शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

शैलेन्द्र नाथ कौल की व्यंग्य रचना - बाल कर अधिनियम


बाल कर अधिनियम
लेखक - शैलेन्द्र नाथ कौल

       देश की बढ़ती आबादी की चिन्ता भले देश के लिए कुछ सोचने वालों को हो परन्तु नेताओं और अधिकारियों को बिल्कुल नहीं है । कारण यह कि नेताओं को ज़्यादा वोट का फायदा और अधिकारियों को जनसंख्या के हिसाब से मिलने वाली अधिकतर सरकारी योजनाओं में आवंटित बजट में अधिक कमीशन का फ़ायदा । फिर भी लगे कि हम कुछ कर रहे हैं, के अन्दाज़ में दोनों मिलकर मीटिंग-सीटिंग और बयान बाज़ी करते रहते हैं । 2011 की जनसंख्या के आंकड़े आने के बाद भी ऐसा ही कुछ हुआ । समाचार आया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्री ने बढ़ती जनसंख्या की समस्या से निपटने के लिए एक बैठक बुलायी है । बैठक में सभी अधिकारियों का भाग लेना आवश्यक है ऐसा मन्त्री जी का आदेश है ।

       एक पत्रकार होने के कारण मैं भी बैठक की कार्यवाही जानने पहुंचा । जैसा कि होता है , माननीय मन्त्री जी बैठक के निर्धारित समय से एक घन्टा विलम्ब से पहुंचे । इस एक घन्टे के समय में अधिकारियों ने आपसी हास परिहास के साथ आबादी की समस्या पर भी विचार विमर्श किया । विचार विमर्श को बैठक की कार्यवाही में नहीं सम्मिलित किया गया परन्तु मुझे विश्वस्त सूत्रों से इस अनौपचारिक वार्ता का जो विवरण प्राप्त हुआ है उसे मैं औपचारिक रुप से जनता की भलाई के लिए अनसेन्सर्ड पेश कर रहा हूं।

       श्री दिनकर, स्वास्थ्य सचिव - ‘‘ मैं समझता हूं कि हमें यह पुराने तरीके छोड़ कर ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे लोगों पर प्रभाव पड़े और वे इस विषय को गंभीरता से लें । आप लोगों को यह समझ लेना चाहिए अब विश्व बैंक से किसी भी ़ऋण की शर्तों में जनसंख्या वृद्धि की रोक एक मेन इश्यू होगा । मैं चाहता हूं कि मन्त्री जी के आने से पहले आप लोग इस विषय में अपने अपने विचार रखें, जिससे उनके सामने कुछ ठोस बातों को रखा जा सके । साथ ही पे्रस के लिए भी कुछ ठीक ठाक मैटर मिल जाएगा । हां, तो आप कुछ कहेंगे मिस्टर जोशी ?‘‘

       जोशी जी स्वास्थ्य विभाग में अतिरिक्त सचिव हैं । ‘‘मैं कैसे कहूं ? पहले शर्मा जी  को  बोलना चाहिए ।‘‘ जोशी जी ने अपनी बला शर्मा जी की ओर टाली । शर्मा जी संयुक्त सचिव हैं, इसलिए बोलने की वरीयता में पहले उनकी जि़म्मेदारी बनती है ।

       ‘‘ सर, गुप्ता जी यहां बैठे हैं, इसलिए हमें पहले उनके विचार जानने चाहिए । ‘‘ - शर्मा जी ने तुरन्त कहा और गेन्द उप सचिव, गुप्ता जी की ओर उछाल दी ।

       गुप्ता जी इसके लिए पहले से ही तैयार थे । उन्होंने बड़े सधे शब्दों में कहा - ‘‘ सर मेरे विचार से हमें स्वास्थ्य निदेशालय के अधिकारियों और सी0 एम0 ओ0 के विचार पहले जानने चाहिए क्यों कि जनता से सीधा संपर्क उन्हीं लोगों का होता है । ‘‘

       ‘‘ यह आपने ठीक कहा । डा0 परोड़ा और डा0 सेंगर आप ही लोग शुरु करें । ‘‘ - श्री दिनकर ने स्वास्थ्य निदेशक और सी0 एम0 ओ0 की ओर देखते हुए कहा ।‘‘

       डा0 परोड़ा और डा0 सेंगर ने आपस में एक दूसरे की ओर देखा और सम्मवेत स्वर में बोले - ‘‘सर, जनता की बढ़ोत्तरी के अनुपात को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगर अल्पसंख्यक वर्ग का अधिकारी जनता से बात करता है उसका ज्यादा प्रभाव पड़ेगा । इसलिए हम लोगों का यह मानना है कि अगर किन्हीं कारणों से मन्त्री स्तर पर यह संभव न हो तो कम से कम अधिकारी स्तर पर अगर सरकार ऐसा प्रबन्ध करे तो कुछ फ़ायदा होने की सम्भावना ज़्यादा है । ‘‘

       इन लोगों का वाक्य पूरा होते ही कक्ष के एक कोने से तालियों की आवाज़ आयी तो सभी की गरदनें उधर घूम गयीं । कोने में खड़े अर्दली राम खिलावन और सत्तार मियां बोल पड़े -   ‘‘ बस करो साहब लोग, आप लोग कुछ न कर पाओगे । आप तो बस बच्चा टैक्स लगाने के बारे में सोचो । ‘‘

       ‘‘ बच्चा टैक्स ? यह क्या बकवास है ? तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो ? ‘‘ - डा0 परोड़ा फटकारते हुए तेज़ स्वर में बोले । सत्तार मियां की तो घिघ्घी बंध गयी, पर राम खिलावन हाथ नचाकर बोला - ‘‘ इसमें क्या है ? जिसके जितने बच्चे उस पर उत्ता टैक्स । ससुरी जनता टैक्स बचाने के लिए बच्चे पैदा करना बन्द कर देगी और सरकार की परेशानी खतम । ‘‘

       ‘‘ तुम दोनों बाहर जाओ ‘‘ - डा0 परोड़ा ने दोनों को डांट कर कक्ष से बाहर निकाल दिया ।

       दोनों के बाहर जाने के बाद सभी आला अधिकारियों की निगाहें आपस में टकरायीं और सभी ने सहमति के अन्दाज़ में गरदनें हिलायीं और मन ही मन कहा -‘‘ यह हुई न कोई बात । ‘‘

       इस बैठक के बाद इस प्रकार के संकेत मिल रहे हैं कि संभवतः सदन के अगले सत्र में स्वास्थ्य मन्त्री - ‘‘ बाल कर अधिनियम ‘‘ पेश करेंगे । अतः जनता को टैक्स बचाने के लिए पहले से ही सावधान रहना चाहिए ।

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(भारतीय खाद्य निगम की स्मारिका में पूर्व प्रकाशित)

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