रविवार, 10 फ़रवरी 2013

वन्दना तिवारी की कविता - जिन्दगी को क्या राह दूं?

*''जिन्दगी को क्या राह दूं?''
आजाद हूं...
जिन्दगी को क्या राह दूं?
खो दिया है खुद को ही,
पग भूमि से उठ गये,
लुट रहीं हैं रोज अस्मत,
इतने विकसित हो गये!
खो जाउं मैं भी आवेश मे या बदलाव को अंजाम दूं?
आजाद हूं...
सहमे हुए हैं साये,
यूं आजादी की पुरवाइयां हैं।
क्या अनुसरण उस इतिहास का
अब तो ये सब रूढ़ियां है।
गिर जाएंगे यदि खड्ड में,
सैलाब सड़क पर आएगा ही,
उस ज्वार की तीव्रता से क्या,
दरारें ज़िगर की भर पाएंगी?
बचा लूं खुद को गिरने से, या आक्रोश को हवा दूं?
आजाद हूं पर जिन्दगी को क्या राह दूं??
-विन्दु
साखिन,हरदोई
blog-wing of fancy
URL-wing-vandana.blogspot.com

4 blogger-facebook:

  1. आपका बहुत शुक्रिया श्रीवास्तव जी!
    सादर आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी कविता है

    उत्तर देंहटाएं
  3. सादर धन्यवाद महोदय!

    उत्तर देंहटाएं

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