रविवार, 10 फ़रवरी 2013

कविता "किरण" की दो कविताएँ - उस दिन के लिए तैयार रहना तुम...

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दो कवितायेँ -द्वारा डॉ- कविता"किरण"

(1)-उस दिन के लिए तैयार रहना तुम,,,,तुम पूरी कोशिश करते हो मेरे दिल को दुखाने की

मुझे सताने की,

रुलाने की,

और इसमें पूरी तरह कामयाब भी होते हो

सुनो!

मेरे आंसू तुम्हे

बहुत सुकून देते हैं ना!

तो लो

आज जी भर के सता लो मुझे

देखना चाहते हो ना मेरी सहनशक्ति की सीमा

तो लो

आज जी भर के

आजमा लो मेरे सब्र को

पर हाँ!

फिर उस दिन के लिए तैयार रहना

की जिस दिन मेरे सब्र का बाँध टूटेगा

और बहा ले जायेगा तुम्हे

तुम्हारे अहंकार सहित इतनी दूर तक

की जहाँ तुम

शेष नहीं बचोगे मुझे सताने के लिए

मेरा दिल दुखाने के लिए

मुझे आजमाने के लिए

पड़े होंगे पछतावे और शर्मिंदगी की रेत पर

अपने झूठे दम्भ्साहित अकेले

उस दिन के लिए तैयार रहना

तुम!------डॉ कविता"किरण"

(2) व्यर्थ नहीं हूँ मैं

व्यर्थ नहीं हूँ मैं!

जो तुम सिद्ध करने में लगे हो

बल्कि मेरे ही कारण हो तुम अर्थवान

अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।

मैं स्त्री हूँ!

सहती हूँ

तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरूष होने पर

मैं झुकती हूँ!

तभी तो ऊँचा उठ पाता है

तुम्हारे अंहकार का आकाश।

मैं सिसकती हूँ!

तभी तुम कर पाते हो खुलकर अट्टहास

हूँ व्यवस्थित मैं

इसलिए तुम रहते हो अस्त व्यस्त।

मैं मर्यादित हूँ

इसीलिए तुम लाँघ जाते हो सारी सीमायें।

स्त्री हूँ मैं!

हो सकती हूँ पुरूष...

पर नहीं होती

रहती हूँ स्त्री इसलिए...

ताकि जीवित रहे तुम्हारा पुरूष

मेरी नम्रता, से ही पलता है तुम्हारा पौरुष

मैं समर्पित हूँ!

इसीलिए हूँ उपेक्षित, तिरस्कृत।

त्यागती हूँ अपना स्वाभिमान

ताकि आहत न हो तुम्हारा अभिमान

जीती हूँ असुरक्षा में

ताकि सुरक्षित रह सके

तुम्हारा दंभ।

सुनो!

व्यर्थ नहीं हूँ मैं!

जो तुम सिद्ध करने में लगे हो

बल्कि मेरे ही कारण हो तुम अर्थवान

अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम--- डॉ कविता"किरण",

--
Dr.kavita"kiran"(poetess)
        Nehru Colony
FALNA-306116 Distt-Pali (Raj)
http://kavitakiran.blogspot.com/

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