मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

पुस्तक समीक्षा तो अंग्रेज क्या बुरे थे

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पुस्तक समीक्षा तो अंग्रेज क्या बुरे थे -

लेखक श्री रविन्द्र बडगैयाँ

समीक्षक - गोवर्धन यादव

इन ढाई-तीन दशकों में कितना बदल गया है आज का आदमी?. उसकी मनोष्योचित सादगी, निश्चलता, शालीनता, विनम्रता आदि गुणों का तेजी से क्षरण हुआ है. टुच्चागिरी, कमीनगी जैसे उसके आचरण के अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं. व्यक्तिगत लाभ-लोभ ने उसे लगभग अंधा ही बना दिया है. अब वह वही सोचना-देखना और सुनना पसंद करता है,जिसमें उसका अपना निजी स्वार्थ छिपा होता है. दया-ममता—करुणा जैसे अर्थवान और मूल्यवान शब्द, अब उसके लिए कोई माने नहीं रखते. अनीति से पैसे कमाने की अंधी दौड़ में, उसके परिवार में दरार पड़ने लगी है..ययाति अब अपने बेटॊं के आगे गिडगिडाकर यौवन नहीं मांगता. उसने वियाग्रा जैसी औषधि की खोज कर ली है. काम-पिपासा इस हद तक बढ़ गई है कि बाप, जवान बेटियों के शयन-कक्ष में जाने से, न तो उसकी रुह कांपती है और न ही पैर.

रही सही कसर बाजारवाद-तंत्र ने पूरी कर दी है. गली-कूचॊं में बार संस्कृति कुकरमुत्ते की तरह ऊग आयी हैं. बारगर्ल बिंदास नाच रहीं है. नाचना और पैसे बनाना, उनकी अपनी मजबूरी हो सकती है.,. पिछले दिनों, कुछ ऎसी नृशंस और घिनौनी घटनाएं घटी है,जिसने भीतर के विश्वास की नींव हिलाकर रख दी है. मानवता शर्मसार हो गय़ी है. दुर्भाग्यवश, इन सबकी जिम्मेदार वही पीढी है, जो नयी पीढी पर अश्लीलता,मूल्यहीनता तथा अकर्मण्यता का आरोप मढती रही है. दुर्भाग्यवश अब बच्चों को घेरा जा रहा है. एक ऎसी पीढी को,जो हमारा-सबका वर्तमान तो है ही,साथ ही हमारा-आपका,सबका भविष्य भी है. एक कोंपल जो नाजुक है-सुन्दर है-रक्षणीय है तथा शारीरिक-रुप से लडने में असमर्थ भी है,इनका बर्बाद होना माने पूरे ढाँचें का बर्बाद होना है. संकट के इस भयावह दौर में,युवा व्यंग्यकार श्री रविन्द्र बडगैयाँ का पदार्पण, किसी धूमकेतु की तरह होता है, जिसने अपनी उपस्थिति मात्र से खलबली मचा दी है. उसकी कलम आग उगलती है, उन सबके खिलाफ़, जो समाज के संकटमोचन बनने के बजाय, भस्मासुर बने बैठे हैं. उन तमाम लोगों के प्रति उनका गुस्सा भडकना स्वाभाविक भी है,जो अन्दर कोयले से भी ज्यादा काले है, वे केवल काले ही नहीं है वरन उनके सारे कारनामें भी काले है, पर दिखने में वे हंस के मानिंद सफ़ेदझक दिखलाई पडते हैं. उनका सृजनकर्म उन सबके खिलाफ़ है,जिनकी जिम्मेदारी थी इस देश को सजाने-संवारने की. जनता ने अपना विश्वास-मत देकर या कहें आँख बंदकर इस देश की बगडॊर उन्हें सौंप दी थी कि वे योगी कृष्ण की तरह, इस देश के रथ को उन्नति के उस मुकाम तक लेकर जाएंगे, जहां समानता का बोध होगा, कोई न तो ऊँच होगा और न ही नीच. उन तमाम हाथॊं को काम मिलेगा,जो बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं, उनसब को अपने सर ढंकने के लिए मकान मिलेंगे, जिनकी जिन्दगी झोपडपट्टी के नीचे कट रही है,उन सबको पेट भर रोटी मिलेगी जो भूख से बिलबिला रहे हैं.

साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता हेराल्ड पिंटर ने अपने भाषण में इस संकट की ऒर इशारा करते हुए कहा था कि-“ राजनीतिज्ञों की रुचि, उपलब्ध प्रमाणॊं के अनुसार, सत्य में नहीं होती,बल्कि सत्ता में और उस सत्त्ता को बरकरार रखने में होती है. उस सत्ता को बनाए रखने के लिए जरुरी है कि लोग अज्ञान में पडॆ रहें. वे अज्ञान मे ही जिएं,यहाँ तक कि वे अपने जीवन के सच्चाई तक के.”

नागार्जुन ने अपनी कविता में कुछ इस तरह का संकेत दिया था. “एक-एक पग बिधा हुआ है दिशा-शूल से डर लगता है बलिवेदी के लाल फ़ूल से क्रियाहीन चिंतन का कैसा चमत्कार है दस प्रतिशत आलोक और बस अंधकार है.” प्रख्यात कवि रामनाथ सिंह उर्फ़ अदम गोंडवी ने वर्तमान हालात पर चोट करते हुए लिखा था

काजू भुने प्लेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में (२)आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

युवा व्यंग्यकार श्री रविन्द्र बडगैयाँ ने उन तमाम कवियों/गजलकारों के समानान्तर,चलते हुए अपने संग्रह ”तो अंग्रेज क्या बुरे थे” में, प्रायः उन्हीं बिंदुओं को छूने का प्रयास करते हुए, अपनी ओजस्वी लेखनी से करारी चोट की है. संग्रह में कुल पच्चीस रचनाएं संग्रहित है, जिनके अपने तेवर हैं, अपने रंग है. उन्होंने पुरजोर तरीके से प्रश्न उठाते हुए अपनी पीडा को स्वर दिए है और भाषा का जामा पहनाया है.

व्यंगकार का रचना संसार, न तो जटिल है और न ही बोझिल. सीदे-सादे शब्दों के माध्यम से उन्होंने अपने लेखनी को व्यंग्य को पैनी धार दी है.

वास्तव में व्यंग्य का मूल और प्राथमिक स्वर प्रतिष्ठान विरोधी होता है. यह निर्विवाद सत्य है कि एक तानाशाह, किस तरह सत्ता के शिखर पर बैठकर, निर्दोष लोगों का जीना दूभर कर देता है, उसी तरह इन सफ़ेदपोशों ने, आज जनता कॊ मुहाली-बदहाली की उस गुफ़ा में ला पटका है,जहाँ से निकलने का कोई मार्ग नजर नहीं आता. ऎसा भी नहीं है कि जनता का स्वर मुखर नहीं होता. होता है लेकिन ये लफ़डॆबाज कोई ऎसी चाल चलने में कामयाब हो जाते हैं कि आवाज कहीं दुबककर बैठ जाती है.. आज का सच तो यह भी है कि बाजारवाद ने किस तरह आदमी का वस्तुकरण कर दिया है. धनी लोग चीजों की तरह चमकदार होते जा रहे हैं,जबकि गरीबों को सम्मान, चीजों जितना भी नहीं रह गया है. एक विचित्र किंतु सच बात तो यह है कि इस लूटमार के समर में कोई किसी का सगा नहीं है. युद्ध तो लडॆ जा रहे हैं, लेकिन जनकल्याण की भावना और भलाई के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह गया है. अपना हित साधने के चक्कर में, मुश्किलात इतनी बढ गई है कि शोषित-पीढित जन की फ़रयाद सुनने के लिए, समय न तो जनप्रतिनिधियों के पास है, न विधायक के पास है और न ही मंत्रियों के पास.

व्यंग्यकार रविन्द्रजी ने अपनी बेबाक लेखनी से समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार-मिथ्याचारिता और पाखण्डॊं को उजागर करते हुए यह मंगलकामना की है कि इसका असर इतना व्यापक हो कि समाज में अमन-चैन कायम किया जा सके. फ़िर एक व्यंग्यकार का अपना दायित्व भी होता है कि वह उन सब पर चोट करे,जिन्हें वह गलत अथवा बुरा समझता है. कांतिकुमार जैन ने इस ओर इशारा करते हुए लिखा है-“ एक गंभीर मानवीय-करुणा इन व्यंग्यकारों को उन सबको हिलाने-गिराने और तोडने के लिए बाध्य करती है,जो हमें सांस्कृतिक रुप से खण्डहर का निवासी बनाए हुए है. एक विशाल मलवे के मालिक के रुप में. हम बहुत जी लिए, अब हमें खुली हवा चाहिए”

व्यंग्यकार अपने व्यंग्य द्वारा, जीवन के सीलन भरे बदबूदार कमरे में, खुली हवा का एक झोंका भरने का उद्देश्य लेकर चलता है. यदि वह भ्रष्ट, अनैतिक,मिथ्याचारी और पाखण्डॊं को न भी बदल पाए तो तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है, वह तो केवल इन लोगों को नैतिक समर्थन देता है जो ईमानदार, नैतिक और रुढिविरोधी हैं.” श्री रविन्द्र के रचना-संसार में प्रवेश करते यह स्पष्ट महसूस होता है कि उन्होंने उन सब की बखिया उखेडी है, जो समाज के लिए अमंगलकारी है. यह भी सिद्दत के साथ महसूस होता है कि वह उर्जा,जो उन्होंने प्राप्त की है वह जीवन और समाज के मुठभेड से अर्जित की हुई अंतर्वस्तु है, और वह उन्हें सस्ती भावुकता से बचने की भी पहल करती है.. एक सजग व्यंग्यकार यह भी अच्छे से जानता है कि विसंगतियों को दूर करने के लिए व्यंग्य से बडा कोई कारगर हथियार हो ही नहीं सकता.

श्री बडगैयाजी ने अपने संग्रह का नाम पं.राजेन्द्र राही के सुझाव पर रखा है, ऎसा उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा भी है. व्यक्ति जब अपने बच्चे का नामकरण संस्कार करने जा रहा होता है, तो वह किसी पंडित की शरण में जाता है. मुझे ऎसा लगता है कि इस संग्रह को यह नाम न दिया गया होता,तो शायद उतना प्रभावशाली नहीं होता. हिन्दी के प्रति अटूट निष्ठावान होने और समर्पित होने के नाते मेरे मन में भी अपार पीडा है कि हम ऎसे देश में जीने के लिए अभिशप्त हैं,जिसके दो नाम है. पहला इंडिया और दूसरा भारत. इंडिया वह देश है जिसमें चमकदार लोग-रसूखवाले लोग-तथा धनिक लोगों का निवास है. और दूसरे में वे लोग हैं,जो दबे-कुचले हैं,निरक्षर है,जाहिल हैं,गवांर है,निर्धन है. अमीर लोगों की बोली अंग्रेजी है और निपट देहातियों की,काहिलों की भाषा हिन्दी अथवा ग्रामीण अंचल की कोई बोली. एक देश में दो देश, दो भाषा. ऎसा आपने न तो सुना होगा और न ही देखा होगा. एक ऎसा देश जिसका संविधान भी दो भाषाओं मे रचा गया है.(जिसका निर्माण पहले अंग्रेजी में,बाद में हिन्दी में लिखा गया.)विश्व का कोई ऎसा देश नहीं है,जिसे दो नामों से जाना जाता हो और जिसकी दो भाषाएं हों. विश्व के किसी देश को इस बात से फ़र्क पडता हो या न पडता हो,लेकिन भारत के रहने वालों को इससे बडा फ़र्क पडता है.,जबकि सत्तातंत्र आज भी नीमबेहोशी में जी रहा है. हमारे देश में अनेक बुद्धिजीवी, भाषाविद, समाजविद और राजनीतिज्ञ भाषाओं के नाम पर एकता की बात तो करते हैं,लेकिन भाषाओं को राष्ट्रीय विवाद का कारण भी मानते है. उन सभी से मेरा विनम्र प्रश्न है कि इंग्लैण्ड और आयरलैंड की भाषा अंग्रेजी है, ताईवान और चीन की भाषा मंदारिन है, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की भाषा कोरियन है, रुस और चेचन्या की भाषा रुसी है, पूर्व और पश्चिम जर्मन की भाषा जर्मन है.

फ़िर जितने युद्ध ,जितने संघर्ष, जितनी हिंसा इन एक भाषी देश में है, क्या हमारे देश में २३ संवैधानिक राष्ट्रभाषाओं और लगभग १३०० लोक भाषाओं के होते हुए,ऎसा संघर्ष या ऎसी हिंसा कभी हुई? यदि यह भाषाई विवेक हमारे जन के पास न होता तो क्या हिन्दी जो आज सत्तर करोड लोगों की भाषा है,वह जन-भाषा बन पाती? क्या हिन्दी भारतीय अस्मिता की प्रतीक नहीं है? हमारा स्वतंत्रता संघर्ष तो हिन्दी के ही माध्यम से हुआ था. हिन्दी हमारी आजादी की भाषा बनी. राममोहन राय, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, दयानन्द सरस्वती,केशवचन्द्र सेन, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू, विनोबा भावे, संस्कृतविद भंडारकर,श्री अरविन्द आदि अनेक महान व्यक्तित्व ऎसे हैं जिन्होंने अहिन्दी भाषा होने के बावजूद, भारतीय स्वतंत्रता की लडाई हिन्दी के माध्यम से लडी. कौमी तराने और मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती, वंदे मातरम और समस्त राष्ट्रीय गीत हिन्दी में गाए.. देश की आजादी का इतिहास ही यदि हिन्दी की अस्मिता का इतिहास रहा है,तो आज हम भारतीय अस्मिता की प्रतीक हिन्दी को क्यों नहीं मानते?क्या हम भूल गए कि वायसराय से मिलने से पहले गांधी ने कहला भेजा था कि वे अंग्रेजी भूल चुके हैं?

द्विभाषा का फ़ार्मुला केवल यह कह कर थोपा गया कि पन्द्रह साल बाद हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा बना दी जाएगी. कितने ही पन्द्रह साल बीत गए, हिन्दी पिछडती चली गई और आज अंग्रेजी शीर्ष पर बनी बैठी है. आज न जाने कितने ही मसलों पर हडताले होती हैं, बहसें होती हैं लेकिन देश की भाषा हिन्दी हो, इस विषय को लेकर न तो जन आदोलन होते हैं और न ही इस बारे में सोचा तक जाता है. जिस देश की अपनी कोई भाषा न हो,उसे गूंगा ही कहा जाना श्रेयस्कर होगा. चुनाव के मौसम में नेता हमसे हिन्दी में वोट मांगते हैं और जब चुन कर जाते हैं तो फ़र्राटेदार अंग्रेजी बोलते है. उनका राजकाज केवल अंग्रेजी में ही चलता है. संसद में बहस अंग्रेजी में होती है. इन सब बातों के पीछे एक ‍षडयंत्र छिपा है. अंग्रेजी जानने वाले लोग कम हैं. इस तरह वे जनता को गुमराह करने के अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं. बांटॊ और राज करो के सिद्धांत पर चलते हुए काले चमडॆ वाले अंग्रेज, वे सारे हथकंडॆ अपनाए हुए हैं.जिसे कभी अंग्रेजों ने अपना रखा था. यहाँ यह समझना आवश्यक है कि स्वतंत्रता की असली लडाई, गोरी चमडी वालों के विरोध में नहीं थी, वरन उस भाषा के प्रति थी, जिसने लोगो के मनों में लंबी खाइयां खोद रखी थी और हमें आपस में लडाकर राज करने की नीति की पोषक थी. आज के हमारे देश के कर्णधार तो वही सब कुछ कर रहे हैं जो अंग्रेज किया करते थे. फ़र्क कहाँ आया? पहले गद्दी पर गोरी चमढी वाले काबिज थे, आज वहाँ काली चमढी वाले अंग्रेज शान से बैठे हैं. स्वभाविक रुप से यह प्रश्न उठता है कि यही सब चलते रहना आवश्यक था तो अंग्रेज क्या बुरे थे? मैं अपनी समिति की ओर से तथा अन्य साहित्यकारों की ओर से श्री रविन्द्र बडगैयाँ जी को धन्यवाद-साधुवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने अपने व्यंग्य-संग्रह के माध्यम से उन औजारों को धार दी है, जो समय की मार झेलते-झेलते तथा ‍षडयंत्र की वजह से बोथरे हो गए थे. मुझे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि इस संग्रह का पुरजोर स्वागत होगा और लोगों को सोचने-समझने और आगे का रास्ता तय करने में दिशाबोध भी देगा.

समीक्षक - गोवर्धन यादव

संपर्क- १०३,कावेरीनगर, छिन्दवाडा(म.प्र.)४८०००१ अध्यक्ष,म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,जिला इकाई छिन्दवाडा

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