सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

संजय वर्मा "दृष्टि" की कविताएँ - बेटियाँ बचाओ

बेटियाँ
बाबुल से आती चिट्ठी
खुश होती रोती भी
बाबुल की यादों को बाटती
सुनाती सखी सहेलियों में ।
चिट्ठियों को संभाल कर रखती जाती
बाबुल की जब आती याद
तो पढ़ कर
संतोष कर लेती ।
डाकिया और चिट्ठी का होता था
हर पल इंतजार
वो भी एक जमाना था ।
अब ये भी एक जमाना है
जिनकी बेटियाँ है
बस उनके ही
बाबुल से आता है
फोन /मोबाईल पर लिखा
सन्देश ।
बाबुल भी क्या करे ?
बेटियां भ्रूण हत्याओं से हो गई
दुनिया में कम
इसलिए डाकिया /चिट्ठी और बाबुल
हो गए है अब गुमसुम ।
भ्रूण हत्याओं को
रोकना होगा ताकि बेटियां
डाकिया /चिट्ठी और बाबुल की
यादों को पा सके
और पा सके
हर बाबुल अपनी बिटियाँ का प्यार ।


=बिटियाँ बिना ..=

स्कूल की जब होती छुट्टी
ऐसा लगता मानों बगीचे में उड़ रही हो
रंग -बिरंगी तितलियां ।
तुतलाहट भरी मीठी बोली से
पुकारती अपने पापा को
पापा ...
इतनी सारी नन्ही रंग -बिरंगी तितलियों में
ढूंढने लग जाती पिता की आंखें ।
मिलने पर उठा लेते मुझको वे गोद में
तब ऐसा महसूस होता है
मानो दुनिया जीत ली हो
इस तरह रोज जीत लेते है मेरे पापा दुनिया ।
मेरी हर जिद को पूरी करते है पापा
मैं जिद्दी भी इतनी नहीं हूँ
किन्तु जब मैं रोती हूँ तो
पापा की आंखें रोती हैं ।
सच कहूँ ,यदि मैं नहीं होती तो
मेरे पापा क्या जी पाते मेरे बिना
सोचती हूँ बेटियाँ नहीं होती तो
उनके पापा कैसे जीते होंगे ?
बेटी के बिना ।

=बिटियाएँ ओझल  =
एक तारा टूटा
आसमां से
धरती पर आते ही
हो गया ओझल
ये वैसा ही लगा
जैसे गर्भ से
संसार में आने के पहले
हो जाती है
बिटियाँ ओझल ।
तारा स्वत:टूटता
इसमें किसी का दोष नहीं
मगर गर्भ में ही
कन्या भ्रूण तोड़ने पर
इन्सान होता ही है दोषी ।
भ्रूण हत्या होगी जब बंद
तो बिटियाएँ भी धरती पर से
हमें निहार पायेगी
चाँद -तारों सा नाम पाकर
संग जग को भी रोशन कर पायेगी ।
ये बात बाद में
समझ में आई
टूटा तारा
लाया था एक संदेशा -
भ्रूण हत्या रोकने का
उससे नहीं देखी गई
ऊपर से ये क्रूरता ।
वो अपने साथी तारों को भी
ये कह कर आया-
तुम भी एक -एक करके
मेरी तरह
भ्रूण हत्या रोकने का
संदेशा लेते आओ ।
कब तक नहीं रोकेंगे
क्रूर इन्सान भ्रूण हत्याएं
संदेशा पहुँचे या न पहुँचे
पर रोकने हेतु ये हमारा
आत्मदाह है
हमारा बलिदान है
देखना है हमें ये कब काम आयेगा ।

=सुनो बात हमारी=
भ्रूण हत्या करने वालों
सुनो जरा बात हमारी
देखो ऊपर नर्क है
होगी वही गति तुम्हारी ।
लालच करके स्नेह को
खो चुके हो तुम
लड़के के लिए लड़की
मांगने पर तब लगोगे भिखारी ।
पीढ़ियों की सीढियों को
लालच में यूँ न उखाड़ो
निर्दोष माएं भ्रूण हत्या से
हो जाएगी दुखियारी ।
याद रखना जरा
बेटियों को मारने वालों
देख रहे है तुम्हें
सजा देने के लिए उपर वाले ।
नर्क में मिलेगी जगह
जो है ये कृत्य करने वालों
होश में आकर संभल जाओ
बेटे की लालच में बहकने वालों ।
बहना न होगी तो
बहती रहेगी आँखें तुम्हारी
हाथ करेंगे अफ़सोस
कहेंगे सुनो वेदना हमारी ।
ये सही है बेटियां भी
वंश को चलाती
जिन्दगी में ये ही तो है
जो खुशियों झोलियां में भर जाती ।
भ्रूण हत्या पर रोक लगे
ये ही है गुहार अब हमारी
खिलखिलाती रहे बिटियाएं
ये ही अरज है अब हमारी ।

=बेटी बचाओ  =
बिदाई में भीगती है आँखें
बेटी हुई तब ख़ुशी से झरते आँसू
साँझ के पंछी की तरह लोट आते है आंसू
जब भ्रूण-हत्या हो तब फिर से गिरते आंसू ।
माँ किस -किस से करे गुहार
पीडायें मन की उभर के आई
मुस्कराहट भी डरने लगी क्रूर लोगों से
कब लगेगा अंकुश ये माँ सोचती आई ।
बिटियाँ आ सकेगी दुनिया में
बिछाए रखे थे माँ ने पलक -पाँवड़े ये सोच कर
रो -रो कर बताती रही आँखें दुनिया को
क्या दुनिया में बेटियों का जनना है दुष्कर।
अगर ऐसा ही है तो बेटियों के बिना
इन्सान दुनिया में महज पत्थर बन रह जायेगा
कोई नहीं होगा रिश्तों की दुनिया में
आँखों में बिन नमी के इन्सान किस से नेह पायेगा ।
अंगना सूने किस को ये पीर बताएँगे
गवाह होंगे बस आँखों के आंसू
माँ ओ की सुनी गोद बताएँगे
लेंगे संकल्प तब ही बेटियों को बचा पाएंगे ।

बेटी दोहरा रही है
=========================
माँ
अपनी आँखों से
काजल उतार कर
मेरे माथे पर
टिका लगाती|
मेरे होंठों पर लगे दूध को
अपने आँचल से पोंछती
होठों से प्यार की चुम्बन
देती माथे पर
शुभ आशीष की तरह |
फिर भी माँ के मन मे
नजर ना लग जाए कहीं
भय समय रहता |
भले ही माँ भूखी हो
मुझे आई तृप्ति की डकार से
माँ संतुष्ट हो जाती |
आईने में
संवारने लगी हूँ खुद को
क्योंकि मैं बड़ी जो हो गई |
पिया के घर
माँ की दी हुई पेटी
जब खोलकर देखती हूँ
उसमे रखे मेरे बचपन के अरमान
जिसे संजो के रखे थे मैंने गुड्डे -गुडिया
कनेर के पांचे और खाना बनाने के खिलौने |
इन्हें पाकर मन संतुष्ट
लेकिन आँखें नम
आज माँ नहीं है
इस दुनिया में |
अपनी बेटी के लिए
आज वही दोहरा रही हूँ
जो सीखा -संभाला था
अपनी माँ से मैंने कभी |

_दायित्व _

बकरी चराने गई बिटिया को
जरा सी देरी हो जाने पर
पढ़ने जाने की फिक्र को लिए
माँ पुकार रही बिटियाँ को ।
आवाज पहाड़ों से टकराकर
गुंजायमान हो रही
नदी भी ऐसे लग रही
मानो वो भी बिटियाँ को
ढूंढ़ने में  बहते हुए
अपना दायित्व निभा रही हो ।
शिक्षा से ही बिटियाँ ने पा लिया
एक दिन बड़ा ओहदा
माँ की याद आने पर
आज बिटियाँ ने पहाड़ों पर से
पुकारा  जब अपनी माँ को ।
तब पहाड़ हो चुके  थे मौन
नदी भी हो चुकी थी सूखी
बकरियां भी हो गई गुम ।
सूना लगने लगा घर ।
क्योंकि इस दुनिया में नहीं है माँ
बिटियाँ को शिक्षा का दायित्व
देते हुए देखा था
इसलिए ये सभी मौन होकर
दे रहे है माँ को श्रन्दांजलि ।

बेटी बचाओ
हंसने रोने के भाव को जग ने सीखा बेटियों से
घर को कैसे सजाया जाता सीखा बेटियों से
रंगोलियो के रंग कैसे सजाने सीखा बेटियों से
मिश्री से मीठे बोल कैसे बोलना सीखा बेटियों से
रिश्तों की परिभाषा को समाजों ने सीखा बेटियों से
पवित्र धागों के बंधन के महत्व को सीखा बेटियों से
हौसला धारण कर लक्ष्य को पाना सीखा बेटियों से
देश-विदेश में नाम कैसे रोशन करना सीखा बेटियों से
संस्कृति की पहचान कैसे करना सीखा बेटियों से
बड़ों का सम्मान कैसे करना सीखा बेटियों से
जब सब कुछ  हमने सीखा है लाडली बेटियों से
तो "बेटी बचाना" होगा तभी कुछ सीख पायेंगे बेटियों से ।

भ्रूण हत्या रोकें

****************

होता था बिटिया से

घर आँगन उजियारा

मौत पंख लगा के आई

कर गई सब जग अंधियारा

         *

मन ही मन बातें करते

मन ढाढस बंधाता है

ढूंढें कहाँ यादें उसकी

कोई नहीं याद दिलाता है

          *

लोग लिंग अनुपात

बिगाड़ने में लगे हैं

लड़की ढूंढने में वो

दुनिया के चक्कर लगाने लगे हैं

          *

क्रूर इन्सान भ्रूण हत्या

करने जब लगा है

रोकने हेतु  कानून भी

अब कुछ सोचने लगा है

         *

बेटियों के न होने की बातें

क्यों नहीं समझ पाते है

इसलिए तो भाइयों को

हम हर घर में उदास पाते हैं

         *

हक बेटी का भी होता है

क्यों करते है भ्रूण हत्याएं

रोकेंगे मिलकर जब इसे

तभी रोशन होगी रिश्तों की बगियाएं

 

******अनुशासन*******

कोहरे मे लिपटे

वृक्ष /पहाड़ कितने हसीं लगते हैं

जैसे प्रकृति ने

चादर ओढ़ली हो

सुबह की ठण्ड से |

इन पर पड़ी ओंस की बूंदों से

खुल जाती है इनकी नींद

साथ ही सूरज के उदय होते

ऐसा लगता है मानों

घर का कोई बड़ा बुजुर्ग

अपने बच्चों को जैसे उठा रहा हो |

तब ऐसा महसूस होता है की

प्रकृति भी सिखाती है

सही तरीके से जीने के लिये

प्यार भरा अनुशासन |

 

=जुगनू =
जुगनू ढूंढता

रोशनियों के घरौंदों में

जगमगाते गांव -शहर के दीपों में

अपने रिश्ते|

जुगनू जो खुद ही

रोशनी नहीं जानता

कितनी है |

रोशनियों की भीड़ में

उसकी क़द्र कौन करेगा

भीड़ भरी दुनिया में

अलग पहचान कैसे बनायेगा |

शायद वह जान गया

रोशनियों की चकाचौंध में

उसकी बखत नहीं |

अंधेरों को चीरते

उड़ान की हिम्मत ने

अंधेरों में हजारों

लोगों की आंखों को

दिखा दिया अपनी

रोशनी का रूप और

नन्हे हौसलों ने दिखाया

अपना दम |

तभी आवाजें आई

वो रहा जुगनू |

.....

संजय वर्मा "दृष्टि "
125 ,शहीद भगत सिंग मार्ग
मनावर जिला - धार (म प्र )  

4 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनायें पढ़ते हुए दिल भर आया। मेरी बेटी इस समय स्कूल गयी है। आपने उसकी याद दिला दी।
    बहुत सुन्दर भाव!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. shri brajeshji namaskar, dhanaywad jinki beti hai vohi iska dard samjh sakta hai

      हटाएं
  2. betiyo par aapne jo anek rachnaye likhi hai bah kai drishya upsthit kari hai ,ab chithiyo ka chalan kaha raha

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. shri kamlesh kumar diwanji ,namaskar, dhanywad ye sahi hai ki chiththiyo ka chalan kam huva kintu patra lekhan se aksharo ki sundarta avm vicharo ki kalpana shakti bhi gum ho gai hai isliye "vyakaran" kya hota hai ye bhi ak din gum ho jayega.

      हटाएं

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