सोमवार, 21 जनवरी 2013

अर्जुन प्रसाद की कहानी - भाग्यवान

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भाग्यवान

प्रात: काल की सौर करना सेहत के लिए अच्छा माना जाता है  सुबह के सौर-सपाटे से सुस्ती दूर होते ही शरीर में फुर्ती आ जाती है। इससे अपच और कब्ज भी मिट जाती है। भोर होते ही विनोद शंकर शर्मा भी सौर करने वालों की जमात में शामिल हो जाते। कुछ देर चलने-फिरने के बाद परिचितों से जमकर गपशप करते। दयाशंकर की शरीर हरहरी थी और चेहरा गोल। रूप-रंग ऐसा कि मनमुग्ध हो जाय। बड़े हँसमुख व्यक्ति थे। चेहरे पर छोटी-छोटी मूँछें और माथे पर पीले चंदन की शांतिमयी छाप सुशोभित थी। बदन पर कमीज और पैन्ट रहता तो आँखें पर चश्मा लगा रहता।

बड़े ही मधुरभाषी, सज्जन और विनयशील व्यक्ति थेद्य सुशिक्षित तो वह थे ही, बड़े ही सभ्य और संस्कारवान भी थे। सुख-दुख में उनसे सलाह लेते। शर्मा जी की पत्नी उर्मिला भी शिक्षित और बड़ी सुशील भद्र महिला थीं। ध्घर का सारा काम काज संभालती थी। दयाशंकर रक्षा मंत्रालय के लेखा विभाग में लेखा परीक्षक थे तो उनका बेटा सिद्धार्थ शंकर रेलवे में टिकट परीक्षक था। घर में ईश्वर का दिया हुआ सब कुछ था। गृहस्थी की गाड़ी बड़े चैन और सुकून से चल रही थी। घर-परिवार में कहीं कोई कमी न थी। यकायक सुबह की सौर पर आने-जाने वालों में यह खबर फैल गई कि भई शर्मा जी बडे धनाड्य और पेसे वाले हैं। बाप-बेटे की पाँचों ऊँगलियां घी में हैं। घर में धन-दौलत की कोई कमी नहीं। घर का कोना-कोना माल-असबाब से भरा हुआ है। एक बेटा है वह भी घर से बाहर। शर्मा जी इतने दौलतमंद हैं कि उसका सुख भोगने वाला कोई भी नहीं। क्या मुकद्दर पाया है उन्होंने। लक्ष्मी की उन पर बड़ी कृपा है।

दिसम्बर 2006 की बात है शर्मा जी के दौलतमंद होने की भनक धीरे-धीरे चम्बल के बीहड़ों तक चली गई। जेठ की लू की भाँति बीहड़ सम्राट ददुआ, अभयगुर्जर और जगन गुर्जर के कानों तक भी यह बात पहुँच गई। उन्होंने एक-दूसरे से आपस में मशविरा करके भूरा गिरो को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी कि जाने-माने धनी परिवार के व्यक्ति को उठाकर वह उनके हवाले करेगा। शर्मा जी इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। मस्ती से घूमते-घामते टैंक रोड चैराहे पर पहुँच गए। वहाँ जाते ही वह ठेलकर एक लक्जरी और सुन्दर विदेशी मोटर कार में डाल दिए गए। पहले से ही शर्मा जी की तलाश में इधर-उधर घात लगाकर बौठे भूरा गैंग के सदस्यों ने पिस्तौल की नोक पर सरेआम दिन दहाड़े उनका अपहरण कर लिया। शर्मा जी कुछ समझ पाते कि इससे पहले ही कार फुर्र से सबकी आँखों से ओझल हो गई। पलक झपकते ही शर्मा ही को लेकर कार न जाने कहाँ गायब हो गई। अब उनकी खोज-खबर लेने वाला वहाँ कोई न था।

शर्मा जी वैसे तो रोज सात-साढ़े सात बजे तक घुम-टहल कर वापस पहुंच जाते थे। पर उस दिन उनका कही अता-पता ही न था। अहिस्ता-अहिस्ता आठ बज गए। ड्यूटी जाने की तैयारी करने का समय हो गया।

यह देखकर उर्मिलादेवी चिंतित हो उठीं। वह सशंकित हो गर्इं कि सुबह-सुबह अचानक कहीं शर्मा जी की तबीयत न खराब हो गई हो। देखते-देखते साढ़े आठ बज गए। किसी अनहोनी का विचार मन में आते ही वह कांप उठी। वह मन में सोचने लगीं-अगर उन्होंने आज दफ्तर से छुट्टी ले ली और घर पर ही रहना है तो वह हमें बताए क्यों नहीं। पूजा-पाठ करके चाय वगैरह पी लेते तब कहीं चले जाते। मुझे बगैर बताए ही न जाने कहाँ चले गए। हे परमात्मा अब मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ। इतना सीधापन भी किस काम का कि ऑफिस जाने को भी याद न रहे। उर्मिला यह सोचकर विकल हो उठी। कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई। कहीं शर्मा जी हादसे के शिकार तो नहीं हो गए। कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है। वरना पंडित जी जानबूझकर कार्यालय से छुट्टी करने वाले नहीं हैं।

यह सोच-विचार करते-करते उर्मिला देवी भी अपने देवर और देवरानी के साथ चैराहे पर जा पहुँची। आस-पास के राहगीरों से पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि दो-तीन आदमी एक बड़ी कार में बिठाकर शर्मा जी को कहीं ले गए हैं। यह सुनते ही उर्मिला और उनके देवा- देवरानी सन्न रह गए। उनके समझ में आ ही न रहा था कि शर्मा जी का पता किससे और कहाँ लगाए।

उर्मिला अपने देवर से बोली-देवर जी, जल्दी कुछ कीजिए। मेरा दम घुट रहा है। अपने भइया का चाहे जैसे भी हो हर हाल में पता अवश्य लगाइए। वह न जाने कहाँ और कैसे हैं। अभी पिछले पखवाड़े की तो बात है। भूरा गिरोह ने एक पुलिस वाले का ही दिन दहाड़े अपहरण कर लिया था। इससे कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी डाक्टर को भी उस गिरोह के बदमाश उठा ले गए थे।

विनोद शंकर के छोटे भाई मुंबई में रेल विभाग के वाणिज्य पर्यवेक्षक थे। लेकिन उनके मंझले भाई घर पर ही रहकर यजमानी का काम धंधा संभालते थे। चूँकि वह कर्म काण्डों में ही यकीन करते थे। वह आव देखे न ताव। झटपट कहने लगे -हे वंशी वाले मैं तेरी आरती उतउरूँगा। मैं तेरा पुजारी हूँ। तेरा गुणगान करूँगा। तू जैसे भी हो, मेरे बड़े भाई विनोद का पता बता दे। माँ समान भाभी की यह दुर्दशा मुझसे नहीं देखी जाती है। इतने में उर्मिला की देवरानी कहने लगी- जय श्री राधे। राधे-राधे बोलो, चले आएंगे बिहारी। कहने का अभिप्राय जिसे जो खूझता, करने लगता। विवश होने पर मनुष्य ईश्वर की शरण में अवश्य चला जाता है। विनोद बाबू ब्राहमण तो थे ही। परिवारके लोग कोई वश न चलता देखकर हड़बड़ी में भक्ति-भजन का सहारा लेकर सिर पर आई बला को टालने का बड़े इतमिनान से प्रयास करने लगे। शर्मा जी को तलाशते-तलाशते तीन-चार घंटे बी गए। पर उनकी कहीं अता-पता ही न चला।

दोपहर होते-होते विनोद बाबू के भाई के मोबाइल फोन की घंटी एकाएक घनघना उठी। विनोद बाबू टेलीफोन पर उनसे बोले- मैं विनोद बोल रहा हूँ। मेरी फिक्र न करना। मैं यहाँ भूरा भाई के पास मजे से हूँ। बड़े ईमानदार सज्जन और नेक लोग हैं। वो भी जी में आता, वह फटाफट बेखटके बोलते ही जा रहे थे। गुर्जर भाईयों का गुणगान करके उनकी तारीफों के पुल बांध रहे थे। कितने शांत और विचित्र प्राणी थे।

गिरोह के पास जाकर उन्हें जरा भी कष्ट और बंधन में होने का अहसास न हुआ। मानो वह दीन-दुनियां के तमाम बंधनों से मुक्त हो गए न बीबी-बच्चों की चिंता और न घर-परिवार की फिक्र। देवर के हाथ से फोन लेकर जब उर्मिला देवी न उनसे कुशल-क्षम पूछा तो वह फौरन बेधड़क बोले अरे, पगली-मेरी चिंता करने की अब कोई जरूरत नहीं। मुझे यहाँ तनिक भी परेशानी नहीं है। वहाँ से काफी बेहतर हूँ। नहाने-धोने और पूजा-पाठ करने की पूरी आजादी है। कहीं कोई बंधन नहीं। घर से सौ गुना अच्छी हालत में हूँ। खाने-पीने को भी समय से मिल जाता है। समझो मैं अब सारे झंझटों से मुक्त हो गया। बुढ़ापा चैन से कट जाएगा। भई ये लोग भी इंसान हैं। कोई दैत्य या जानवर थोड़े ही हैं। मैं जब से यहाँ आया तब से समझो मौज ही मौज है। दो-चार घंटे में ही 300 ग्राम से ज्यादे ही शुद्ध देशी घी खाने को मिला। मेरा वश चला तो मैं अब इनके पास ही रहूँगा। वहाँ आकर फिर सांसारिक माया-मोह में नहीं भटकना चाहता।

दया बाबू की बात सुनकर उर्मिला देवी के मुँह से आह निकल गई। वह कहने लगीं-अर्जी मसखरी छोडि़ए, जहाँ भी हैं, फौरन घर चले आइए। आपके बगैर मैं जिंदा न रह पाऊँगी। मेरा कुछ तो ख्याल कीजिए। आखिर आप मेरे पति-परमेश्वर हैं। कम से कम हमसे तो ऐसी बातें न करें। तनिक आप ही सोचिए कि मैं किसके सहारे रहूँगी। बेटा-बहू भी बाहर ही है। वरन् अगर वहाँ इतने ही आराम की बात है तो मुझे भी बुलवा लीजिए। दोनों एक साथ चैन से रहेंगे। मैं ही अकेले यहाँ क्यों रहूँ।

तब विनोद शंकर बोले-क्या पागलों जैसी बातें करती हो। तुम्हें कोई हक नहीं कि मेरे अमन-चैन में दखल दो। चुपचाप वहीं रूखी-सूखी खाकर बेखटके पड़ी रहो और मुझे भूल जाओ। ये भाई लोग कितने शरीफ है। यहाँ आते ही नहाने-धोने के बाद बोले-आपके पास मोबाइल है क्या। मेरे हाँ करने पर वे बोले-घर वाले परेशान होंगे। उन्हें बता दीजिए कि आप कहाँ और कैसे हैं। अब तुम्हीं सोचो-अगर वे हमारा मोबाइल छीन लेते और बात न करने की इजाजत न देते तो क्या होता? तुम लोग रातोंदिन हाथ-पाँव पटकते रहते और मेरा कुछ पता ही न चलता। यह सुनते ही उर्मिला के होश ही उड़ गए। वह कहने लगी-आज आपको क्या हो गया है। कैसी उलटी-सीधी और बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। इतने में फोन स्वत: कट गया।

विनोद शंकर की बातचीत सुनकर गुर्जर बंधुओं को बड़ा ताज्जुब हुआ। भूरा उनसे विस्मित होकर पूछने लगा-अरे यार, आप बड़े विचित्र प्राणी हैं। बीबी या भाई से कहना था कि मैं बदमाशों और लुटेरों के चंगुल में फँस गया हूँ। मुझे जल्दी छुड़ा लो। मैं यहाँ बड़े संकट में हूँ। लेकिन आपने तो हमारा बना-बनाया सारा खेल ही बिगाड़ने को ठान लिया है। हमारे उम्मीदों पर पानी न फेरिए तो ही अच्छा है। नहीं तो रात को कहीं और भेज देंगे। हम आपको यहाँ मेहमान की भाँति बौठाकर खिलाने के वास्ते नहीं, बल्कि पैसों के लिए अपहरण करके लाए हैं। हमें आपकी रिहाई के बदले पैसा चाहिए पैसा। आप पैसे वाले हैं। लेखा परीक्षक हैं। बाप-बेटे दोनों कमा रहे हैं। बीस लाख रूपये मंगवा लीजिए और जाइए यहाँ से। आइंदा भाई और बीबी से ऐसी ऊटपटाँग बाते न करना। समझे या नहीं।

दया शंकर सिर हिलाकर हामी भर दिए। तदोपरांत वह कुछ संभलकर बोले-मैं छोटी-मोटी सरकारी नौकरी करता हूँ। बेटे-बहू हमसे अलग रहते हैं। तन्ख्वाह से बस रोटी-कपड़ा ही बड़े मुश्किल से चल पाता है। न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। बीस लाख को कौन कहे। मुझे जैसे निरीह खूसट के लिए कोई बीस हजार भी न देगा। यह सुनकर अपहरणकर्ताओं को अपर कष्ट हुआ। भरा मन में सोचने लगा-बड़ा सनकी पुरूष है। इसे हमारे गैंग का जरा सा भी कोई भय नहीं।

कुछ देर बाद भूरा कहने लगा-अच्छा एक बात साफ-साफ बताइए कि बीबी-बच्चे वाले हैं। घर-परिवार भी है। तो फिर आप घर जाने को इच्छुक क्यों नहीं हैं। ऐसा न करके आप हमारा बड़ा नुकसान करके हमारी रोटी-रोजी में रोड़े अटका रहे हैं। ऐसा क्यों। यह सुनते ही विनोद बाबू निर्भयता से बोले-भइया आप हमें पकड़कर यहाँ ले आए इसमें मैं आपको दोषी नहीं मानता। मेरे प्रारब्ध में ऐसी लिखी-वदी थी। यह पकड़ अवश्य मेरे पूर्व जन्म के किसी गलत काम का कर्मफल है। भला क्या मजाल कि सरेआम मुझे कोई हाथ भी लगा सके। मैंने पहले जन्म में कोई न कोई पाप जरूर किया है। यह उसी का प्रतिफल है। इसे हर हाल में मुझे भोगना ही होगा। भूरा भाई आप नहीं मानते तो न मानिए। पर सच्चाई यही है कि ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। मनुष्य को अपनी करनी पार उतरनी, कर्मों का फल एक दिन जरूर भुगतना पड़ता है। इसलिए मैं जानबूझ कर इस अवसर को यूँ ही नहीं गंवाना चाहता। इसे हंस-हंसकर भुगत लेना ही चाहता हूँ। ताकि अगले जन्म में भुगतने के लिए कुछ बाकी न रहे।

तब भूरा हंसकर कहने लगा-अच्छा, इसका मतलब आप पक्के ईश्वरवादी और बड़े आस्तिक हैं। दया बाबू बोले-और क्या। मनुष्य कभी नास्तिक नहीं हो सकता। चाहे वह ईश्वरीय अस्तित्व को स्वीकार करे या न करे। क्या फर्क पड़ता है।

विनोद शंकर के तर्क से भूरा कतई सहमत न था। वह झट दूसरा सवाल पूछ बैठा-ऐसे में क्या हमारे धंधे पर लात मारना भी कोई इंसानियत है। मेरे बीबी-बच्चे भूखे रहें, उन्हें रोटी भी नसीब न हो। रात-दिन पुलिस नाहक ही पीछे पड़ी रहे, क्या यह भी कोई इंसाफ है। यह सुनते ही विनोद बाबू बोले-यह आपके अपने कर्मों का फल है। कर्मफल से व्यक्ति कभी नहीं भाग सकता। यही विधि का विधान है।

मैं आपको अपने जीवन की एक घटना सुनाता हूँ। जरा गौर से सुनिए-वर्ष 1978 की बात है। मैं सपरिवार अपनी छोटी बहन की सगाई करने ट्रेन से मुंबई (बम्बई) जा रहा था। अन्य सामान के साथ एक सूटकेस में चाँदी के कुछ बर्तन और दस-बारह हजार नकद रखे हुए थे। गाड़ी में सामान भी ज्यादे था और जाने वाले परिवार के लोग भी। भीड़-भाड़ में भूलवश वह सूटकेस गाड़ी में ही रह गया और हम सब स्टेशन आते ही उतर कर फौरन बाहर निकल गए। लड़के वालों के घर पहुँचने पर हमें अपनी भारी भूल का अहसास हुआ। भाई-बन्धु हम पर बिगड़ खड़े हुए। पिताजी तो मानो आग-बबूला ही हो गए थे। क्रोध के मारे उनके नेत्रों से चिंगारियां निकल रहीं थी। सबका पारा सातवें आसमान पर चढ़ा हुआ था।

किंतु, मैं उस समय भी एकदम निद्र्वन्द्व और शांत था। मुझे लेशमात्र भी पश्चाताप और दु:ख न था। मैंने तब भी सबसे शांतभाव और दृढ़ता से यही कहा था कि छूट गया तो छूटने दीजिए। इतनी हाय-तोबा मचाने से थोड़े ही मिल जाएगा। कहीं नहीं जाएगा, मिलेगा। तब पिताजी आँखें लाल-पीली करके बोले-वाह भई वाह। क्या अच्छा भाषण दे रहे हो। बेटे यह बंबई है बंबई। यहाँ आदमी खो जाए तो नहीं मिलता और तुम हो कि माल भरे सूटकेश की बात कर रहे हो। मैंने तसल्ली देते हुए उनसे कहा-ठीक है मैं जा रहा हूं। इंतजार कीजिए। मैं अभी आया। कुछ धौर्य तो रखिए।

इसके बाद एक लम्बी सांस लेकर विनोद बाबू बोले-भूरा भाई, इतना ही नहीं। आगे और भी सुनिए-मैं सूटकेस गुम होने की रिपोर्ट लिखाने जब रेल सुरक्षा बल के थाने पहुँचा तो इंस्पेक्टर राजवीर सिंह ने तुरंत बताया कि उताबले मत बनिए। आपका सूटकेस लॉक रूम में जमा हे। सबूत देकर ले लीजिए। तदंतर मैं भागकर लॉक रूम पहुँचा तो मेरी खुशी का कोइे ठिकाना ही न रहा। मैं प्रसन्नता से बल्लियों उछल पड़ा। सूटकेस देखकर मेरे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा हे परमेश्वर, तेरा लाख-लाख शुक्र। मैं कितना भाग्यशाली हूँ। प्रमाण देकर मैंने सूटकेस लिया और होने वाले बहनोई के घर चला गया। अब आप ही बताइए। यह प्रारब्ध नहीं तो और क्या है। गाड़ी में भूला सामान बिल्कुल स्टेशन पर सुरक्षित मिला।

वह फिर बोले- भूरा भैय्या, एक और वाकया सुनिए भूरा भाई-अभी हाल ही में मुझे लकवा मार गया। मैं तब भी नहीं डिगा। मेरी एक परिचित महिला डाक्टर जो इसी रोग की विशेषज्ञ है। उन्हें किसी तरह खबर लगी तो मात्र तीन सूइयों में और तीसरे दिन ही भला-चंगा हो गया। अब तक मैं पूरी तरह स्वस्थ्य हॅू। यह भाग्य और कर्म नहीं तो और क्या है। भइया, यही वजह है कि मैं यहाँ भी निश्चित हूँ। गोली मारना है। बेशक मार दीजिए। पर, यह तय है कि अगर जीवित ही रहना है तो गोली विफल हो जाएगी और आप मेरा बाल भी बाँका न कर सकेंगे।

पर, भूरा पर विनोद बाबू की बातों का बड़ा गहरा असर पड़ा। वह बोला-अरे भैय्या, आप जैसे दो-चार और सज्जन भक्त मिल जाएं तो अपना बेड़ा ही गर्क ही हो जाएगा। आहिस्ता-आहिस्ता दिन बीच गया और रात हो गई। विनोद बाबू की आंखों पर पट्टी बांधकर अंधेरी रात में जीप में उन्हें भोला सेंपऊ के जंगलों के बीच खेतों में बनी भूसे की एक बुर्जी में भेज दिया गया। वहाँ उन्हें रहते हुए दो महीने निकल गए। घर-परिवार के लोग काफी परेशान थे।

किंतु विनोद शंकर पलटकर घर जाने का नाम ही न लेते। भूरा बड़े मुश्किल से उन्हें घर जाने के लिए मनाने में कामयाब हुआ। उनके राजी होने पर भूरा ने कहा-देखिए, आपको उठाकर यहाँ लाने और रखने में अब तक हमारा पाँच लाख खर्च हो चुका है। आप अपने घर वालों से कहिए कि हमारे बताई हुई जगह पर पैसे पहुँचाकर आपको यहाँ से ले जाएं।

हाँ, इतना अवश्य ध्यान रहे कि वे पुलिस का कोई चक्कर भूलकर भी न डालें। वरना, खामख्वाह खून-खराबा होने में हम दोनों का नुकसान ही होगा। हमने अपनी ओर से आपको तनिक भी तकलीफ नहीं दिया है। इसलिए अर्ज है कि आप भी हमें किसी प्रकार का कष्ट न दें। विनोद बाबू न चाहते हुए भी हार-थक कर मोबाइल पर उर्मिला देवी से बात किए। उनके घर आने की खबर सुनते ही सब लोग खुशी से उछल पड़े। उर्मिला देवी ने फिरौती के पैसों की जुगाड़ के लिए विनोद शंकर के एक प्रिय मित्र से हाथ जोड़कर विनती किया। बाबू अपने मित्र को बचा लीजिए।

मित्र बड़े विचारशील और नेक पुरूष थे। अपने मित्र को मुक्त कराने के लिए विकल हो उठे। वह फिरौती के पाँच लाख रूपये लेकर फौरन भूरा के बताए गए स्थान पर पहुँच गए। रूपयों से भरा बैग मिलते ही। गैंग वाले खुशी से मचल उठे वे पड़के भोर में ही विनोद शंकर को जीप में बिठाकर मुख्य सड़क पर लाकर छोड़ दिए। तत्पश्चात् दो हजार रास्ते का खर्च देकर भूरा बोला-चुपचाप सामने वाले बस स्टाप पर जाइए और मथुरा जाने वाली किसी बस में बैठकर चले जाएं। घर वाले वाट जोहते होंगे। एक बात और अब इधर मुड़कर भी न देखना। सीधे घर जाना। बीच में भूलकर भी कहीं रूक मत जाना।

यह सुनकर विनोद बाबू पूछ बैठे-और ये रूपये। इनका क्या करूँ। तब गैंग सरदार बोला-रख लीजिए। रास्ते में खाने-पीने और किराए के काम आएंगे। पास हो या दूर, क्या फर्क पड़ता है। हम हर शिकार को इतना ही देकर मुक्त करते हैं ताकि उसे कहीं कोई दिक्कत महसूस न हो। इतने में मथुरा जाने वाली एक बस ज्यों ही स्टैण्ड पर आकर रूकी, दया शंकर ड्राइवर को हाथ देकर फटाफट उसमें सवार हो गए।

घर पहुँचते ही विनोद शंकर से मिलने के लिए उनके मित्रों और रिश्तेदारों का तांता लग गया। एक-एक बार सब लोग उनका कुशल क्षेम पूछने लगे। मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक भी पता लगने पर उनसे मिलने आ पहुँचे। लापरवाही और कर्तव्यहीनता की मुहर लगी होने पर भी गिने-चुने कुछ तेज दिमाग के पुलिस अफसर बड़े ही कर्तव्यनिष्ठ और फुर्तीले होते हैं। प्रशांत कुमार भी इनमें से ही एक चौकस अधिकारी थे। बातों ही बातों में उन्होंने पूछ ही लिया। विनोद जी आप दो चार पकड़ वालों को तो पहचानते ही होंगे।

विनोद शंकर बिना किसी तर्क-वितर्क के फौरन बोले-हाँ, क्यों नहीं। वहाँ जितने लोग थे, मैं सबको भलीभाँति पहचानता हूँ। लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं। यह पूछने पर प्रशांत कुमार बोले-अजी बकरे की माँ कब तक खौर मनाएगी। आखिर जब उसने एक बकरे को ही जन्म दिया है तो एक न एक दिन वह छुरी के नीचे हर हाल में आएगा ही। दस्यु सरगनाओं का अब यही पेशा है तो कभी न कभी किसी और को भी उठाएंगे। ऐसे में यदि आप उनमें से किसी को पहचान लेंगे तो पुलिस का काम सरलता से बन जाएगा। मैं वादा करता हूँ कि उन्हें पकड़ कर जेल की हवा जरूर खिलाऊँगा। मेरा नाम प्रशांत है। मुझसे बच निकलना इतना आसान नहीं है। कानून कमजोर थोड़े ही है कि बदमाश अपनी मनमानी करते रहें।

यह कहकर प्रशांत बाबू अपने दल-बल के साथ बदमाशों के पीछे पड़ गए। वह उन्हें पकड़ने की खातिर रात-दिन एक कर दिए। आखिरकार एक दिन उनके हाथ दो अपहर्ता लग ही गए। विनोद शंकर के पहचानते ही उनकी सारी कलई खुल गई। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करके फौरन जेल रवाना कर दिया।

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