गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - एक हसीन बस का सफ़रनामा

एक  हसीन बस का सफ़रनामा उस समय मेरी मोटर साइकिल की स्पीड 70 किमी/घंटा के आस -पास  रही होगी। सामान्यता दो पहिया वाहनों को जिस तेज़ गति से चल...

आशीष कुमार त्रिवेदी की लघुकथा - सौर

  सौर दिनेश को आज घर लौटने में देर हो गयी थी। जूते उतार कर वह पलंग पर लेट गया। वह बहुत थका हुआ था। आज का दिन अच्छा नहीं बीता था । काम भी और...

चंद्रेश कुमार छतलानी, गिरिराज भंडारी, नीरा सिन्हा, उमेश मौर्य, मनोज 'आजिज़', सुधीर मौर्य 'सुधीर', और शशांक मिश्र भारती की कविताएँ और ग़ज़लें

चंद्रेश कुमार छतलानी और चाँद डूब गया वो था मेरा ही तो अस्थि-कलश, मैं ही जान ना पाया | लिख रहा था बिना स्याही की कलम से, मान ना पाया |   बन...

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

पुस्तक समीक्षा - इंसानियत की ख़ुश्बू से लबरेज़ है .... “ख़ाकी में इंसान”

  इंसानियत की ख़ुश्बू से लबरेज़ है .... “ख़ाकी में इंसान” बहुत पहले हुक्का बिजनौरी की कुछ पंक्तियाँ सुनी थी , सुनकर हंसी भी आयी और दुःख भी हुआ...

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

प्रमोद भार्गव का आलेख - आतंकवाद का साया क्या भारत में अनंत काल तक मंडराता रहेगा?

आतंकवादः कड़े कानूनी उपायों की जरुरत प्रमोद भार्गव आतंकवादी रंग की दलीलों के बीच एक बार फिर हैदराबाद में आतंकी हमले ने खून से लाल इबारत लिख...

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

चंद्रेश कुमार छतलानी का आलेख - उपवास की महत्ता

उपवास की महत्ता सर्वप्रथम मैं पाठकों को एक सच्ची राय देना चाहूंगा, इस लेख को पढिए, एक बार, दो बार, फिर इसे भूल जाइए। अगर आप इसे कागज़ पर पढ ...

राजीव आनंद की 3 लघुकथाएं

आंखों का जाल अच्‍छा होना भी कितनी बुरी बात है आज के जमाने में। ज्‍यादातर लोग एक खूबसूरत लड़की को बूरी नजर से ही देखते है। सोचते हुए इंटर स्...

विजय शिंदे के दो लघु आलेख - एक लड़की एक लड़का, हद हो गई

एक लड़की एक लड़का                                 डॉ. विजय शिंदे                                     मनुष्य की पहचान है, मानवीयता। मनुष्य बनता...

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - छींक रे छींक

व्यंग्य छींक रे छींक डॉ. रामवृक्ष सिंह छींक शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह तो हमें ज्ञात नहीं। किन्तु छींकने की स्वाभाविक प्रक्रिया में ...

रमा शंकर शुक्ल का संस्मरण - मेरे मूर्तिकार -02

मेरे मूर्तिकार-02 डा0 रमा शंकर शुक्ल बीए का आखिरी साल था। ठण्ड चरम पर थी। हमारी कक्षाएं सुबह 6.30 से शुरू होती थीं। हम आठ भाई-बहन थे, जिनका...

रमाशंकर शुक्ल की लघुकथा - नानी

नानी ननिहाल में नानी न हो तो फिर उसकी गरमाहट ही क्या। माँ से भी ज्यादा नानी के प्यार की तासीर यूं ही नहीं महसूस होती। मेरे जीवन से नानी को...

नन्दलाल भारती की कहानी - लोटा भर पानी

न न्दू वैसे तो स्कूल गया तो था पर दूसरी जमात पास नहीं कर पाया था। उसके गांव के जमींदारों के खेतों में पसीना बहाया पर कभी पेट भर खाने का मजा...

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता

मैं शाला न आ पाऊंगी                     मां की तबियत बहुत खराब।                      बापू को हो रहे जुलाब।                      इसीलिये तो...

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