मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

ज्योतिर्मयी पन्त की कविता - प्रिय मिलन

प्रिय   - मिलन
सखि! मुंडेर  पर कागा बोला
शुभ  शगुन हुए हिय डोला


मृदंग थापें  ह्रदय बजाये
उच्छ्वास की सरगम तानें
हिय  विभोर जाने क्या  गाये
मन मयूर बिन बदरा नाचे
क्यों  इतना  अधीर, मन बोला 
सुबह मुंडेर पर कागा बोला ..


पैरों में पाखी सी थिरकन
नूपुर बज उठते हैं छन छन
उड़ना चाहे मेरा तन मन
नव अंकुर से रोमांचित  तन
हिय झूले ज्यों  आज हिंडोला
सखि! मुंडेर पर कागा बोला ....


बीतें अब शीत बिरह के दिन
ऊष्मा स्नेह छलके मधुरिम
छंट गए  धुंध संशय के दिन
कर फैला  आयेगा हर दिन
पाने दर्शन दृग-मन पट खोला
सखि !मुंडेर पर कागा बोला .......

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------