शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

नन्दलाल भारती की कहानी - लोटा भर पानी

न्दू वैसे तो स्कूल गया तो था पर दूसरी जमात पास नहीं कर पाया था। उसके गांव के जमींदारों के खेतों में पसीना बहाया पर कभी पेट भर खाने का मजा नहीं ले पाया। अच्छे कपड़े-लत्ते तो सपने की बाप थे। एक बार उनसे दूर के सर्वसम्पन्न रिश्तेदार देवसिंगार से मुलाकात हो गयी देवसिंगार आये वे अपनी आप बीती बताये। देवसिंगार की आप बीती से नन्दू के बाप खिरजू बहुत प्रभावित हुए और उनकी राह पर चलने की कसम खा लिये। एक दिन रात में वे चुपचाप बम्बई के लिये निकल पड़े। नसीब ने साथ दिया वे बम्बई की किसी कपड़ा मिल में बतौर मजदूर काम करने लगे थे। दो महीने बाद मनीआर्डर के साथ नन्दू के बाप का पत्र उसकी मां सुरजीदेवी को मिला था। बम्बई के चले जाने के बाद जिस जमींदार भैरव भाल की हलवाही खिरजू कर रहे थे उसका आतंक बढ़ गया था। दुर्भाग्यबस खिरजू ज्यादा दिन नौकरी नहीं कर पाये उपर वाले को प्यारे हो गये। जमींदार भैरवभाल की आंख में नन्दू का गठीला बदन खटकने लगा था। बदनसीबी ने नन्दू को जमींदार भैरवभाल का बधुवा मजूदर बनने पर मजबूर कर दिया था,जमींदार ने चक्रव्यूह जो ऐसा रचा भी तो था।

नन्दू अपने घर से सुबह निकलता और देर रात तक वापस लौटता,उसके छोटे भाई बहन सो चुके होते थे तब वह घर पहुंचता था वे सोये ही रहते थे तब भैरवभाल की हवेली को निकल चुका होता था इतनी व्यस्तता के बाद भी नन्दू को बिरहा गाने की शौक था उसने एक ख्यातिनाम स्वाजाति बिरहा गायक को अपना गुरू बना लिया था एकलव्य की तरह। खैर नन्दू भी निम्नवर्णिक था और उसके गुरू भी इस दृष्टि से बिरहा गायक को नन्दू को शिष्य बनाने में कोई आपत्ति तो नहीं रही होगी पर बंधुवा मजदूर ऐसा शौक कैसे पाल सकता है,यही दैत्याकार प्रश्न उसके सामने था। सप्ताह में एक दिन तो वह बस्ती के बच्चों और कुछ बिरहा में रूचि लेने वालो को इक्टठा कर नन्दू मण्डली सजा ही लेता था। सुबह हवेली पहुंचते ही जमींदार साहब भैरवभाल की फटकार भी सुननी पड़ती थी। नन्दू जमींदार साहब से कहता क्या करूं बाबू यही तो एक शौक है बाकी सब कुछ तो हवेली की चौखट पर कैद है।

जमींदार साहब डांटते हुए बोलते नन्दुवा तेरी जबान रोज-रोज बढ़ती जा रही है।

वह कहता बाबूजी को मेरी गायकी पसन्द आयी।

जमींदार बोलते अरे चूहा कभी शेर बना है क्या.......? कौआ कभी कोयल बन सकता है क्या.....? जा दूसरे जमींदारों के मजदूर घण्टा भर पहले से हल जोत रहे है,तू जबान लड़ा रहा है।

नन्दू सिर लटकाये हल बैल लिये खेत जोतने को निकल पड़ता या दूसरे काम में लग जाता। उसके घर से खाना पानी आता वही वह अपने पेट में उतारता। हवेली से उसे पीने तक को पानी नहीं मिलता था। कभी -कभी कुम्हारिन काकी होती तो वे उपर से पानी गिराती वह अंजुलि से पानी पी लेता। जमींदार काम तो पशुओं जैसे लेते पर पानी तक पीने को नहीं देते। सुबह लोटा भर रस और चबैना तो मिलता पर उसके घर से कोई आता तो उसके बर्तन में जमींदार के घर का कोई सदस्य ऐसे डाल देते थे जैसे कुत्ते को दूर से रोटी फेंक कर दी जाती है। लोटा भर रस,चबैना हवेली से खेत तक जाना भी इतना आसान नहीं होता था। रस चबैना देने से पहले घण्टों की बेगारी भी करवाई जाती थी। खेत तक पहुंचते-पहुंचते सूरज लटकने को हो जाता था। यदि उसके घर से कोई नहीं आ पाता था तो वह भी नसीब नहीं होता था फिर रात में घर वापसी पर ही रोटी नसीब हो पाती थी। एक दिन उसकी मां की तबियत खराब हो गयी नन्दू की घरवाली अपने बाप के मृत्यु शैया पर पड़े रहने की खबर सुनकर नैहर चली गयी थी ।मां बेचारी हवेली से रस चबैना लेकर जमींदार के खेत में हल जोत रहे नन्दू को नहीं पहुंचा पायी। भूखे प्यासे बेचारा हल जोतता रहा। मई का महीना लू ऐसी चल रही थी जैसे आग की लपटे हो।

आखिरकार वह दिन लटकते-लटकते नन्दू हल बैल लेकर आया ।उस इतनी भयंकर प्यास लग हुई थी उसकी गल बिल्कुल सूख चुका था वह खुद लू से तन्दूरी चिकन ।हवेली के सामने एकदम सन्नाटा  था इस सन्नाटे को लू तोड़ रही थी वह कुएं की जगत पर पशुओं की हौंद में पानी  डालने वाली बाल्टी भरी हुई देखा और तुरन्त कंध पर से हल नीचे रखकर कुएं की तरफ दौड़ा पर बाल्टी से पानी कैसे पीता उसे कुछ दूर पर लोटा दिखाई पड़ा जिसे कुत्ते चाट रहे थे । हांफते हुए कुत्तों से लोटा छीना और दौड़कर  बाल्टी से लोटा भर कर पानी पीया,पानी पीने के बाद उसे जीवनदान मिल गया हो। पानी पीकर बैलों को हौद पर लगाया,हल जुआठ रखा। इसके बाद फिर एक लोटा भर पानी पीकर लोटा मांजने लगा। इसी बीच रतीन्द्र जो जमींदार भैरवभाल के कुल का छंटा हुआ बदमाश लड़का था ।

रतीन्द्र भाल बोला क्यों बे लोटे में पानी पीया है क्या इसमें तो बड़े मालिक चाय पीते है।

 

नन्दू कोई गुनाह हो गया क्या कुत्तों से छीनकर लाया हूं।

रतीन्द्र-तू कुत्ते से अपनी तुलना क्यों कर रहा है ? कुत्ते अछूत तो होते नहीं ।

नन्दू-छोटे जमींदार कस्बे के बड़े कालेज में पढ़ते है,इंसान और जानवर में अन्तर करना ता आता होगा।

रतीन्द्र-जरूर पर तुम्हारी बिरादरी को सदियों से इंसान कहां माना गया ? तुम और तुम्हारे लोगों को बस उच्च लोगों की सेवा बिना किसी ना-नुकुर किये करना है। देश को आजादी क्या मिल गयी कि कीड़े-मकोड़ों को भी पंख निकल गये कहते हुए लोटा उसी बाल्टी से भरकर नन्दू के सिर पर दे मारा। नन्दू गिर पड़ा। कुछ देर बाद संभलते हुए उठा और रतीन्द्र का गर्दन पकड़कर उपर उठाया और धड़ाम से जमीन पर पटक दिया। रतीन्द्र चिल्ला-चिल्लाकर नन्दू को जातिसूचक गालियां देने लगा। रतीन्द्र के चिल्लाने की  आवाज सुनकर बड़ी मालकिन बोली अरे बहू देखो तो रतीन्द्र किसको गाली दे रहा है।

जमींदारन-किवाड़ का पल्ला खोलते हुए वे बोली किसी मजदूर पर रौब छांट रहे होगे। इनकी वजह से एक -एक कर सारे मजदूर भाग जावेंगे। मां साहब रतीन्द्रबाबू को समझाओं। वे मुंह पर हाथ रखते हुए बोली अरे बाप रे ...............?

बड़ी मालकिन- क्या हुआ बहू.....?

जमींदारन-नन्दू के सिर से खून बह रहा है। इतनी तेज लू चल रही है सुबह से मजदूर भूखा प्यासा है,शाम होने को आ गयी है,मजदूर के हवेली आते उसे रतीन्द्रबाबू ने मार दिया लगता है।

इतना सुनते ही बड़ी मालकिन,छोटी मालकिन,और हवेली से औरतें और बच्चे दालान में आ गये,भैरवभाल जमींदार कचहरी गये थे,बूढ़े जमींदार सुबह लोटा भर चाय पीकर देवदर्शन को चले गये थे,जिनके सप्ताह भर लौटने की उम्मीद थी। हवेली के बाकी लोग लू के आतंक से तंग आकर  शहर के महल में रहने चले गये थे।

नन्दू आव ना देखा ना ताव रतीन्द्र के मुंह पर थूक दिया और हवेली की लक्ष्मण रेखा पर कर गया।नन्दू घर पहुंचा बीमार मां नन्दू के सिर से बह रहे खून को देखकर रोने लगी। वह मां को चुप करवाते हुए बोला मां तू फिक्र ना कर अब मां जमींदारों की हैवानियत को नजदीक से जान गया हूं। मैंने एक फैसला कर लिया है।

बूढ़ी मां-क्या......?

नन्दू-मां चिन्ता ना कर मां खून का बदला खून से नहीं ले सकूंगा जानता हूं पर अपने मृतक बाप की राह पर तो चल सकता हूं।

बूढ़ी मां बेटे के सिर को नीम की पत्ती उबाल कर साफ की इसके बाद घाव को फिटकरी से भरकर पुराने कपड़े से पट्टी बांध कर उसे खटिया पर लेटा। बेचारी कांपते हाथों से दो रोटी बनायी और प्याज पर नमक छिड़ककर देते हुए बोली बेटा तुमको भूख लगी है,रोटी प्याज खाकर आराम कर लो,कल मैं जमींदार से गुहार लगाउंगी।

नन्दू-मां गुहार लगाने का कोई फायदा नहीं है,ये जमींदार लोग हम गरीबों का खून पीते आये है,पीते रहेंगे। इनसे निजात पाने के लिये दादा की राह पर चलना होगा।

बूढी मां-क्या परदेस जायेगा। बेटा तू परदेस चला गया तो हम लोगों का क्या होगा। जमींदार तो हम सबको जीते जी मौत के मुंह में ढ़केल देंगे।

नन्दू-ऐसा हो गया तो हवेली को मशान बन जावेगी।

बूढ़ी मां-उसके सिर पर हाथ सहलाते हुए बोली बेटा सब्र कर।

नन्दू-सब्र का ही तो नतीजा है हमारी गरीबी और आदमी होकर आदमी होने के सुख से वंचित रहना।

बूढ़ी मां-बेटा तेरी बात मेरे पल्ले नहीं पड़ रही है। तू सो जा।

नन्दू को रतीन्द्र छोटे जमींदार ने मारा है कि खबर पूरी मजदूर बस्ती में फैल गयी। उसकी हालचाल जानने के लिये बस्ती के लोग आते रहे। देर रात तक यह सिलसिला चलता रहा। बूढ़ी मां बोलती बेटा सो जा। बह बोलता मां सो रहा हूं तुम तो सोओ।

नन्दू को लिखना पढ़ना तो अधिक नहीं आता था पर टूटी-फूटी में लिख पढ़ लेता । बेचारे को पढ़ने लिखने का मौका ही कहां मिला बेचारा दूसरी जमात पास भी तो नहीं कर पाया था तभी से जमींदार का कैदी बन गया गया था। मां तम्बाकू हुक्की पर गुड़ाती रहती थी । सफेद कागज के टुकड़े में तम्बाकू की पुड़िया देखकर वह उठा उसी कागज पर उसने सुई अंगली में घुसाकर स्वयूं के खून से बड़ी मुश्किल से लिखा परदेस जा रहा हूं लिखकर सिर के नीचे रख लिया। रात भर करवटें बदलता रहा नींद तो उससे कोसों दूर थी। बूढ़ी मां की आंख लग गयी और वह घर से भाग चला। शायद नन्दू भागता नहीं तो उसकी लाश किसी नदी या कुयें में मिलती काफी सोच विचार कर उसने बूढ़ी मां धर्मपत्नी और छः महीने के बेटे का मुंह देखे बिना रात के अंधेरे में घर से निकल पड़ा।

बचते-बचाते उसका उद्यम साध्य हुआ। नन्दू मुसीबतों के समन्दर को पार करता हुआ दिल्ली शहर पहुंच गया। वह था तो मजदूर का बेटा उसे काम करने में शरम कैसा ? वह दिल्ली पहुंचते ही रेलवे स्टेशन के पास ढाबे के मालिक से अपनी व्यथा कथा एक सांस में कह सुनाया। ढ़ाबे के मालिक दिलेर को उस पर तरस आ गया बोले बेटा मेरे पास

 

तो तेरे लायक कोई काम नहीं है बर्तन धोने का और नल से पानी भरकर लाने का काम कर सकता है तो कर ले। समझ ले बर्तन धोना कोई खराब काम नहीं है। बेटा कोई काम खराब नहीं होता आदमी की नियति खराब होती है। कर्म तो भगवान की पूजा है,तुम्हारी पूजा भगवान को भा गयी तो वारे-न्यारे।

दिलेर की बात नन्दू की समझ में आ गयी। पहली बार शहर आया था दूर-दूर तक कोई जान-पहचान नहीं थी। तनख्वाह के साथ खाना-रहना मुफ्त था। भगवान का नाम लेकर वह काम पर  लग गया । नन्दू बड़ी ईमानदारी से काम करने गला ,ढाबे के मालिक को उसका काम खूब पसन्द आने लगा। सप्ताह भर के बाद नन्दू एडवांस रकम की मांग दिलेर के सामने रख दिया।

दिलेर बोले तुम लोगों का यही रोना है सप्ताह भर काम नहीं किये तगादा शुरू कर देते हो चल बता कितना एडवांस लेगा।

नन्दू-दो सौ.........।

दिलेर-पूरे महीने की तनख्वाह एडवांस,अभी तुम्हें काम करते-करते जुमे-जुमे आठ दिन भी नहीं हुए। चल तू भी क्या याद रखेगा कि किसी घुटने में अक्ल रखने वाले के ढाबे में काम करता है एक सौ रूपया और मनीआर्डर का खर्चा कुल मिलाकर एक सौ एक रूपया दिया। नन्दू ढाबे मालिक से रूपया लेकर मां के नाम मनीआर्डर किया। बेटा की खबर और मनीआर्डर पाकर उसके घर जैसी दीवाली छा गयी।

नन्दू ईमानदारी से काम कर ही रहा था,दो महीने में वह वेटर का काम भी सीख गया था । एक दिन दिलेर के एक मित्र आये नन्दू को अपने कारखाने में काम करने का न्यौता दे दिये।

नन्दू यह प्रस्ताव दिलेर को बताया।

दिलेर ने स्वीकृति दे दी।

नन्दू हंसी खुशी प्लास्टिक की मोल्डिंग के काम में लग गया । छः महीना काम करने के बाद उसको मन में विचार उपजा की वह क्यों ने एक मोल्डिंग मशीन लगा ले। यह बात उसने कम्पनी के मालिक दूसरे घुटने में अक्ल रखने वाले मरजीत से कह सुनाया।

मरजीत ने भी उसको बढ़ावा दिया। नन्दू एक मोल्डिंग मशीन लगाकर खुद मरजीत के आर्डर के अनुसार उत्पादन करने लगा। कहते है न मन सच्चे मन से किये काम का प्रतिफल सुखकारी और लाभकारी भी होता है। नन्दू के परिश्रम से बोया बीज खूब फलने फूलने लगा। उसका धंधा चल पड़ा अब वह नन्दराज सेठ के नाम से जाना जाने लगा। एक बेटा और दो बेटी का वह बाप भी बन चुका था। बच्चे शहर के स्कूल-कालेज में पढ रहे ।शहर से गांव उसका सब आबाद हो रहा था। उधर भैरवभाल की हवेली में रतीन्द्र कंस साबित हो चुका था। हवेली में कलह के नित नया विस्फोट हो रहा था। धीरे धीरे-पूरी हवेली वीरान हो गयी। जमींदार के खेत धड़ल्ले से बिक रहे थे। हवेली के हिस्सेदार शहर में जा बसे। भैरवभाल जमींदार की हवेली जहां उंचे-ओहदेदार,नेता लोगों का आना जाना लगा रहता था,वही हवेली अंवारा कुत्तों की ऐशगाह बन गयी थी। गांव के सबसे बड़े जमींदार हवेली भुतही हवेली के नाम से पहचानी जानी लगी थी। नन्दू की झोपड़ी की जगह पक्की कोठी तन गयी थी,वह जब शहर से आता तो मजदूर बस्ती ही नहीं जमींदार लोग भी अब नन्दराज सेठ से मिलने आते थे।नन्दू कहता वाह रे लोटा भर पानी की मार मुझे नन्दराज सेठ बना दिया।

उम्र की बीमारी नन्दराज सेठ को भी जकडने लगी थी। बाप तो पहले स्वर्गवासी हो चुके थे मां ने भी साथ छोड़ दिया वे भी बैकुण्ठवासी हो चुकी थी। नन्दराज सेठ का बेटा चमनराज एम.बी.ए.की पढ़ाई पूरी कर चुका था। दोनों बेटियां भी शहर में पढ़ाई कर रही थी। नन्दराज सेठ एम.बी.ए.बेटे चमनराज को कारोबार सौंप कर गांव में रहकर गरीब मजदूरों की सेवा में लगने के इच्छुक थे। बेटा चमनराज बाप को अपनी आंखों से दूर नहीं होने देना चाहता था। बाप की जिद पूरा करने के लिये चमनराज गांव में गरीब मजदूरों के बच्चों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के ध्येय से स्कूल खोलने का विचार बना लिया। दो साल में स्कूल तन गया। कुछ ही सालों में प्रसिद्ध हो गया। स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में नन्दराज सेठ सपरिवार उपस्थिति रहते। मेधावी बच्चों को पुरस्कार देते और गरीब बच्चों की आगे की पढ़ाई का जिम्मा भी। इसी सिलसिले में नन्दराज सेठ सपरिवार गांव आये थे। पहले की तरह इस बार भी आसपास के जरूरतमंद और मानिन्द लोग मिलने आये पर इस बार एक नया चेहरा जिसे देखकर कुत्तों भौंकने लगे थे। बस्ती के बच्चे पगला कहकर ढेला मार रहे थे। शोरगुल सुनकर नन्दराज सेठ खिड़की से बाहर देखने लगे। वे देखते पहचान गये इतने में वह फटेहाल आदमी कोठी के दरवाजे पर आ धमका। वहां उपस्थित लोग भौंचके रह गये। नन्दराज बोले घबराने की कोई बात नहीं है। सबको बैठने का अनुरोध करते हुए बोले अछूत के दरवाजे पर कैसे आना हुआ ?

कुछ बाहर के लोग पहली बार आये थे जो नहीं पहचान रहे थे बोले सेठजी पागल का इतना सत्कार?

नन्दराज सेठ-कोई मामूली आदमी नहीं हैं ये जनाब ?

कौन है..............?

 

नन्दराज-गांव के बड़ी हवेली के वारिस जमींदार रतीन्द्र भाल।

कैसी जमींदार बचा क्या है? भूतही हवेली गरीबी की आह ले डूबती है।

रतीन्द्र-मैं भी डूब चुका हूं बस एक आस बची है।

कामनाथ बोले-हवेली बेचना है। अरे भुतही हवेली किसी मजदूर के खरीदने की बस की बात तो नहीं। दो चार बीसा बचा हो तो अधिया टिकुरी पर कोई जोत बो सकता है।

रतीन्द्र-हवेली के हिस्सेदार है,अकेले बेंच नहीं सकता। जमींदारी पहले बिक चुकी है।

कामनाथ-फिर कैसी उम्मीद और किससे ?

रतीन्द्रभाल-नन्दराज सेठ से।

नन्दराजसेठ-बाबूजी पानी दाना कुछ तो अछूत के घर को लेंगे नहीं।

जमींदार रतीन्द्रभाल-अछूत तो मैं। तुमसे भीख मांगने आया हूं कहते हुए हाथ जोड़ लिये।

नन्दराज सेठ-बाबूजी मैं अछूत किस काम आ सकता हूं,बेहिचक बोलो।

रतीन्द्रभाल-एक और ख्वाहिश पूरी कर देते तो हमारी पीढ़ियां तुम्हारी कर्जदार रहती।

वैसे भी कर्जदार है जो कभी हवेली में मजदूर थे कामनाथ जो अब नन्दराज सेठ का विश्वासपात्र था  बड़े आत्मविश्वास के साथ बोला।

नन्दराजसेठ- क्या।

रतीन्द्रभाल-बेटवा को नौकरी ताकि चैन से मर सकूं और मरने के बाद एक गज कफन तो मिल जाये। अपने किये पर शर्मिन्दा हूं नन्दराजसेठ कहते हुए रोने लगे। रतीन्द्रजीमंदार की आंसुओं की बाढ़ को देखकर कामनाथ बोला क्यों लोटा भर आंसू गार रहे हो।

रतीन्द्रभाल-आंसू नहीं प्रायश्चित कर रहा हूं कामनाथ।

कामनाथ-पानी पीओगे।

क्यों नहीं बहुत जोर की प्यास लगी है।

कामनाथ-अछूत के घर का पानी पीकर नरक चले गये तो।

रतीन्द्रभाल-आत्मग्लानि से छुटकारा और स्वर्ग का सुख मिलेगा ।

अपने हाथ से पानी लेकर आउं कामनाथ बोला।

जरूर-जमींदारी के अभिमान से दरिद्र बन चुके रतीन्द्र बोले।

कामनाथ उसी लोटा में पानी लाया जिसे लोटा में पानी भरकर जमीदार रतीन्द भाल ने नन्दू के माथे पर मारा था साथ में चांदी का गिलास भी जो नन्दू सेठ ने अपने परिश्रम से बनवाया था।

कामनाथ के हाथ से लोटा लेकर,लोटा भर पानी पेट में उतारते पूर्व जमींदार अब कंगाल और प्रतिष्ठा खो चुके रतीन्द्रभाल बोले नन्दराज सेठ ने आंखे खोल दी है। मेरा प्रायश्चित तभी पूरा होगा जब नन्दराज सेठ के प्याउं पर लोटा भर-भर पानी पीलाते तो जीवन गुजार दूं। जाति से नहीं आदमी कर्म से महान बनता है समझ में अब आ गया है।

कामनाथ-काश समझने में लोग देर ना किये होते तो देश आदमी बहुखण्डित और देश खण्डित ना हुआ होता।  .नन्दलाल भारती 06.02.2013

समाप्त

दूरभाष-0731-4057553

 

डाँ.नन्दलाल भारती

एम.ए. ।समाजशास्त्र। एल.एल.बी. । आनर्स ।

पी.जी.डिप्लोमा-एच.आर.डी.

। लोटा भर पानी। कहानी

 

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जनप्रवाह।साप्ताहिक।ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

उपन्यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त
       नेचुरल लंग्वेज रिसर्च सेन्टर,आई.आई.आई.टी.हैदराबाद द्वारा भाषा एवं शिक्षा हेतु रचनाओं पर शोध कार्य ।  

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