बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

महावीर सरन जैन का संस्मरण - डॉ. जे. पी. शुक्ल – स्मृतियों को नमन

डा. जे. पी. शुक्ल – स्मृतियों को नमन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

जबलपुर से आत्मीय डा. आर. के सेठ (राजू) से डा. जे. पी. शुक्ल के स्वर्गवास होने की दुखद सूचना प्राप्त हुई। मुझे मालूम था कि डा. जे. पी. शुक्ल जबलपुर से अपनी बिटिया बंटी के पास रहने के लिए पुणे चले गए हैं। डा. सेठ से ही मुझे बंटी का मोबाइल नम्बर प्राप्त हुआ। मैंने बंटी से कहा कि शुक्ला जी का तो स्वास्थ्य बहुत अच्छा था, वे रोजाना घंटों योग एवं प्राणायाम करते थे, पैदल घूमने जाते थे। बंटी ने बतलाया अंकल 15 दिन पहले तक उनकी यही दिनचर्या थी। उनका स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक था। उन्हें डेंगू हो गया और वही उनकी मृत्यु का कारण बन गया।

पहले मेरा मन उनकी मृत्यु के समाचार पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हुआ। हृदय विदारक समाचार से मेरे मन के विषाद का अनुमान लगाकर बंटी ने उल्टे मुझे अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने को जब कहा तो मेरा मन कुछ शान्त हुआ। मेरी बुद्धि ने मुझे प्रबुद्ध किया कि भारतीय साधना परम्परा के अनुसार तो मृत्यु यात्रा का एक पड़ाव है - नवीन जीवन प्राप्त करने का उपक्रम। गीता का वचन है:- ‘जातस्य हि ध्रुरवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृत्स्य च’।

मन में उनके आत्मीय व्यक्तित्व का जो बिम्ब उभर रहा है वह उनके बहुआयामी पहलुओं को रेखांकित करता है। अनेक यादें ताज़ा हो रही हैं। मन है कि मानता ही नहीं। भारत सरकार के केंद्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक का कार्यभार ग्रहण करने के लिए मुझे सन् 1992 में जबलपुर छोड़ना पड़ा। उसके पूर्व तक हम और जे. पी. शुक्ल विश्वविद्यालय के चार प्रोफेसरों के परिसर में साथ साथ रहे। उस परिसर में हम दोनों के अलावा शेष दो आवास गृहों में रहने वाले बदलते रहे। उनमें प्रोफेसर नगेंद्र सिंह, प्रोफेसर विमल प्रकाश जैन, प्रोफेसर एच. पी. तिवारी, प्रोफेसर आर. के. गुप्ता, प्रोफेसर बिसेन, प्रोफेसर आर. के. शर्मा, प्रोफेसर एच. पी. दीक्षित आदि रहे। हम दोनों के परिवारों में हमेशा आत्मीय सम्बंध बने रहे। सन् 1992 के पूर्व सन् 1984 से सन् 1988 तक की अवधि में, मैंने रोमानिया में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की प्रतिनियुक्ति पर बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर पद पर कार्य किया। इस अवधि में डा. जे पी. शुक्ल ने मुझे ढेर सारे पत्र लिखे। एक पत्र पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। इस पत्र में जहाँ एक ओर हम दोनों के मैत्रीपूर्ण पारिवारिक सम्बंधों की सहज अभिव्यक्ति है, वहीं इस पत्र में जबलपुर में 5 जुलाई, 1984 से टेलिविज़न के कार्यक्रमों के प्रसारण के आरम्भ होने की सूचना है तथा भारतीय राजनीति के चाणक्य तथा हम दोनों के समादरणीय दादा (पं. द्वारका प्रसाद मिश्र) का संदर्भ है –

( डा. जगदीश प्रसाद शुक्ल जबलपुर

आर ़ डी ़ यूनिवर्सिटी दिनांक 03 – 07 - 1984

प्रिय बंधुवर,

तीन माह के उपरांत आपका दूसरा पत्र भी प्राप्त हुआ। मुझे नहीं मालूम था कि आपने पहला पत्र मेरे उत्तर कि अपेक्षा से लिखा था। दूसरे पत्र से आपकी अभिलाषा स्पष्ट हो गर्इ और मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि हिम और गुलाब के मुल्क रोमानिया में आप हम लोगों को याद करते हैं। आपने अपने संक्षिप्त पत्र में अपने स्वयं के बारे में कुछ नहीं लिखा इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आप वहाँ पर परम प्रसन्न हैं।

विश्वविद्यालय का नवीन शैक्षणिक सत्र यथावत् आरम्भ हो गया है और सब कुछ यथावत् है। जब आप यहां आयेंगे तो विश्वविद्यालय में कुछ नये चेहरे अवश्य आपको देखने को मिलेंगे। इस समय वर्षा आरम्भ हो गर्इ है और मौसम अत्यंत सुहावना है। जहाँ तक नगर का प्रश्न है तो केवल एक ही नयी बात प्रारम्भ होने जा रही है और वो यह कि 5 जुलार्इ से दूरदर्शन के कार्यक्रमों का प्रसारण। काश, आप जबलपुर में होते तो कम से कम आपके घर में दूरदर्शन तो तत्काल आ ही जाता। अब हम लोग दूरदर्शन का लाभ तभी उठा सकेंगे जब आप रोमानिया से अपने साथ एक दूरदर्शन भी ले आवेंगे। निवेदन केवल इतना है कि पत्र तो आप कूटनीतिक थैले में भेजते रहें किन्तु दूरदर्शन जलपोत से लाने के बदले वायुमार्ग से ही लेते आयें जिससे अनावश्यक विलम्ब न हो।

आदरणीय दादा पचमढ़ी प्रवास दो-चार दिन ही कर सके और नेत्र कष्ट के कारण उन्हें इलाज कराने के लिए दिल्ली जाना पड़ा। वहां से वे 26 जून को जबलपुर वापिस आ गए और अत्यधिक दुख की बात तो यह है कि उनकी नेत्र ज्योति पूर्णतया लुप्त हो गर्इ है। शायद इलाज कराने के लिए वे सितम्बर माह में रूस यात्रा करें और आशा है वहाँ पर उन्हें निश्चित लाभ होगा।

यहाँ पर हम सब आप लोगों को सदा स्मरण करते हैं किन्तु मीतू के मधुर हास तथा मनु की शैतानियों के बदले आपके घर में एक ताला लटका दिखार्इ देता है।

श्रीमती जैन को हम सबका नमस्कार तथा मीतू एवं मनु को ढ़ेर सा प्यार और आशीर्वाद सहित,

आपका ही

जे ़ पी ़ शुक्ल)

जे. पी. शुक्ल विश्वविद्यालय की राजनीति में भी बढ़चढ़कर भाग लेते थे। इस दृष्टि से इस समय मेरे विश्वविद्यालय मित्रों में से तीन मित्रों के नाम उभरकर सामने आ रहें हैं – 1. जे. पी शुक्ल 2. बैजनाथ शर्मा 3. जी. पी. अग्रवाल।

जब विश्वविद्यालय की कुल संसद के चुनाव होते थे, उन दिनों जे. पी. शुक्ल की व्यस्तता देखने लायक होती थी। इसका ज़ायका चखाने के लिए मैं उनका लिखा दूसरा पत्र पेश कर रहा हूँ –

(डा. जगदीश प्रसाद शुक्ल जबलपुर

आर ़ डी ़ यूनिवर्सिटी दिनांक 01 – 01 - 1985

प्रिय बंधुवर,

आशा है आप सब स्वस्थ तथा प्रसन्न होंगे। यहाँ सब यथावत् है। कोर्इ उल्लेखनीय बात नहीं है। नर्इ बात केवल यह है कि विश्वविद्यालय कुलसंसद की चुनावी गरमी प्रारम्भ हो गर्इ है। विभागीय अध्यक्षों में हम लोगों के पैनल से निम्नलिखित प्रत्याशी हैं- 1. डा. दत्त 2. डा. डी.डी. मिश्र 3. डा. जे.पी. सेन 4. डा. के.के. चतुर्वेदी तथा 5. श्री सी.एस. राठौर। विरोध में हैं - 1. डा. आर. के गुप्ता 2. डा. त्रिलोचन पाण्डेय तथा 3. डा. एम.पी. स्वर्णकार।

मैं प्रयास करूँगा कि आपको मत पत्र वाला लिफाफा समय पर मिल जाये। उसे उसी दिन भर कर एयर मेल से रवाना कर दीजिये अन्यथा समय पर नहीं आ सकेगा।

आपको यह जान कर प्रसन्नता होगी कि लैक्चरर्स कंस्टीट्वेंसी से डा. श्रीमती पुष्पा सेठ भी हम लोगों की प्रत्याशी हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन परीक्षा संचालन में ढीला है। अभी तक परीक्षा परिणाम घोषित नहीं हो पाया है। फल स्वरूप विश्वविद्यालयीनध्ययन विभागों में अध्यापन कार्य प्रारम्भ नहीं हो सका। स्वीटी और बण्टी को अपनी परीक्षाओं में श्रेणियाँ मिल गर्इ हैं। स्वीटी एम.एस. सी. और बंटी प्रथम वर्ष विज्ञान पढ़ेगी। मीतू और मनु के क्या समाचार हैं बण्टी कह रही है कि उनसे कहिये कि वे उसे पत्र लिखें। तुम्हारी भाभी जी पास में खड़ी हैं। कह रही हैं कि आप दोनों को नमस्कार और बच्चों को प्यार लिखूं।

राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति में कुछ मूलभूत परिवर्तन प्रस्तावित हैं और पहली बार प्रधान मंत्री स्वयं इसमें रुचि ले रहे हैं। नये वेतनमानों के सम्बन्ध में भी सक्रिय विचार हो रहा है और सम्भवत: अगले वर्ष तक इनका लागू होना संभावित है। आदरणीय दादा स्वस्थ्य एवं प्रसन्न हैं। इसी माह उनकी धर्मपत्नी का देहावसान हो गया है। एक पत्र लिख दीजियेगा।

डा. एच.पी. तिवारी सपरिवार इलाहाबाद चले गये हैं। उनका मकान डा. आर.के शर्मा को मिला है, कुछ दिनों में वे आ जायेंगे। आप लोगों का कब आने का कार्यक्रम हैं, सूचित करें।

शेष सब कुशल हैं पत्रोत्तर अवश्य दें। मैं प्रतीक्षा करूँगा।

आप दोनों को हार्दिक नमस्कार बच्चों को प्यार।

आपका ही

जे.पी. शुक्ल)

सन् 1992 में, मैंने जबलपुर छोड़ दिया और उसके कुछ समय बाद शुक्ल जी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हो गए। हमारा मिलना जुलना होता रहा। मेरा दो तीन बार जबलपुर आना हुआ। जे. पी. शुक्ल मेरे घर तीन चार बार आगरा आए। जब वे दिल्ली आते थे तो मुझे सूचना अवश्य देते थे। मेरा भी चूँकि दिल्ली आना जाना होता रहता था, इस कारण हमारी दिल्ली में अनेक बार भेंट हुईं। कई बार हम दोनों ने पूर्व वाइस चांसलर कांति चौधुरी साहब को भी आमंत्रित किया तथा उनसे प्रशासन के अनेक मंत्र सीखे।

इस स्मृति लेख को लिखते हुए अनेक यादें बार बार ताज़ा हो रही है। छोटे से लेख में सबको समेटना सम्भव नहीं है। उनकी मनभावन आत्मीयता, हार्दिक अंतरंगता, सम्बंधों की अनौपचारिक सहजता, संवाद शैली की प्रभावोत्पादकता की जो छाप मेरे मानस-पटल पर अंकित है, उससे प्रसूत स्मृति-धाराएँ इस समय मेरे हृदय-सागर को लहरा, गहरा एवं दहका रही हैं।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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  1. श्रद्धेय डॉ शुक्ल के निधन के समाचार से स्तब्ध हूँ.... जबलपुर में वो हमारी कॉलोनी (टीटीसी कालोनी) के पीछे ही रहते थे और रोज़ सुबह रिज रोड पर उन्हे बहुत देर तक भ्रमण करते हुये देखा जा सकता था॥ इसी दौरान कई बार मैं भी उनके साथ हो लिया और ज्ञान के उस अगाध भंडार के अमृत की कुछ बूंदें मुझे भी मिलीं। पिछले कुछ महीनो से मैं जबलपुर में स्थायी रूप से नहीं हूँ और इन दिनों भोपाल में आ गया हूँ। ........... अब शुक्ल जी की अनुपस्थिति में रिज रोड हमेशा के लिए सूनी हो गई........ उनकी स्मृतियों को प्रणाम...... आनंद कृष्ण, भोपाल, मोबा- 9425800818

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