बुधवार, 16 जनवरी 2013

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - लपका-संस्कृति

लपका-संस्‍कृति

यशवन्‍त कोठारी

हिन्‍दी साहित्‍य में समय समय पर कई वाद अवतरित हुए और इतिहास में समा गये। इधर साहित्‍य में एक नये वाद का बड़ा बोल बाला है भाई लोग इसे पर्यटन की तर्ज पर लपकावाद कह रहे है। लपके केवल पर्यटन में ही सक्रिय हो ऐसा नहीं है। लपके चिकित्‍सा में भी है। लपके दफ्‌तरों में भी है। लपके राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्रों में भी है। सभी क्षेत्रों में जब लपके सक्रिय है तो साहित्‍य का क्षेत्र अछूता कैसे रह सकता है ?

जो लोग कविता कहानी के क्षेत्र में असफल हो जाते है वे व्‍यंग्‍य के क्षेत्र को लपक लेते है। जो व्‍यंग्‍य में अपेक्षित सफलता प्राप्‍त नहीं कर पाते वे आलोचना को लपक लेते है। जो आलोचना में असफल होते है वे कविता को लपक लेते है, और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। कभी कभी कोई सम्‍पादक जो काफी समय से केवल पत्रकार थे केवल अपने सीने पर साहित्‍य का तमगा लगाने के लिए व्‍यंग्‍य को लपक लेते है। अपना अखबार है, अपनी कुर्सी है, तुरन्‍त कुछ व्‍यंग्‍यनुमा लिख कर अपने अखबार में छाप लेते है और व्‍यंग्‍यकार रुपी साहित्‍यकार बन जाते है। किसी प्रकाशक को पट़ा कर पुस्‍तक भी छपा लेते है। किसी मंत्री से विमोचन करवा कर थोक खरीद में भी अपनी पुस्‍तक भिड़ा देते है और लपका-चिन्‍तन को सार्थक करते है। लपके कई बार गिरोह बना कर लपकागिरी करते है। असफल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। कुछ लपके साहित्‍य अकादमी को लपक लेते है। राजनीति में भी लपके गिरोह सक्रिय रहते है।

कल ही एक लपका लेखक मिले। बड़े प्रसन्‍न थे, बोले- आजकल आलोचना के क्षेत्र को लपक लिया है। तुम कहो तो एक -दो समीक्षाएँ लिख दूं। मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा वे चुपचाप लपकागिरी करने चले गये। लपकों का संसार असीम होता है। वे साहित्‍य संस्‍कृति, कला, पत्रकारिता, राजनीति, कहीं भी लपकागिरी करते हुए मिल जायेंगे। कल तक जो कवि थे वे आज सम्‍पादक और परसों आलोचक और तरसों कहानीकार भी बन जाते हैं। लपकों में प्रतिभा ही प्रतिभा होती है। वे अपनी प्रतिभा का उपयोग कहीं भी कभी भी कर सकते है। वे फ्राड को जीनियस और जीनियस को फ्रा‍ड बना सकते है। वैसा सच पूछा जाये तो सभी लपके फ्रा‍ड ही होते है, मगर वे स्‍वयं को जीनियस समझते है।

कार्यालयों में पाये जाने वाले लपके मिडिल मेन का काम करते है। वे मैंगो मेन की हजामत बनाते रहते है। इन बनाना रिपब्‍लिक में हर तरफ लपको का जलवा है। लपके कुर्सी भी लपक लेते हैं।

चिकित्‍सा क्षेत्र के लपके आपको ऐसे डाक्‍टर के पास ले जायेंगे जो आपकी जेब पर डाका डालने का विशेषज्ञ हो।

कार्यालयों के बाहर मिलने वाले लपके स्‍वयं को साहब का खास आदमी, या भाई, भतीजा, भाणजा, चमचा कुछ भी सांबित कर सकते हे। वे आपका काम चुटकियों में कराने का वादा करते है और आप से भारी रकम ऐंठ सकते है।

लपकों को पकड़ना आसान नहीं है, क्‍योंकि लपके रुप बदल बदल कर समाज में विचरण करते रहते है। लपकों से बचने का कोई रास्‍ता नहीं है, लपकों को पालने की आवश्‍यकता है। बिन लपका सब सून।

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यशवंत कोठारी ,८६,लक्ष्मी नगर,ब्रह्मपुरी बाहर,जयपुर -मो.-9414461207

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