मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का हिंदी पत्रकारिता में योगदान

प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का हिंदी पत्रकारिता में योगदान

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Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण

प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का हिंदी पत्रकारिता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. हिंदी पत्रकारिता को विश्वस्तर के अनेक वैचारिक विमर्शों के साथ जोड़ने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार सबसे आगे रहे हैं. अपने वतन को विश्वभर के अनुभवों के साथ जोडना‚ यहाँ की संस्कृति‚ अपनापा और राष्ट्रीयता को विश्वजन के साथ मिलकर विकसित करने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार और पत्रकार अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहें हैं. “विदेशों में रह रहे भारतीय जो वर्षों पूर्व अपना वतन छोड कर चले गए थे‚ केवल भाषा और संस्कृति लेकर गए थे उसको बचाए रखने में उन्होंने कितना संघर्ष किया और उनका यह संघर्ष उनके लेखन में कितना उभर कर आया है‚ उनकी लेखनी को उसने कितना सशक्त बनाया है‚ उनके चिंतन को कितना झकझोरा है‚ उसका प्रतिफल यह साहित्य है. ”1 प्रवासी भारतीय साहित्य के संदर्भ में डॉ. शशि भारद्वाज जी के उपर्युक्त विचारों को से हमें सहमत होना होगा. हिंदी भाषा की विभिन्न विधाओं के विकास में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों और पत्रकारों ने उच्चकोटि की सहयोगी भूमिका निभायी है.

उनमें प्रमुख हैं−“ब्रिटेन के प्रवासी हिंदी साहित्यकार – श्री नरेश भारतीय, डॉ. पद्मेश गुप्त, तितिक्षा शाह, उषा राजे सक्सेना, डॉ. महेन्द्र वर्मा, उषा वर्मा, शैल अग्रवाल, एवं डॉ. कृष्ण कुमार. अमेरिका के प्रवासी हिंदी साहित्यकार – अंशु जौहरीअमरेन्द्र कुमारआदित्य नारायण शुक्ल‚ विनय आर्य भूषणअनिलप्रभा कुमारअनुराधा चंदरअनूप भार्गवअशोक कुमार सिन्हाइला प्रसादडॉ. उषादेवी विजय कोल्हाटकरउषा प्रियंवदाउमेश अग्निहोत्रीडॉ. कमला दत्तडॉ. कमलेश कपूरकुसुम सिन्हाकैलाशनाथ तिवारीदेवी नागरानीनरेन्द्र सिन्हानिर्मला शुक्लनीलम जैनपन्ना नायकडॉ. पुष्पा सक्सेनाडॉ प्रतिभा सक्सेनापूर्णिमा गुप्ताबबिता श्रीवास्तवडॉ. भूदेव शर्माराकेश खंडेलवालराधेकांत दवेडॉ. रामजी दास सेठी महताबराजश्रीडॉ राम गुप्ताडॉ. रेखा रस्तोगी कल्परेणु राजवंशी गुप्ताललित अहलूवालियालक्ष्मी शुक्लालावण्या शाहविशाखा ठाकरवेद प्रकाश सिंह अरुणस्वदेश राणाडॉ. स्वर्णलता भूषणडॉ. सरिता मेहतासीमा खुरानासुदर्शन प्रियदर्शिनीसुधा ओम ढींगरासुनीता जैनसुरेश रायसोमा वीरासौमित्र सक्सेनाडॉ. श्याम नारायण शुक्लाडॉ. शालिग्राम शुक्लासुरेन्द्रनाथ तिवारीसुभाष काकसुषम बेदी. कैनेडा के प्रवासी हिंदी साहित्यकार – प्रो अश्विन गांधीप्रो हरिशंकर आदेशडॉ शैलजा सक्सेनासुमन कुमार घईसुरेश कुमार गोयल. खाड़ी देशों के प्रवासी हिंदी साहित्यकार – अशोक कुमार श्रीवास्तवउमेश शर्माकृष्ण बिहारीदीपिका जोशीपूर्णिमा वर्मनरामकृष्ण द्विवेदी मधुकरविद्याभूषण धरजीतेन्द्र चौधरी. ”2आदि सभी साहित्यकार‚ पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता को विश्वमंच उपलब्ध करा दिया है. उपन्यास‚ कहनी‚ कविता‚ निबंध‚ आत्मकथा‚ जीवनी‚ संस्मरण‚ यात्रा साहित्य के साथ हिंदी पत्रकारिता में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है लेकिन विदेश में हिंदी पत्रकारिता का जो विकास हुआ है‚ उस विकास का संपूर्ण श्रेय प्रवासी भारतीय साहित्यकारों को देना होगा.

प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय विचारधारा को हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से समृद्ध किया हुआ परिलक्षित होता है. डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के विचार दृष्टव्य है‚ “भारत की शक्ति संस्कृति और सभ्यता की शक्ति है‚ अहिंसा की शक्ति है‚ करूणा की शक्ति है‚ मनुष्यता की शक्ति है. आज इस शक्ति में भारत की आर्थिक‚ सैनिक‚ राजनीतिक और राजनयिक शक्ति जुड़ रही है‚ किंतु इस शक्ति का प्रयोग और उपयोग समूचे विश्व के हित−साधना के लिए करने की प्रेरणा हमें हमारी सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत से बराबर प्राप्त होती रही. भारत की यह वैश्विक दृष्टि मनुज सभ्यता की श्रेष्ठ उपलब्धि है‚ जो सहज हमारी आजादी में बिंधी और गुँथी हुई है. ”3 भारतीय समाज की सभ्यता का प्रचार–प्रसार हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से प्रवासी भारतीय साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने किया है. इस सत्यता को मानना होगा. विश्वभर के देशों में भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या – फिजी में “51 प्रतिशत”4‚ सूरीनाम में “40 प्रतिशत”5‚ त्रिनीडाड में “45 प्रतिशत”6‚ और गुयाना में “51 प्रतिशत”7‚ है. जो अन्य देशों की तुलना में अधिक है. जहाँ भारतीय मूल के लोगों की संख्या अधिक है. वहाँ हिंदी पत्रकारिता का विकास अधिक मात्रा में हुआ परिलक्षित होता है. दक्षिण पूर्वी एशिया के देश‚ मालदीव‚ यूरोप‚ अमेरिका‚ पाकिस्तान‚ फ्रांस‚ और अरब देशों‚ में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने हिंदी पत्रकारिता के विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर उदीयमान प्रवासी भारतीय हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी‚ इसमें संदेह नहीं.

आर्य समाज सभा‚ फिजी हिंदी परिषद‚ सरस्वती सांस्कृतिक सभा‚ भारत हित चिंतन सभा‚ हिंदी पत्रकार संघ‚ विभिन्न प्रवासी संस्थाएँ‚ नवयुग उदय‚ त्रिदवा संस्था‚ अनेक अंतरराष्ट्रीय भाषा अध्ययन केंद्रों द्वारा प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता की सेवा संतोषजनक भाव से कर रहें हैं. हिंदी की पत्र−पत्रिकाओं का अध्ययन कर प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता का नया आयाम प्रस्तुत करने का सफल प्रयास कर रहें हैं‚ इस स्थिति को हम नकार नहीं सकते. प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता को विदेशी पत्रकारिता से जोड़ना चाहते हैं. “हिंदी में पत्र−पत्रिकाएँ प्रकशित होती हैं‚ रेडियो तथा टेलीविजन पर लम्बी अवधि के हिंदी प्रसारण होते हैं और इतना ही नहीं प्रवासी भारतीय हिंदी भाषा में मौखिक साहित्य का सृजन भी कर रहे हैं. विदेशी विश्वविद्यालयों में आज शोध स्तर तक हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन−अध्यापन हो रहा है. हिंदी साहित्य के अनुवाद की व्यापक स्तर पर व्यवस्था है. विश्व में हिंदी के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि हिंदी भाषा का प्रयोग करने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. ”8 हमें परिश्रमी अनुसंधाता जोगेंद्र सिंह जी के उपर्युक्त विचारों से सहमत होना पडेगा. आज संजाल/इंटरनेट पर उपलब्ध प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के लेखन कार्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि विदेशी भूमि पर हिंदी पत्रकारिता का विकास उन्नत सामाजिक स्थिति और निरंतर ज्ञान साधना के कारण अधिक गतिशील हो रहा है. इंटरनेट पर उपलब्ध अनेक पत्र−पत्रिकाएँ प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कारण ही स्तरीय साहित्य एवं वार्ताएँ उपलब्ध करा रहीं है‚ इस बात को मानना होगा.

प्रिंट मीडिया के साथ−साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से भी प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता के विकास में निरंतर कार्यमग्न रहें हैं. हिंदी वेब पत्रकारिता का अध्ययन करने से पता चलता है कि अनेक प्रवासी भारतीय साहित्यकारों द्वारा विभिन्न स्तंभों‚ उपन्यास‚ कहानी‚ कविता‚ यात्रावृत्त और ब्लॉग द्वारा हिंदी पत्रकारिता का ऑनलाइन विकास किया है. जयदीप कर्णिक का कहना है कि “इंटरनेट पर भाषायी पत्रकारिता अब अपने शैशव को पूरा कर नया रूप लेने को तैयार है.

तमाम भाषाई अखबार अब इंटरनेट पर उपलब्ध हैं. केवल इंटरनेट के लिए विशेष तौर पर खबरें तैयार करवाई और लिखी जा रही हैं. बडे टी. वी. चैनलों और अखबारों से जुडे पत्रकार भी अपनी−अपनी भाषा में बढिया चिट्ठकारी कर रहे हैं. यहां उनकी अपनी संपादकीय नीति है और जगह या समय के अभाव में उनकी बढिया स्टोरी को लोगों तक न पहुंच पाने का अफसोस भी नहीं है. भौगोलिक दूरियों को पाटते हुए चंद लम्हों में सूचना को दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच पाना‚ और उससे भी आगे यह सूचना का तुरंत क्रिया−प्रतिक्रिया का दौर शुरू हो पाना भी वेब पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण पहलू है. विश्व ग्राम के स्वप्न को भी सही मायनों में इंटरनेट ने ही साकार किया है. ” 9 कहना सही होगा कि प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने अपनी रचनात्मकता का परिचय इंटरनेट के माध्यम से कर हिंदी पत्रकारिता की सृजनधर्मी वृत्ति का विकास ही किया है. आज दुनिया में भारतीय लोग लगभग सभी देशों में निवास कर रहें हैं. प्रवासी भारतीयों के पास समृद्ध जीवनस्तर उपलब्ध है. संपत्ति और साधन सामग्री की कमी नहीं है. प्रवासी भारतीय अपने देश के लिए बहुत कुछ अच्छा करना चाहते हैं‚ हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से हमारे सामने आनेवाले प्रवासी भारतीय देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं. अनेक प्रवासी भारतीय सम्मेलनों में यह बात स्पष्ट हो चुकी है. प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के उदघाटन भाषण में व्यक्त प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीजी का विचार दृष्टव्य है‚ “हिंदी को चाहिए कि वह अपने दरवाजे और खिड़कियाँ खुली रखें. ऋग्वेद में कहा गया है कि अच्छे विचारों का सभी दिशाओं में हम आवाहन करें. इसी तरह हिंदी एक विश्वभाषा का रूप ले सकेगी. जिस हद तक हिंदी का भण्डार बढेगा और उसकी उपयोगिता बढेगी‚ उस हद तक अधिक−से− अधिक लोग हिंदी सीखना चाहेंगे. ”10 कहना आवश्यक नहीं कि हिंदी भाषा के वैश्विक विकास और

उपयोगिता के कारण ही प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता को विश्वमंच उपलब्ध करने का सफल प्रयास कर रहें हैं. प्रवासी भारतीय साहित्यकार जिन पत्र−पत्रिकाओं का प्रकाशन कर हिंदी पत्रकारिता का विकास कर रहें है‚ उनके कारण ही विश्वस्तर पर हिंदी पत्रकारिता को उचित और सम्मानजनक स्थान मिल रहा है‚ इसमें संदेह नहीं.

निष्कर्ष

निष्कर्षतः स्पष्ट हो जाता है कि प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का हिंदी पत्रकारिता के विकास में संतोषजनक योगदान रहा है. हिंदी पत्रकारिता को विश्वस्तर के अनेक वैचारिक विमर्शों के साथ जोड़ने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार सबसे आगे रहे हैं. अपने वतन को विश्वभर के अनुभवों के साथ जोड़ना‚ यहाँ की संस्कृति‚ अपनापा और राष्ट्रीयता को विश्वजन के साथ मिलकर विकसित करने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार और पत्रकार अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहें हैं और वर्तमान की यह माँग भी है. विदेश में हिंदी पत्रकारिता का जो विकास हुआ है‚ उस विकास का संपूर्ण श्रेय प्रवासी भारतीय साहित्यकारों को देना होगा. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय विचारधारा को हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से समृद्ध किया हुआ परिलक्षित होता है. भारतीय समाज की सभ्यता का प्रचार–प्रसार हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से प्रवासी भारतीय साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने किया है. इस सत्यता को मानना होगा. जहाँ भारतीय मूल के लोगों की संख्या अधिक है. वहाँ हिंदी पत्रकारिता का विकास अधिक मात्रा में हुआ परिलक्षित होता है. दक्षिण पूर्वी एशिया के देश‚ मालदीव‚ यूरोप‚ अमेरिका‚ पाकिस्तान‚ फ्रांस‚ और अरब देशों‚ में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने हिंदी पत्रकारिता के विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर उदीयमान प्रवासी भारतीय हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी‚ इसमें संदेह नहीं.

आज संजाल/इंटरनेट पर उपलब्ध प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के लेखन कार्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि विदेशी भूमि पर हिंदी पत्रकारिता का विकास उन्नत सामाजिक स्थिति और निरंतर ज्ञान साधना के कारण अधिक गतिशील हो रहा है. इंटरनेट पर उपलब्ध अनेक पत्र−पत्रिकाएँ प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कारण ही स्तरीय साहित्य एवं वार्ताएँ उपलब्ध करा रहीं है‚ इस बात को मानना होगा. प्रिंट मीडिया के साथ−साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से भी प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता के विकास में निरंतर कार्यमग्न रहें हैं. हिंदी वेब पत्रकारिता का अध्ययन करने से पता चलता है कि अनेक प्रवासी भारतीय साहित्यकारों द्वारा विभिन्न स्तंभों‚ उपन्यास‚ कहानी‚ कविता‚ यात्रावृत्त और ब्लॉग द्वारा हिंदी पत्रकारिता का ऑनलाइन विकास किया है. हिंदी भाषा के वैश्विक विकास और उपयोगिता के कारण ही प्रवासी भारतीय साहित्यकार हिंदी पत्रकारिता को विश्वमंच उपलब्ध करने का सफल प्रयास कर रहें हैं. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों द्वारा हिंदी पत्रकारिता के विकास के लिए जो प्रयास हो रहे हैं‚ वह निश्चित ही अभिनंदनीय हैं.

संदर्भनिदेश$

1. संपा. डॉ. शशि भारद्वाज – भाषा (द्वैमासिक)‚ अंक 5‚ मार्च−अप्रैल‚ 2003‚ पृष्ठ−07.

2. www. wikipedia. com

3. संपा. डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी−साहित्य अमृत‚ अंक 1‚ अगस्त‚ 2007‚ पृष्ठ−06.

4. संपा. डॉ. शशि भारद्वाज – भाषा (द्वैमासिक)‚ अंक 5‚ मार्च−अप्रैल‚ 2003‚ पृष्ठ−115.

5. वही‚ पृष्ठ−115.

6. वही‚ पृष्ठ−116.

7. वही‚ पृष्ठ−116.

8. जोगेंद्र सिंह – राजभाषा हिंदी विश्व संदर्भ‚ पृष्ठ−106.

9. संपा. हंसराज ‘सुमन’ व एस. विक्रम− वेब पत्रकारिता‚ पृष्ठ−163.

10. संपा. वेद व्यास−मधुमती‚ अंक 9‚ सितंबर‚ 2012‚ पृष्ठ−32.

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Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर 414001. (महाराष्ट्र)
दूरभाष - 09850619074
E-mail - drsatappahavan@gmail. com.

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