ज्योतिर्मयी पन्त की कविता - प्रिय मिलन

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प्रिय   - मिलन
सखि! मुंडेर  पर कागा बोला
शुभ  शगुन हुए हिय डोला


मृदंग थापें  ह्रदय बजाये
उच्छ्वास की सरगम तानें
हिय  विभोर जाने क्या  गाये
मन मयूर बिन बदरा नाचे
क्यों  इतना  अधीर, मन बोला 
सुबह मुंडेर पर कागा बोला ..


पैरों में पाखी सी थिरकन
नूपुर बज उठते हैं छन छन
उड़ना चाहे मेरा तन मन
नव अंकुर से रोमांचित  तन
हिय झूले ज्यों  आज हिंडोला
सखि! मुंडेर पर कागा बोला ....


बीतें अब शीत बिरह के दिन
ऊष्मा स्नेह छलके मधुरिम
छंट गए  धुंध संशय के दिन
कर फैला  आयेगा हर दिन
पाने दर्शन दृग-मन पट खोला
सखि !मुंडेर पर कागा बोला .......

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