल गए। वह एक तीर से दो शिकार करने की ठान ही चुके थे। सच-झूठ का सहारा लेकर एक ओर पति-पत्नी को जेल की हवा खाने को मजबूर कर दिए दूसरी ओर राजेश के बच्चों को अपने ही पास रखकर कहीं अन्यत्र जाकर सुरक्षित बचने से रोक लिए। बच्चे बेचारे मानो अजगर के मुँह में ही चले गए।

समय पंख फैलाकर उड़ता रहा। कई वर्ष गुजर गए। राजेश बाबू के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सब छूट गई। वे कहीं के न रहे। उनका जीवन बिल्कुल वीरान हो गया। हकीकत को दूर, उन्हें कोई झूठ को भी पूछने वाला न था। पढाने-लिखाने को कौन कहे? वे दो जून की रोटियों को भी तरसने लगे। अगर पंख होता तो वे उड़कर मां-बाप के पास चले जाते। उनके फूलों जैसे कोमल चेहरे कुम्हला गए। उनसे अपना दुखड़ा कहकर दिल का बोझ हल्का कर लेते। पर पिजड़े में बंद पक्षी की भाँति वे एकदम लाचार थे। उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

इसी बीच राजेश बाबू की इकलौती बेटी रीता शादी योग्य हो गई। माता-पिता जेल में ही थे। नागेंद्र के मन में फर्क तो पहले ही आ गया था। शनै:-शनै: उनका ईमान पूरी तरह डगमगाने लगा। उनके कदम तेजी से बेईमानी की राह पर बढ़ने लगे। लालच ने उन्हें चारों ओर से धर दबोचा। तब वह आसुरी शक्तियों के वशीभूत होकर एक और बड़ी फितरती चाल चलने की सोचने लगे। राजेश बाबू की खेती-बाड़ी हथियाने के मकसद से वह रीता का विवाह अपनी उम्र के एक अधेड़ आदमी से करने के लिए उस पर तरह-तरह का दबाव डालने लगे। बल्कि यों समझिए कि वह उसे बेचने का यत्न करने लगे। लेकिन माता-पिता की गौर-मौजूदगी में रीता को यह शादी कदापि रास न आ रही थी।

वह विवश होकर बोली-संसार में मातृ-पितृ प्रेम ही सत्य और अक्षय है। बाकी सब कुछ मिथ्या है। रीता विकल होकर आपे से बाहर हो गई। बड़ी दिलेरी से वह उनका खुलकर विरोध करने लगी। खुल्लम-खुल्ला बगावत करने पर उतर आई। मेरे माँ-बाप जेल में सड़ रहे हैं और आपको मेरी शादी करने की सूझ रही है।

यह सुनते ही दिन-प्रतिदिन नागेंद्र और कामिनी के तरह-तरह के दबाव की पराकाष्ठा सारी हदें पार कर गई। उस पर जोर-जुल्म बढ़ता ही गया।

अंत में कोई वश चलता न देख हार-थककर नागेंद्र धमकी भरे लहजे में रीता से बोले-तुम्हारे माता-पिता पिछले कई साल से जेल की रोटी तोड़ रहे हैं। तुम लोग मेरी कमाई पर यहाँ मौज कर रहे हो। यह बताओ, अब तुम्हें भर-भर पेट कमाकर खिलाएगा कौन? शादी कर लो। इसी में तुम सबकी भलाई है। आखिर विवश होकर रीता एक दिन शाम को मरने के लिए घर से बाहर निकल पड़ी। उस समय उसका कलेजा कुम्हार के आवें की तरह सुलग रहा था। पास में पैसे तो थे नहीं कि कहीं से जहर खरीदकर खा लेती। परंतु उसके पास एक फूटी कौड़ी तक न थी।

मरने के इरादे से वह घर से काफी दूर एक सड़क के किनारे खड़ी होकर सोचने लगी- लाओ किसी बस या ट्रक के नीचे कूदकर अपनी जान दे दूँ। ऐसी स्थिति में जीने से तो मर जाना ही बेहतर है। रीता की दिमागी उलझन धीरे-धीरे बढ़ती गई। अवसर देखकर वह एक ट्रक के नीचे कूदने ही वाली थी कि वह सायं से आकर उसके आगे रूक गया।

ट्रक ड्राइवर प्रेम कुमार बड़े ही नेक और सज्जन पुरूष थे। वह बेटी समान रीता को भाँति-भाँति खूब समझाए-बुझाए। उसे ढाढ़स बंधाकर अपने घर ले गए। घर में रीता को देखकर उनकी पत्नी शकुंतला और बच्चे बड़े प्रसन्न हुए। अगले दिन सबेरे प्रेम कुमार उसे लेकर उसके माता-पिता से मिलाने जेल भी ले गए। रीता के माँ- बाप बेटी और प्रेम कुमार से बच्चों की दर्द भरी दास्तां सुनकर तड़प उठे। उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी। पति-पत्नी पंख कटे पक्षी की भाँति छटपटाकर रह गए।

विधि का विधान देखिए कि ट्रक की मालकिन कोई और नहीं, बल्कि शहर की लोकप्रिय और ईमानदार दंडाधिकारी श्रीमती अनुपमा देवी थीं। प्रेम कुमार, रीता को ले जाकर उनसे भी मिला दिए। रीता की दु:ख भरी दयनीय कहानी सुनकर उनका हृदय पिघल गया। वह देखते ही देखते द्रवित हो उठीं।

आखिरकार न्यायबल ने हारकर पशुबल का सहारा लेने का निर्णय लिया। यानी अनुपमा देवी काफी माथा-पच्ची करने के बाद पुलिस के शरण में चली गर्इं। उन्होंने आनन-फानन में पुलिस को बुलाकर नागेंद्र और उनकी पत्नी कामिनी के खिलाफ सख्त से सख्त मुकदमा दर्ज करके रीता को न्याय दिलाने का हुक्म जारी कर दिया। साथ ही यह भी फरमान जारी कर किया कि रीता के माता-पिता से जुड़े पुराने मुकदमे की भी दुबारा कड़ाई और ईमानदारी से जाँच की जाय। दोषी मिलने पर नागेंद्र और कामिनी के साथ ही साथ थाना प्रभारी थानसिंह के विरूद्ध भी सख्ती से कठोर कार्रवाई की जाए।

अनुपमा देवी और प्रेम कुमार कितने नेक थे। पलक झपकते ही यह खबर जेठ के लू की तरह सारे मुहल्ले में फैल गई। खबर मिलते ही लोगों में हाय-तोबा मच गई। पुलिस ने भी हुक्म की नाफरमानी करने की मामूली सी भी जुर्रत न की।

थाने के नए दरोगा जीतनारायण बाबू ने बड़े साफदिली और नेक नियति का परिचय दिया। कोई उन पर नाहक ही ऊंगली उठाए, उन्हें कदापि पसंद न था। मामला दर्ज होते ही वह नागेंद्र और कामिनी को हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिए। तदोपरांत कोर्ट में पेश करते ही दोनों को तुरंत जेल भी भिजवा दिए।

उधर मामले की छानबीन पूरी होते ही राजेश बाबू और करूणा जेल से रिहा कर दिए गए। अन्याय पर न्याय भारी पड़ा। रीता और उसके परिवार को न्याय मिल गया। दूध का दूध और पानी का पानी सब अलग हो गया।

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