शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - सपने में सपना


सपने में सपना

मंगल ने कहीं एक महात्मा जी को ‘सपने में सपना कोई नहीं अपना’ कहते हुए सुना था। लेकिन इसका मतलब नहीं समझ सकने के कारण वह परेशान था। इसलिए एक दिन वह मेरे पास आया और इसका मतलब पूछा। वह नवयुवक था। इसलिए बाबा जी के इस कथन को लेकर उसे बहुत बड़ा भ्रम था। मैंने उससे कहा हर बात के कमसे कम दो अर्थ जरूर होते हैं। क्योंकि इस संसार की सृष्टि के समय ही अच्छाई के साथ बुराई भी उत्पन्न हुई है। मानव जीवन की यही सबसे बड़ी परीक्षा है कि वह बुराई को छोड़कर अच्छाई को अपने जीवन में उतारे। जो बुराई को जीत ले वही सच्चे अर्थों में मनुष्य है। संत है।

   हमने आगे कहा अच्छा व्यक्ति यानी संत हमेशा अच्छा अर्थ ही ग्रहण करता है। जबकि बुरा व्यक्ति हमेशा बुरा अर्थ ही ग्रहण करता है। सपने में सपना का एक अर्थ कोई ऐसा भी मान सकता है कि सपने में कोई सपना नाम की लड़की आई थी। जिसके सिवा कोई दूसरा अपना प्रतीत नहीं होता। केवल सपना ही अपना है।

   वहीं दूसरी ओर एक संत हृदय इसे सुनकर भाव विभोर हो जाएगा। क्योंकि यह एक बहुत बड़ी सच्चाई बयां करता है। जिसे हर कोई नहीं समझ सकता। प्रत्येक प्राणी जिस दिन जन्मता है यानी इस संसार में आता है। उसी पल से उसकी स्वप्न रात्रि आरंभ हो जाती है। जीव यहाँ आकर सो जाता है। इस स्वप्न रात्रि में जीना यानी तरह-तरह के अनुभव  प्राप्त करना सपना देखने के समान ही होता है। पढ़ना-लिखना, नौकरी-चाकरी करना, शादी-व्याह,  लड़ाई-झगड़ा और दोस्ती-दुश्मनी आदि स्वप्न रात्रि के सपने हैं। लोग तरह तरह के सपने देखते हुए एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। यही दिन इस स्वप्न रात्रि का अंतिम दिन होता है। शरीर को छोड़कर जीव जाग जाता है। जगते ही सपने के सारे झंझट समाप्त हो जाते हैं।


 इस प्रकार से एक संसारी व्यक्ति इस संसार रुपी स्वप्न रात्रि में यानी सपने में सपना देखता है और जो इस सपने में तरह-तरह के सम्बंधी मिलते हैं उनमें से कोई भी अपना नहीं होता। जीव सपने के पहले जैसे अकेला था वैसा ही अकेला चला जाता है।
 मंगल ने जाते-जाते कहा संतो को समझना आसान नहीं होता है। वह अब ‘सपने में सपना कोई नहीं अपना’ का गूढ़ रहस्य समझ रहा था।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
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