शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

उमेश मौर्य का आलेख - शब्दों का रखरखाव



मेरे एक मित्र थे। द्वारिका प्रसाद जी मैंने उनसे पूछा कि आप इतना कुछ लिखते हो कैसे लिखते हो। उन्होने कहा जैसे आप बोलते हो। बात आगे बढ़ी वो बोले जा रहे थे- मै तो घर की साफ सफाई और रखरखाव पर बहुत ध्यान देता हॅू। कौन सामान कहां रखने से कितना अच्छा लगेगा और वही पर उसका उपयोग भी हो। जैसे नमक की सीसी रसोई के लिए उपयोगी है तो उसे मंदिर में नहीं रखते। वहीं पर उसका रखरखाव करते है कि उस स्थान मे उसे कैसे सुन्दर बनाया जाय। कुछ थोड़े से सामान को कमरे मे बिखेर दो तो देखने की इच्छा नहीं होगी। वही सामानों को सजा कर रख दो तो छवि देखते ही बनती है। सब कुछ रखरखाव पे ही निर्भर है। हमारा आन्तिरिक, बाहरी दोनों जीवन और समाज भी।

       लेखन में जो ब्द उपयोग होते है वो भी हमारी रोजमर्रा के जीवन मे आने वाले ब्द ही है। केवल भावनाएं और कल्पनाएं नई-नई आती है। नये रूप ग्रहण करती है। हम जितना दुःख, दर्द, करूणा, विरह, वेदना, उत्साह, उल्लास, मान-अपमान, पीड़ा का गहनता से अपने मन को एकाकार कर सकते है। उतना ही ब्दों का उपयोग कर सकते है। हमारी अनुभूति जितनी सघन होगी, अभिव्यक्ति उतनी ही सरल हो जायेगी। ब्द स्वतः ही काव्य का रूप ले लेंगे। वैसे जैसे रात के अंधेरे में चांद की ीतलता पाकर वायुमण्डल मे बसे जलवाप के कण प्रभात के समय छोटी-छोटी मोतियों जैसे घास के ऊपर लटक जाती है। बिना किसी प्रयत्न के। बहुत ज्यादा ब्द भी हो और वो समझ में ना आये तो भी निरर्थक है। लगता है इससे मेकप पोता गया हो। भावनाओं को जब ब्दों का रूप दिया जाता है। तो प्राकृतिक और सहज हो तभी सुन्दर होता है। कितने सामान्य से समझे जाने वाले ब्दों को जब सही रखरखाव में रखा जाता है तो एक कविता बन जाती है। एक लेख बन जाता है। मन और मस्तिष्क की प्राण वायु बन जाती है। जैसे कुछ ब्दों को लेकर इधर उधर बिखेर के मैं एक शेर लिखता हूं इसे समझने की कोशिश करो - 

              तरह, वो, पड़ा, तस्वीर, जमीं, टूटा, इस, और, फेंका।
              कांच, मेरी, पे, उधर, बिखरा, को, दिल, था, इधर ।।

ये बेजान से ब्द बिल्कुल निरर्थक जैसे लगते है। बिना अर्थ के भाव हीन, बिना रखरखाव के। लेकिन इन्हीं ब्दों के सहारे जब भावनाओं को बांधते हैं तो ब्दों की असीम क्ति मुखरित होती है। प्रकट होती है।

अब हम उपरोक्त ब्दों का थोड़ा सा रखरखाव करके देखते है कि ये कैसे दिखते है -
              वो मेरी तस्वीर को फेंका, जमीं पे इस तरह 
              कांच टूटा था उधर, और दिल इधर बिखरा पड़ा।।

       कृत्रिमता से दूर, बनावटी पन से अनजान, भावनाओं की प्रगाढ़ता से उमड़ती हुई कल्पनाएं जब अपना आधार लेती है। तो उसमें सत्यम् शिवम्, सुन्दरम् की सहज अनुभूति हो जाती है। वो दूसरों को सही न सही लेकिन कवि को एक अलौकिक आनन्द से भर देती है। कवि भाव विभोर हो जाता है। 

       कृत्रिम फूल और प्राकृतिक फूल में हमेा ही प्राकृतिक फूल ही आकर्षित करता है। और लाभदायक भी है। थोड़ी ही सही प्राणवायु तो देती है। हमारे सम्बन्धों में भी बनावटी पन न हो तो किसी को भी सहज आकर्षित करते है। एक बच्चे की तरह। मैं कहता हॅू। बेहया के पौधे, सड़कों के किनारे की अस्त व्यस्त झाडि़यां। इन महलों में रखे रबड़ और कपड़ों के फूलों से कोई तुलना की ही नहीं जा सकती। कम से कम प्रकृति के संतुलन में सहायक तो है। कोई देखे या न देखे, जानें या न जानें, सुनें या न सुनें, एक अच्छा साहित्य सृजन करते रहो। भावनाओं में ब्दों को मिलाकर हीरा बनाते रहो। भावनाएं प्रकृति का सौन्दर्य है। ब्दों की सार्थकता है। पूर्णता है। निर्वाण है। यदि एक भी व्यक्ति के जीवन को इन ब्दों से गढ़ी गयी रचना से मार्गदर्न हो सके तो जीवन धन्य समझो। ये भी तुम्हारे ब्दों के रखरखाव के द्वारा, प्रकृति के विाल परिवार के लिए एक उत्तम भेंट होगी।

प्राकृतिक बनो। प्राकृतिक लिखो। प्राकृतिक बोलो। जीवन में प्रकृति का रस घोलो। सरलता और सहजता ही प्रकृति का सौन्दर्य है। काव्य का निर्माण है।
                                        
- उमे मौर्य
सराय, भाई, सुल्तानपुर
उत्तर प्रदे,
वर्तमान-कुवैत में

3 blogger-facebook:

  1. Bahut khoob Umesh Maurya ji kabya nirman kee sahi prakriya batlaney kay leeyey.......Rajiv Anand.

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