शनिवार, 19 जनवरी 2013

महावीर सरन जैन का संस्मरण - मोरेश्वर दिनकर पराडकरः स्मृतियों को नमन


डॉ. मोरेश्वर दिनकर पराडकरः स्मृतियों को नमन

           मुम्बई हिन्दी विद्यापीठ के मासिक मुखपत्र 'भारती' के जनवरी, 2013 के अंक से विद्यापीठ के कुलपति डॉ.  मोरेश्वर दिनकर पराडकर के स्वर्गवास होने की दुखद सूचना प्राप्त हुई। पहले मेरा मन उनकी मृत्यु के समाचार पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हुआ। अनन्तर, मेरी बुद्धि ने मुझे उद्बुद्ध किया कि भारतीय साधना परम्परा के अनुसार मृत्यु यात्रा का एक पड़ाव है - नवीन जीवन प्राप्त करने का उपक्रम। गीता का वचन है :- 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृत्स्य च'


            मन में उनके आत्मीय व्यक्तित्व का जो बिम्ब उभर रहा है वह उनके बहुआयामी पहलुओं को रेखांकित करता है; उनकी हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार की प्रतिबद्धता तथा उनके मनोयोग की मननशीलता एवं आत्मबल की तेजस्विता को चित्रांकित करता है। सन् 1990 अथवा 1991 में, मैं जब भारत सरकार की ओर से विद्यापीठ का निरीक्षण करने गया तथा उस अवधि में विद्यापीठ के कुलपति डॉ ़ मोरेश्वर दिनकर पराडकर के सम्पर्क में आया तब  अपने जीवन-आचरण की आत्मीयता, सौजन्यशीलता एवं शुचिता के कारण डॉ ़ मोरेश्वर दिनकर पराडकर  मेरे सम्मान के आलम्बन बन गए। इस भेट में उनके व्यक्तित्व की शालीनता, भव्यता एवं उदात्त उत्कृष्टता की छाप मेरे मन पर अंकित हो गई।


उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ, अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन तथा महाराष्ट्र राज्य शासन आदि राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं के पुरस्कारों से सम्मानित डॉ ़ मोरेश्वर दिनकर पराडकर संस्कृत तथा अर्धमागधी के व्याख्याता भी रहे। भारतीय अनुवाद परिषद् के संस्थापक होने के साथ-साथ आप अनेक प्राच्य विद्या संस्थाओं से सम्बद्ध रहे। हिन्दी और मराठी में आपने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रणयन तथा सम्पादन किया। हमने विद्यापीठ के कुलपति डॉ ़ मोरेश्वर दिनकर पराडकर की इन्हीं सेवाओं को ध्यान में रखकर, उन्हें भारत के महामहिम राष्ट्रपति जी के कर कमलों से 'राष्ट्रपति भवन' में  केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के 'गंगा शरण सिंह पुरस्कार' से सम्मानित कराकर आत्म संतोष का अनुभव किया। वे इस पुरस्कार को ग्रहण करने के लिए सन् 1999 अथवा 2000 में नई दिल्ली आए तथा उन्होंने हमारा आतिथ्य स्वीकार किया। उस अवधि में मुझे उनसे अनेक विषयों पर चर्चा परिचर्चा करने तथा उनको निकट से जानने पहचानने का अवसर प्राप्त हुआ। उसके बाद अनेक समितियों की बैठकों में उनके साथ वार्ता करने का सुयोग प्राप्त हुआ। उनकी जिज्ञासा वृत्ति, प्रबुद्ध दृष्टि, संवाद शैली एवं सहज आत्मीय विनम्रता ने जो छाप मेरे मानस-पटल पर अंकित की उससे प्रसूत स्मृति-धाराएँ  इस लेख को लिखते समय मेरे हृदय-सागर को लहरा एवं गहरा रही हैं।


प्रोफेसर महावीर सरन जैन
(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार, आगरा)
123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर (उ ़ प्र ़ ) 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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