बच्चन पाठक 'सलिल' की वासंती कविता - वासंती विहान

कविता 

वासंती विहान 

            -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल' 

आज धरा पुलकित है सचमुच 

       विहग गा रहे गान 

सौंदर्य-राशि को लिए उपस्थित 

       आया स्वर्ण विहान।

आम्र-वाटिका झूम रही है 

किरण धरा को चूम रही है 

वह अनंग निज पञ्च शरों से 

करता है संधान 

आया स्वर्ण विहान ।

कल कल करती नदियाँ बहतीं 

जन से हर्ष-कथा है कहती 

हो सब का कल्याण 

आया स्वर्ण विहान।

स्वागत  है ऋतुराज तुम्हारा 

दुष्ट शीत है तुझसे हारा 

शिवम् सुन्दरम के बस तू ही 

एक मात्र उपमान 

आया स्वर्ण विहान।

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पता-आदित्यपुर 

      जमशेदपुर 

फोन- 0657/2370892 

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