सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

विमल सिंह का व्यंग्य - काश मैंने घूस दे दी होती...

काश मैंने घूस दे दी होती

श्रीमती विमल सिंह

बताती चलूँ कि इस लेख के माध्यम से मैं घूसखोरी को बढ़ावा नहीं दे रही। मेरा उद्देश्य तो केवल यह बताना है कि यदि आपने घूस नहीं देने का मन बना लिया है तो कृपया उसके सद्परिणामों (अथवा दुष्परिणामों) से अवगत हो लें और उन्हें भुगतने के लिए तैयार रहें। इसके लिए मैं खुद अपनी आपबीती से आपको अवगत कराना चाहती हूँ।

पता नहीं मेरे पति के मन में क्या आया कि उन्होंने मुझे साथ लेकर दुनिया घूमने का मन बनाया। ईश्वर की कृपा से इस काम के लिए अपेक्षित धन, समय, सुविधा और इरादा- सब कुछ अब हमारे पास उपलब्ध हो चला है। बस नहीं है तो पासपोर्ट। एक बार पासपोर्ट बन जाए तो जिस देश घूमने जाना हो, वहाँ का वीजा लीजिए और जाइए, घूम आइए। बहुत-से देश तो ऐसे भी हैं, जहाँ पहुँचने के बाद वीजा लिया जा सकता है। लेकिन देश के बाहर निकलना हो तो पासपोर्ट तो हर हाल में चाहिए ही।

तो हमने यानी मैंने पासपोर्ट के लिए ऑनलाइन आवेदन कर दिया। निश्चित तारीख व समय पर सभी जरूरी दस्तावेज लगाकर आवेदन की हार्ड कॉपी जमा करवा दी और पासपोर्ट अधिकारी के सामने हाजिरी भी लगा आई। अब इंतजार होने लगा पुलिस वालों का। हमें मालूम था कि पासपोर्ट के सिलसिले में बारी-बारी दो पुलिस वाले हमारे यहाँ तशरीफ लाएँगे।

बहुत समय बीत गया किन्तु कोई पुलिस वाला नहीं आया। करते-कराते छह महीने बीत गए। विदेश मंत्रालय की पासपोर्ट वाली साइट पर पूछताछ करने पर हर समय यही जानकारी मिलती कि आपके पासपोर्ट आवेदन के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। हम सब चुप्पी साधे देखते रहे और इंतजार करते रहे कि कभी तो लहर आएगी।

होली के बाद आवेदन किया था और दीवाली होने को आई, तब कहीं जाकर इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक महाशय सुबह लगभग नौ बजे हमारे घर पधारे। ये श्रीमानजी हमारे पति का पासपोर्ट बनने के समय भी आकर वसूली कर चुके थे। इसलिए इन्हें हम जानते थे। बाहर बरामदे में रोककर हम उनके सवालों का जवाब दे रहे थे कि तब तक भीतर से पति महोदय भी तैयार होकर ऑफिस जाने के लिए निकले। इंटेलिजेंस वाले महाशय की आवाजें तो काफी देर से वे भी सुन ही रहे थे। हमारे जवाबों से संतुष्ट होकर अपनी फाइल समेट चुके इंटेलिजेंस महाशय ने पति की ओर बड़ी आशा भरी निगाहों से देखा और बोले- तो फिर अब चलते हैं। लाइए चाय-पानी का कुछ दे दीजिए।

पति ने जेब से पाँच सौ का नोट निकाला और उनके हवाले किया।

‘सर इस दशहरे से हमारा रेट हजार रुपये का हो गया है’ इंटेलिजेंस वाले सज्जन ने चट फरमाया।

‘भाई साहब। अभी तो मेरे पास ये पाँच सौ रुपये ही हैं। आप लीजिए। घर खर्च के भी पैसे घर में नहीं हैं। देखिए ये एटीएम कार्ड ले जा रहा हूँ ताकि कुछ पैसे निकाल सकूँ।’ पति ने उनको अपनी माली हालत बताते हुए निवेदन किया।

‘नहीं हैं तो कोई बात नहीं। दो-तीन दिन बाद पुलिस वाले आएँगे। आप बाकी के पाँच सौ रुपये उनको दे देना’ उन्होंने ऐसे कहा जैसे हमें पैसे उधार दे रखे हों और वसूली पर निकले हों।

‘अरे ये ठीक हैं, साहब। पाँच सौ बहुत होते हैं इस काम के।... अच्छा अब मैं चलता हूँ। दफ्तर को देर हो रही है।’ कहकर पति फिर अंदर जाने को मुड़े और इंटेलिजेंस वाले महोदय अपनी बाइक पर बैठकर चलते बने।

तीन-चार दिन बाद पुलिस वाले भाई साहब आए। कार्य-दिवस और दोपहर का समय होने के कारण उस समय पति घर पर नहीं थे। काम वाली लड़की और छोटा बेटा अलबत्ता वहाँ मौजूद थे। पुलिस वाले ने भी अपनी कागजी खाना-पूर्ति की और आशा भरी दृष्टि डालते हुए कहा- ‘लाइए, चाय-पानी का कुछ दे दीजिए।‘ अबकी हमने उनको पाँच सौ रुपये का नज़राना पेश किया।

‘ये तो इंटेलिजेंस वालों के हुए। और हमारे?’ उन्होंने बड़ी मासूमियत से हमारी ओर देखकर पूछा।

‘अरे भइया, ये आपही के लिए हैं। वो तो तीन-चार दिन पहले आए थे और उनको हम पाँच सौ अलग से दे चुके हैं।’ हमने पुलिस वाले की आँख से अज्ञान का पर्दा हटाने की कोशिश की।

‘उन्होंने कहा था कि बाकी हैं, इसलिए मुझे मज़बूरी में आपसे माँगना पड़ रहा है।’ पुलिस वाले ने कहा, अपनी साइकिल उठाई और धीरे-से बैठकर खिसक लिए।

हमें कुल मिलाकर ये पुलिसवाले महोदय कुछ सज्जन लगे। वरना कोई-कोई तो इतने जिद्दी और घाघ होते हैं कि नेग लेने के मामले में बड़े-बड़े थेंथर हिजड़ों को भी मात कर दें। अभी कुछ ही दिन पहले जब हमारे बड़े बेटे की नौकरी लगी थी तब वे लोग पुलिस वेरिफिकेशन के समय इक्कीस सौ रुपये माँग कर ले गए थे। जब तक नहीं दिए तब तक उन्होंने ठीहा नहीं छोड़ा था। लेकिन ये महोदय तो एक वाक्य में ही समझ गए। आश्चर्य!

खैर.. जब इंटेलिजेंस वाले और पुलिस थानेवाले, दोनों आकर अपनी-अपनी दक्षिणा ले गए तो हमें लगा कि अब तो अपना पासपोर्ट बन ही जाएगा। वैसे बताते चलें कि होते ये दोनों ही पुलिस वाले हैं, बस इनकी तैनाती अलग-अलग महकमों में होती है। खैर..इस बात को भी दो-तीन महीने बीत गए और नया साल आ गया। जिन्दगी की आपा-धापी में दिन कैसे बीतते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता- सुब्ह हुई, शाम हुई.. उम्र यूंही तमाम हुई। ऐसे ही एक शनिवार को बाहर की घंटी बजी। गेट खोला तो देखते हैं कि डाकिया महोदय खड़े हैं। उन्होंने हमारे हाथ में लिफ़ाफ़ा थमाया और हस्ताक्षर कराने के लिए झोले से कागज निकालने अपनी साइकिल की ओर लपके। पति महोदय अंदर बैठे कुछ लिख-पढ़ रहे थे। वहीं से आवाज लगाई- ‘कौन आया है?’

‘पोस्ट मैन हैं। लिफ़ाफ़ा तो पासपोर्ट ऑफिस का लगता है’ हमने उत्सुकता से लिफ़ाफ़ा खोलते हुए कहा और पासपोर्ट होने की स्थिति में डाकिये को नेग देने के लिए पैसे लाने भीतर आने लगीं। तब तक लिफ़ाफ़ा हमने पूरा खोल लिया था- ‘अरे इसमें तो एक चिट्ठी है। पासपोर्ट तो है ही नहीं’ हमने अचकचाकर कहा।

पति महोदय ने भी लिफ़ाफ़ा उलट-पुलटकर देखा। पासपोर्ट नहीं था, अलबत्ता अंग्रेजी में एक चिट्ठी जरूर पासपोर्ट कार्यालय से आई थी, जिसपर लिखा था कि अब एनआईसी ने पासपोर्ट बनाने का काम बंद कर दिया है और यह काम अब पासपोर्ट सेवा केंद्र के सुपुर्द कर दिया गया है। लिहाजा यदि आपको पुरानी फीस पर ही पासपोर्ट बनवाना हो तो नए सिरे से ऑनलाइन आवेदन करें, मुलाकात का समय लें और निश्चित समय पर सारे दस्तावेज़ लेकर एक महीने के भीतर सेवा केंद्र जाएँ। वरना आपको नए सिरे से पासपोर्ट हेतु आवेदन करना होगा। फीस भी दुबारा भरनी होगी।

हम परेशान। हमसे ज्यादा पति महोदय परेशान। अब विदेश भ्रमण का क्या होगा? उससे ज्यादा परेशानी इस बात को लेकर कि दो-दो पुलिस वालों को पाँच-पाँच सौ रुपये घूस खिलाई। फिर भी पासपोर्ट नहीं बना। पासपोर्ट की फीस, फोटो, पासपोर्ट कार्यालय जाकर घंटों लाइन में लगना, दस्तावेजों के पैसे, यानी सब कुछ अकारथ गया!! सबसे ज्यादा ग्लानि हुई अर्ध-शिक्षित, अर्ध-सभ्य पुलिस वालों के हाथों ठगे जाने पर।

पति महोदय पासपोर्ट कार्यालय से आई चिट्ठी को लेकर इंटेलिजेंस ब्यूरो के कार्यालय गए, जो उनके दफ्तर के बगल वाली बिल्डिंग में है। वहाँ उन्हें बताया गया कि दिसंबर के आखिरी दिनों में आपकी पत्नी की पुलिस रिपोर्ट पासपोर्ट कार्यालय भेजी गई है। तारीख और क्रम संख्या भी उन्होंने लिखकर दी और कहा कि पासपोर्ट कार्यालय जाकर पैरवी कर लें।

पति महोदय पासपोर्ट कार्यालय गए। छोटे बेटे की बाइक पर बैठकर मैं भी पहुँची, ताकि कोई ज़रूरत हो तो मौजूद रहूँ। वहाँ वही कुछ बताया गया, जो पासपोर्ट कार्यालय से आई चिट्ठी में लिखा था। इसके बाद तीनों जने पासपोर्ट सेवा केंद्र पहुँचे। वहाँ पहुँचे तो वही चिर-परिचित भीड़ और वैसी ही अव्यवस्था। अपने देश में इन्सानों की आमद ही सबसे ज्यादा है। फिर इन्सान इस देश से बाहर निकलें तो कैसे निकलें, उसके लिए तो पासपोर्ट चाहिए, जिसके बनने में इतनी दिक्कत। बिना समय लिए सेवा केंद्र में किससे मिलें, यही सोचकर हम तीनों वापस हो लिए।

बेटों ने पासपोर्ट कार्यालय की वेबसाइट पर अपॉइन्टमेंट लेने की ठानी। चार बजे साइट पर अपॉइन्टमेंट की विन्डो खुली और चार मिनट में बन्द हो गई। हमारा नंबर ही नहीं आया। सात सौ लोगों को ही अपॉइन्टमेंट मिल पाया। एक दिन और कोशिश की। फिर से नाकामी हाथ लगी। लेकिन इससे बच्चों को अभ्यास हो गया, जो तीसरे मौके पर काम आया और अबकी हमको अपॉइन्टमेंट मिल गया। 30 जनवरी को सुबह 11 बजे। हमें इस तारीख और समय का ऐतिहासिक महत्त्व मालूम है। शायद प्रबुद्ध पाठकों को भी मालूम हो। अपनी शहादत का क्या समय निकाला है भगवान ने!

तो हम 11 बजे से पहले ही पहुँच गए। दो घंटे खड़े-खड़े इन्तज़ार करते रहे। हमारे कागज जमा करा लिए गए। हम बाहर खड़े इन्तजार करते रहे। दो घंटे बाद अंदर बुलाया गया। वहाँ चारों ओर बेंचों पर लोग बैठे अपनी-अपनी बारी का इन्तजार करते दिखे। सेवा केंद्र के बाहर और भीतर बस इतना ही अंतर है कि एक जगह लोग खड़े हैं तो दूसरी जगह बैठे हैं। दोनों ओर कोलाहल, गंदगी, भीड़ और भभके। घंटों इन्तजार के बाद शाम को लगभग चार बजे हमारी बारी आई। कार्रवाई आरंभ हुई। यहाँ फोटो खिंचवाओ, वहाँ जाँच कराओ, वहाँ उँगली का छापा दो, वहाँ हस्ताक्षर करो, वहाँ इन्टरव्यू दो। करते-करते शाम के छह बज गए।

सुबह समय पर सेवा केंद्र पहुँचने की जल्दी में घर का पूरा काम वैसे ही बिखरा छोड़ आई थी। कामवाली लड़की को भी बाद में लगभग दो बजे आने को बोल आई थी। सोचा था कि तब तक लौट आऊँगी। इस डर से न ठीक से नहाई न धोई कि इस सबमें देर न हो जाए। नाश्ते और खाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था। बस एक कप चाय और दोपहर को थोड़े से चिप्स के सहारे पूरा दिन बिता दिया। उस पर भी घंटों खड़े रहना। फिर घंटों बैठे रहना। कानफाड़ू शोर, अव्यवस्था और भाग-दौड़। इतने दुःख झेलने के बाद भी अबकी बार पासपोर्ट बन जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

शाम को छह बजे मुक्ति मिली और सात बजे बेटे के साथ घर लौटी। यानी दो खाते-पीते, सुसभ्य नागरिकों के दस घंटे, यानी कुल बीस मानव-घंटे ढेरों संत्रास झेलते हुए केवल इसलिए बिताने पड़े कि हमने इन्टेलिजेंस वाले को मुँहमाँगे पैसे नहीं दिए। यदि उसको पाँच सौ रुपये और पकड़ा देते तो वह तत्परता से रिपोर्ट भेज देता और उसी तत्परता से पासपोर्ट बनकर आ जाता। चूँकि हमने उसका बढ़ा हुआ रेट नहीं दिया, इसलिए उसने रिपोर्ट भेजने में इतनी देर लगाई कि तब तक एनआईसी का कार्य-काल पूरा हो गया और उसने हमारी फाइल बिना कोई कार्रवाई किए पासपोर्ट सेवा केंद्र को भेज दी। अब सोचती हूँ कि इससे तो अच्छा यही रहता कि हम घूस देकर अपना काम करवा लेते। काश मैंने अन्ना साहेब, केजरीवाल और किरण बेदी की राह न पकड़कर देश के अधिसंख्य लोगों की राह पकड़ी होती और मुँहमाँगी घूस दे देती, तो यह दिन तो न देखना पड़ता।

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