सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

विजय शिंदे का आलेख - महात्मा गांधी के अर्थनीति की प्रासंगिकता

महात्मा गांधी के अर्थनीति की प्रासंगिकता
                                   
                                    डॉ. विजय शिंदे
                                    देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.


भूमिका
    व्यक्ति, घर, परिवार और देश का संपूर्ण विकास करना है तो देश की अर्थनीति का मजबूत होना जरूरी है। जिसकी अर्थनीति सशक्त-सफल वहीं वर्तमान युग में अपने कदमों को ताकत के साथ उठा सकता है। इस बात को हम, आप और दुनिया का कोई भी सामान्य इंसान बता सकता है। गांधी जी तो गांधी जी थे, ‘महात्मा’ थे, ‘बापू’ थे। उन्होंने तो दुनिया को देखा था, पहचाना था। समाजनीति, राजनीति, अर्थनीति के वर्तमान और भविष्य को उन्होंने सूक्ष्मता से परखा था। आजादी की जंग में उन्हें पता था कि हमें आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और स्वयंपूर्ण होना चाहिए। गांधी जी का मानना था कि इंसान हमेशा गतिमान रहें, कार्यमग्न रहें, चिंतन करें, मन पवित्र रखें। इस विचार को वास्तव में उतारने के लिए गांधी जी ने चरखे का चुनाव किया। उन्होंने पहचाना था कि प्रत्येक व्यक्ति और व्यक्ति के माध्यम से भारत की गरीबी को दूर करने का मंत्र ‘चरखा’ है। हिंदी के प्रसिद्घ कवि सुमित्रानंदन पंत ने गांधी जी के चरखे का गुणगान गाया है।

                    ‘‘ नग्न गात यदि भारत मां का,
                    तो खादी समृध्दि की राका,
                    हरो देश  की दरिद्रता का
                    तम्,  तम्, तम्,।
                          ***
                    सेवक पालक शोषित जन का,
                    रक्षक मैं स्वदेश के धन का,
                    कातो हे, काटो तन मन का
                    भ्रम, भ्रम, भ्रम।’’
                        (ग्राम्या - पृ. ५०-५१)

    उपर्युक्त पंक्तियां सुमित्रानंदन जी की है पर आत्माभिव्यक्ति गांधी जी की। गांधी युग में भी और युगोपरांत भी लेखक-कवि और साहित्यकार गांधी विचार-आचार से प्रभावित रहे हैं। साहित्यकारों ने गांधी जी की लगन, ईमानदारी और त्याग को जाना-पहचाना और उनका वैचारिक धन अपने-अपने तरीके से देश और दुनिया के सम्मुख रखा। जैसे-जैसे इंसान की भौतिक प्रगति हो रही है और वह अधिकाधिक प्रगति पथ पर चढते जा रहा है वैसे-वैसे गांधी जी और उनके विचारों की जरूरत है यह प्रखरता से महसूस कर रहे हैं। कई बीमारियों की मर्ज जैसे एक दवा होती वैसे ही हजारों मुश्किलों को दूर करने की क्षमता गांधी विचार-वाणी आचरण में हैं।

आत्मघात ?
    आज भारत सामाजिक और राजकीय दृष्टि से संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। सरकार के गलत कदम देश को आर्थिक और प्रशासकीय नुकसान पहुंचा रहे हैं। केवल भारत ही नहीं तो विश्व की अर्थव्यवस्था संकट में पड चुकी है उनको ठीक-ठाक करने के लिए गांधी जी के सिद्घांत और जीवनमूल्य की आवश्यकता है। जिन विदेशी वस्तुओें और साधनों को गांधी ने नकार था उनका आज ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया जा रहा है। यह वर्तमान वास्तव विडंबना नहीं तो और क्या है? गांधी विचारों के उत्तराधिकारी हूं ऐसा माननेवाले लोग और राजनीतिक पार्टियां उनके विचारों से कोसों दूर है। फिलहाल एफ.डी आय. के कारण गांधी जी के ‘स्वदेश’ अर्थनीति की जुगाली की जा रही है, ऐसा कल भी नए आर्थिक निर्णयों के वक्त किया जाएगा। पर केवल चर्चा से कोई लाभ नहीं होगा। उचित विचार-निर्णय और कृति का मिलाप करना  जरूरी है। दुःख इस बात का है कि वर्तमान में ऐसा नहीं हो रहा है। गलत दिशा में अपने कदम पड रहे हैं। इससे देश को नुकसान होने की संभावनाएं बन रही है। ऐसा लगता है नवबाजारवाद से व्यक्ति पतन की ओर बढ़ रहा है। कृष्णदत्त पालीवाल लिखते हैं, ‘‘मोबाईल फोन शुरूआत में तो विदेशी कंपनियों ने हजार-दो हजार में बेचें। आज पाच हजार से लेकर लाख रूपए तक बेचा जा राह है और इनसे बाजार पट गया है। इनमें न जाने कितनी डिवाइसें फिट कर दी हैं फोटोग्राफी, कंम्युटर, रिकार्डिंग और असीम स्मृति-कक्ष। इनके मालिक निरंतर लाभ के लिए नई-नई तकनीक इजाद करते हैं और इंटरनेट की सुविधाओं से संपन्न बनाकर सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतिमान बन गए हैं। महंगे कंप्युटर, लैपटाप, मंहगे जूते महंगे पर्स सभी का सदाबहार बाजार भारत बन गया है।’’ (ई संदर्भ) आज भारत में मौजूद आबादी विश्व के लिए बहुत बड़ा बाजार है। जरूरत जब फॅशन बन जाती है तब एक वस्तु नहीं तो कई वस्तुओं का संग्रह करने का मोह और स्पर्धा शुरू हो जाती है। यह मानसिकता व्यावसायिकों, उत्पादकों एवं मिल मालिकों के लिए सुनहरा मौका देती है। अर्थात् बड़े खेद के साथ कहना पड़ा रहा है कि वर्तमान में हमने गांधी विचारों को भूला दिया है। ठीक है पर एक आशा यह भी है कि ‘देर आए दुरूस्त आए’ कहकर देशवासी अपने पास उपलब्ध गांधी विचारों का सम्मान आज नहीं तो कल करेंगे। देश और दुनिया की मानसिकता में जरूर परिर्वतन होगा। गांधी कहते हैं, ‘‘यह पृथ्वी सारे जीव और जगत् के भूख प्यास को मिटाने के लिए समर्थ है परंतु किसी एक इंसान के अतिरिक्त लालच को पूरा करने के लिए असमर्थ है।’’ फिलहाल ‘स्वदेशी’ अर्थनीति को हाशिए पर छोड़कर विदेशी भौतिकवाद को बढ़ावा  देने की वृत्ति अतिरिक्त ‘लालच’ नहीं तो क्या है? समय पर सावधान होना जलरी है नहीं तो आत्मघात होगा।

आर्थिक समानता
    एक बड़ा बुद्धिजीवियों का तबका और राजनीतिज्ञों का गूट जातियता की राजनीति खेल रहा है। जातियवादी राजनीति में समाज को गुमराह करके विदेशी रुपए-पैसा और वस्तुओं को देशी बाजार में लेकर आ रहा है। इस गलत अर्थनीति के अपने देश पर कौनसे दुरगामी परिणाम होंगे इससे उसे कुछ लेना देना नहीं हैं इसीलिए फिलहाल देशी और विदेशी पूंजीपति पैदा हो चुके हैं भविष्य में भी होंगे। वे अपना मुनाफा और स्वार्थ साधना चाहेंगे और इससे देशी गरीब जनता की निरंतर शोषण प्रक्रिया शुरू होगी। जिसके पास पैसे की उपलब्धता है उसका वर्चस्व बना रहेगा और यह वर्चस्ववाद सर्वसत्तावाद में परिवर्तित होने के लिए समय नहीं लगेगा। यही सर्वसत्तावाद भविष्य में राजनीति और बाजारवाद का नियामक होगा। अतः सवाल उठता है कि सामान्य जनता क्या करेगी? उसका इस दुनिया में स्थान और अस्तित्व किस रूप में होगा? नौकरियां? गुलामगिरी?.... महात्मा गांधी जी ने नैतिक और सामाजिक उत्थान को अहिंसा कहा था। इसमें से एक भी खोखला हो गया तो देश का पूरा ढांचा भरभराकर गिर पडेगा। गांधी जी ने कहा था,  ‘‘ मैं राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता की बात करता हूं। राजनीतिक स्वतंत्रता से मेरा मतलब किसी देश की शासन प्रणाली की नकल  से नहीं है। उनकी शासन प्रणाली अपनी-अपनी प्रतिभा के अनुसार होगी, परंतु स्वराज्य में हमारी शासन प्रणाली हमारी अपनी प्रतिभा के अनुसार होगी। मैंने उसका वर्णन ‘रामराज्य’ शुद्घ के द्वारा किया है। अर्थात् विशुद्ध राजनीति के आधार पर स्थापित तंत्र। मेरे स्वराज्य को लोग अच्छी तरह समझ लें, भूल न करें। संक्षेप में वह यह है कि विदेशी सत्ता से संपूर्ण मुक्ति और साथ ही संपूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता।‘‘ गांधी जी की स्वतंत्रता का अर्थ था गरीबों का स्वराज्य। जीवन में जिन आवश्यकताओं का लाभ-उपभोग अमीर लोग कर रहे हैं वहीं गरीबों को मिले ऐसी आर्थिक समानतावादी नीति उनकी थी। वर्तमान स्थिति को देखकर प्रश्न निर्माण होता है कि हम किन रास्तों पर जा रहे हैं। अपने कदम सुरक्षित मुकाम की ओर बढ़ रहे हैं या आत्मघात की ओर? सारी घटनाओं एवं स्थितियों को देख कभी-कभी लगता है कि अब भी देर नहीं हुई । गांधी जी के देश के हम निवासी है। विश्व के शक्तिमान देशों के सामने आर्थिक संकट खड़ा है। अमेरिका और युरोप आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसी स्थिति में अपने देश की आर्थिक व्यवस्था पैर जमाकर खड़ी है, अतः भारत के सामने एक अच्छा मौका है कि और शक्तिशाली बने विदेशी कंपनियों के झूठे वादों में फंसकर गलत रास्तों पर जाने की अपेक्षा विकल्पों को ढूंढे। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका को मॉडल माननेवाले विचारों को जबरदस्त तमाचा लगेगा।

आर्थिक सर्वेक्षण
    अर्र्थशास्त्र और अर्थ व्यवस्था के हिसाब से गांधी जी के विचार अत्यंत मौलिक है। वे परंपरागत विचारों को नकारकर नवीन विचारों का स्वीकार करते थे, अतः गरीबों के विकास का मार्ग खुल जाता था। उनके लिए विश्व शांति, सुख और पर्यावरण की सुरक्षा महत्वपूर्ण थी। उन्हें लगता था इन तीनों बातों के अनुकूल आर्थिक नीति हो। उन्होंने अर्थनीति और नैतिकता को भी अलग नहीं माना था। अपना देश गांवों से बना है और गांवों की सुरक्षा देश की सुरक्षा है इसे गांधी जी    भली-भांति जानते थे। अपने देश की शक्ति गांवों की स्वयंपूर्तता में है और रहेगी भी। गांवों में किसी भी वस्तु को आयात नहीं करना पडता था उसकी सारी मांगें वहीं पूरी होती थी। केवल कपडों को आयातित करना पड़ता था अतः गांधी ने चरखे के उपयोग से गांवों को सच्चे मायने में स्वयंपूर्ण बनाया। पर आज पानी से खाने तक और दंतमंजन से लेकर साफ-सफाई तक वर्तमान भारतीय आयातित चीजों पर निर्भर है। अपना टॉयलेट खुद साफ करनेवाले गांधी अगर आज होते और उन्होंने वर्तमान भारतीय बाजार, राजनीतिक एवं सामाजिक स्थितियों को देखा होता तो बहुत पीडित होते। शहरवाद के कारण गांव विरान हो रहे हैं। पढ़ा-लिखा ग्रामीण युवक शहरों की ओर भाग रहा है। गांव में केवल वृद्ध लोग बचे हैं मृत्यु का इंतजार करते हुए। खेती बंजर है, वृद्धों के हाथ थक चुके हैं कांप रहे हैं। जिन हाथों को उन्होंने ताकत दी वे दूर आधुनिकता में बह चुके हैं। कभी-कभार रुपए देकर खरीदी नई चमचमाती गाडी में देशी हाथ ड्रायव्हींग करते गांव की तरफ आ जाते हैं। विरान-बंजर जमीन और रस्तों से धुल उडाते गांव की तरफ जाते हैं। गरीब और उपेक्षित मां-बाप उनका आना-जाना टकटकी लगाए देखते हैं। वैसे ही गांव भी अपने सपूतों को धुल भरी आंखों से देखता बैठा है। एक निराशा, वीरानता, निर्जिवता, दुःख और पीडा गांव-गांव में भरी पडी है। समाज विघातक राजनीति, शराब और गलत आदतों को बचे-खुचे युवक अपनाकर पतनोन्मुख चुके हैं। स्वयंपूर्णता-आत्मनिर्भरता -ईमानदारी-पवित्रता-अहिंसा-प्रेम-पर्यावरण कहां शेष है? गांधी जी जब थे तब ऐसी भयावह स्थिति नहीं थी उसके थोडे-बहुत संकेत मिल रहे थे, अतः भविष्य को देखकर उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण का पुरस्कार किया। उन्होंने एक सुनियोजित कार्यक्रम को बनाते हुए कहां,’’ सभी गांवों का सर्वेक्षण कराया जाएगा और उन चीजों की सूची तैयार कराई जाएगी जो कम से कम या किसी तरह की सहायता के बिना स्थानीय रूप से तैयार की जा सकती हैं और जो या तो गांवों के ही इस्तेमाल में आ जाएंगी या जिन्हें बाहर बेचा जा सकेगा। उदाहरण के लिए कोल्हू से पेरा गया तेल या खली, कोल्हू से पेरा गया जलाने का तेल, हाथ से कुटे चावल, ताड गुड, शहद, खिलौने, चटाइयां, हाथ से बना कागज, साबुन आदि। इस प्रकार यदि पर्याप्त ध्यान दिया जाए तो ऐसे गांवों में जो निष्प्राण हो चुके हैं या निष्प्राण होने की प्रव्या में हैं , नवजीवन का संचार हो सकेगा तथा उनकी स्वयं अपने और भारत के शहरों और कस्बों के इस्तेमाल के लिए आवश्यकता की अधिकांश वस्तुओं के निर्माण की अनंत संभावनाओं का पता चल सकेगा। (हरिजन, २८.०४.१९४६, पृ.१२२).
    गांधी जी के उपर्युक्त उदाहरण में संदर्भ पुराने हैं पर आज शहरों में जो उधम मची है उसके लिए उपाय-विकल्प गांव में ही है। खेती और गांवों की सुरक्षितता-अस्मिता को बनाए रखते हुए लघुउद्योगों का विकास जरूरी है। पूंजीपतियों को प्रोत्साहित कर, यांत्रिकता को अपना कर मनुष्य का पेट नहीं भरेगा। जरूरत है रोटी के निर्मिति की और रोटी देने वाले छोटे उद्योगों के विकास की।

कला और शिल्प
    संस्कृति, उत्सव, कला, शिल्प, सौंदर्य, पर्यावरण, जीवंतता, सुख, शांति और बहुत कुछ गांव में उपलब्ध रहता है या अनुकूल वातावरण में इनकी निर्मिति होती है। मूलतः जो उपलब्ध है उसे अंतिम परिपूर्ण रूप देने की जरूरत है गांधी विचारों के अनुसार यही पूरिपूर्णतः कला और शिल्प है। ठीक है आज अपने गांव धूल-धूसरित है पर वे कल-परसों सुंदर रूप धारण कर सकते हैं। गांवों को विकास की दृष्टि से अग्रक्रम दिया तो रूप बदल सकता है। गांव में जन्मे प्रखर बुद्घिवादी लोग अगर गांव के लिए उत्तरदायी रहेंगे तो निश्चित चित्र बदल सकता है। आज जो शोषण, अन्याय, अत्याचार या धोखाधड़ी हो रही है वह कल बिल्कुल नहीं होगी। परंतु जरूरत है गांवों के तत्काल पूनर्निर्माण की। गावों के पूनर्निर्माण की प्रक्रिया निरंतर और सदा के लिए हो। गांवो में निर्मित चीजें सुंदर आकर्षक और मजबूत हो। बाजारों में उनकी मांग हो, उन्हें जल्दी बेचा जाना चाहिए। इससे गांवो की निर्मिति के प्रति बाजार में विश्वास बनेगा और रोजगार निर्मिति से गांव के आर्थिक स्रोत खुल जाएंगे। गांधी जी लिखते हैं, ‘‘ग्रामवासियों को अपने कौशल में इतनी वृद्घि कर लेनी चाहिए कि उनके द्वारा तैयार की गई चीजें बाहर जाते ही हाथोंहाथ बिक जाएं। जब हमारे गांवों का पूर्ण विकास हो जाएगा तो वहां उंचे दर्जे के कौशल और कलात्मक प्रतिभा वाले लोगों की कमी नहीं रहेगी। तब गांवों के अपने कवि भी होंगे, कलाकार होंगे,                                    वास्तुशिल्पी होंगे, भाषाविद् होंगे और अनुसंधानकर्ता भी होंगे। संक्षेप में, जीवन में जो कुछ भी प्राप्त है, वह सब गांवों में उपलब्ध होगा।’’ (हरिजन, १०.११.१९४६, पृ.३९४).

आर्थिक पुनर्रचना
    गांधी जी ने अपने वैचारिक लेखन में आर्थिक पुनर्रचना पर जोर दिया है। उन्हें पता था कि देश परिवर्तित हो रहा है। भूतकाल में जो भारतीय समाज रचना और व्यवस्था थी वह जैसे के वैसे रहेगी यह तो संभव नहीं पर इसका अर्थ यह नहीं कि पुराना सबकुछ अस्वीकार्य है। पुराने का सम्मान करते हुऐ जरूरी परिर्वतन के साथ नए की स्वीकृति जीवंतता का लक्षण है। परिर्वतन जरूरी है पर कौनसा सकारात्मक या नकारात्मक, उपयोगी या हानिकारक यह तो सोचे। गांधी जी ने अपने देश की आर्थिक व्यवस्था को ताकतवर बनाने के लिए सोच-समझकर ‘स्वदेशी’ का निर्णय लिया। ‘स्वदेशी’ के सन्मान की सोच सारे भारतीयों ने बड़े आराम के साथ स्वीकारी और विदेशी वस्तुओं की होली की। अपनी जरूरतों को सीमित रखते हुए  स्वदेशी चीजों पर निर्भर रहना सीखा। इसीलिए अपने-आप आर्थिक पूनर्रचना की और कदम उठते गए। देशी लोगों के हाथों को काम मिला। हजारों भारतीयों के भूख का प्रश्न मिट चुका और उनके आर्थिक गुलामी से मुक्त होने के मार्ग खुल गए। गांधी जी के ‘स्वदेशी’ पुकार से ब्रिटिशों के राजसत्ता की नींव हील गई। उनके पैरों तले की जमीन सरकने लगी। यह गांधी युग में घटित हुआ, आज क्यों नहीं हो रहा हैं? आज आर्थिक दृष्टि से विदेशी आक्रमणकारियों को रोकना संभव नहीं है? अमरिका और विदेशी कंपनियों की  मंशाओं को रोकने की तकनीक गांधी के आर्थिक पूनर्रचना सिद्धांत के माध्यम लेनी चाहिए।
    विदेशों से जो भी उत्पादन भारत में प्रवेश कर रहा हैं उसकी मनुष्य स्वास्थ्य के हिसाब से जांच पड़ताल की सही पद्धति भारत में नहीं है। अगर है भी तो उसे अमल में लाने की इच्छाशक्ति नहीं। अपने देश से निर्यात हो रहे अंगुर या अन्य फल विदेशों में जांच-पड़ताल के बाद ही स्वीकारे जाते हैं। रोक लगाई दवाइयों का इस्तेमाल कर अगर फलों का उत्पादन लिया है तो बेझिझक यूरोपीय देश उन्हें वापस भेज देता है। कुछ भी बिना सोचे-समझे एक रुपए का मूल्य दिए बिना। मर रहा है किसान, नुकसान उठा रहा है। वापस आए फलों को निराश आंखों से देखता है। हम अपने देश में ऐसे कदम क्यों नहीं उठाते? देशी उत्पादकों को सुरक्षा देकर विदेशी उत्पादकों को वापसी का रास्ता दिखाने का समय आ चुका है और हम हाथ -पर हाथ धरे बैठे हैं। गांधी जी उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों का विरोध करते लिखते हैं, ‘‘मनुष्य का लोभ जो हमें लोगों के स्वास्थ्य या उनकी संपत्ति की कोई परवाह ही नहीं करने देता, चावल पैदा करने वाले क्षेत्रों में सर्वत्र फैले भद्दे चावल-मिलों के लिए उत्तरदायी है। यदि लोकमत शक्तिशाली बन जाए तो वह बगैर पॉलिश किए चावल के उपयोग पर जोर देकर सब चावल-मिलों को बंद करा सकता है और चावल-मिलों के मालिकों से अपील कर सकता है कि वे इसी चीज का उत्पादन बंद कर दें जिससे समूचे राष्ट्र के स्वास्थ की हानि होती है और गरीबों को आजीविका के एक निर्दोष साधन से वंचित होना पडता      है।’’ (हरिजन, २०.१०.१९३४, पृ.२९२). अर्थात् अंगूर और फलों के दृष्टि से जो युरोप करता है वह भारत क्यों नहीं करता? उसे करना पड़ेगा उसके संकेत और सीख गांधी जी ने उनके समय में दी थी। इसका अर्थ यह नहीं होता कि गांधी प्रगति विरोधक थे, उद्योग विरोधक थे या यंत्र विरोधक थे बल्कि उन्होंने स्वयंपूर्णता नष्ट करनेवाले यंत्रों का विरोध किया था। पौराणिक गांवों में खेती को पानी देने के लिए ‘मोट’ थी नाली थी। आज ‘मोट’ की जगह पर ‘मोटर’ आ गई। बिजली पर चलने वाली मोटर। ‘लोडशेडिंग’, ‘लाईट गई’, ‘पॉवर नहीं’, ‘मोटर शुरू नहीं हो रही है’ यह वाक्य और शब्द गांवों में हमेशा सुने जाते हैं। इसके बाद पानी के बिना सुखती फसल को देखते हुए किसान दुःखी-पीडित होता है, और भूगर्भ से पानी का गैरजरूरी ऊपर खिंचना प्रकृति के साथ अन्याय नहीं तो क्या है?

उपसंहार
    महात्मा गांधी जी ने समय-समय पर जिन विचारों को व्यक्त किया उससे केवल भारत का नहीं तो विश्व का उद्धार हो सकता है। उनके युग में गांधी विचारों की आवश्यकता थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी, अर्थात् गांधी विचारों की प्रासंगिकता बनी रहेगी। प्रत्येक व्यक्ति के अन्न-वस्त्र सहित सभी प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करना है तो छोटी-मोटी चीजें एवं जरूरतों के उत्पादन का अधिकार अपने हाथों में होना चाहिए। वे अधिकार सबके पास हो जैसे ईश्वर ने प्राकृतिक तौर पर हवा की सबको उपलब्धता की है वैसे। दूसरे के लिए जहां पर शोषण के मौके दिए जाते हैं वहां आर्थिक स्वावलंबन संभव नहीं। सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि आर्थिक विकास से गरीबी दूर की जा सकती है परंतु गांधी जी को लगता है कि आर्थिक विकास से संभव है गरीबी और अमीरी के बीच की खाई बढ़ जाएगी। इसीलिए उन्होंने आर्थिक विकास को नहीं तो गरीबों की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करना आर्थिक नीति में केंद्र विचार माना। देश के नियामकों और राजनेताओं को गांधी ने आवाहन किया कि आप हमेशा आर्थिक नीति तय करते वक्त गरीब और कमजोर लोगों को सामने रखकर सोचे और अपने निर्णय से उन्हें कितना फायदा होगा देखें। गांधी जी का खासतौर पर यह भी आग्रह है कि देश की संपूर्ण आबादी का अधिक-से अधिक उपयोग करें। ध्यान रखे श्रम को अपमानित करनेवाली योजना न देश-हित की होती है न मानव-हित की।
निष्कर्षत : कहा जा सकता है कि गांधी जी के व्यक्तित्व में विविध पहलुओं के साथ एक अर्थतज्ञ भी उपलब्ध था।

                                डॉ. विजय शिंदे
                                देवगिरी महाविद्यालय,औरंगाबाद.
                                फोन  :- ०९४२३२२२८०८
                                ई.मेल :- drvtshinde@gmail.com

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