मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

संजय वर्मा "दृष्टि" की हास्य-व्यंग्य कविता - मोबाईल

मोबाईल
जिन्दगी अब तो हमारी मोबाईल हो गई
भागदौड़ में तनिक सुस्ता लूं सोचता हूँ मगर
रिंगटोनों से अब तो रातें भी हैरान हो गई।


बढ़ती महंगाई में बैलेंस देखना आदत हो गई
रिसीव काल हो तो सब ठीक है मगर

डायल हो तो दिल से जुबां की बातें बीमार हो गई।

मिस्काल मारने की कला तो जैसे चलन हो गई
पकड़म -पाटी खेल कहे शब्दों का इसे हम मगर
लगने लगा जैसे शब्दों की प्रीत पराई हो गई।


पहले -आप पहले -आप की अदा लखनवी हो गई
यदि पहले उसने उठा लिया तो ठीक मगर
मेरे पहले उठाने पर माथे की लकीरें चार हो गई।

मिस्काल से झूठ बोलना तो जैसे आदत सी हो गई

बढती महंगाई का दोष अब किसे दें मगर

हमारी आवाजें भी अब तो महंगाई में उधार हो गई।


दिए जाने वाले कोरे आश्वासनों की जैसे भरमार हो गई
अब रहा भी तो नहीं जाता है मोबाईल के बिना मगर 
समस्याओं की गुहार करने की तो जैसे हमारी आदत हो गई।


मोबाईल ग़ुम हो जाने से लगता जिन्दगी चकरा सी गई
हरेक अपनों का पता अब किस -किस से पूछें मगर
बिना नम्बरों के तो जैसे जिन्दगी वीरान हो गई।

*संजय वर्मा "दृष्टि"
१२५ शहीद भगत सिंग मार्ग
मनावर (धार )
454446   

2 blogger-facebook:

  1. डॉ दिव्या वर्मा10:13 am

    कुछ ख़ास नहीं , कविता लेखन का प्रयास मात्र है |

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. dr. divyaji verma ,namaskar dhanywad pratas se shayad kabhi to safalta milegi

      हटाएं

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