बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

चंद्रेश कुमार छतलानी, प्रेम मंगल, बृजेश नीरज, प्रदीप तिवारी की कविताएँ

चंद्रेश कुमार छतलानी की कविता -

सितारों से आगे (उस) का जहां

किस कदर मासूम है ये,

सितारों से आगे का जहां ।

ना दर्द है ना ग़म है,

आँसू हैं तो खुशी के हैं।

जहाँ कोई ऐसा नहीं जो,

ईद पे नमाज़ को क़ज़ा करे।

जहाँ होली पे हर इक चेहरा,

रंगों से सराबोर होता है।

जहां लोहड़ी घर घर में मनाते हैं,

तो मसीह को दिल में बैठा के

प्रार्थनाओं का दौर होता है।

जहाँ किसी एक के दर्द के लिए,

सबकी आँखों में आंसू होते हैं।

जहाँ एक के फाके होते हैं तो-

हर घर में रोज़े होते हैं।

जहां मज़हब है - मानव

जहां ईमान है – मानवीयता

और जहां

इंसान हैं - इंसान ।

यहाँ ज़मीन पे अकेला खड़ा

मैं यही सोच रहा हूँ।

सामने से एक बारात गुज़र रही है,

और लोग नाच रहे हैं।

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प्रेम मंगल की कविता

भ्रष्‍टाचार..नजरों का खेल

इधर उधर जहां कहीं

नजर पडे जहां भी कहीं

भ्रष्‍टाचारी यह भी भ्रष्‍टाचारी वह भी

दादागिरी है खूब सबकी चल रही।

कहां से पैसा,कहां से लूट

कहां से गहना,कहां से धूंस

कहां से नोट,कहां से वोट

कहां कहां से मारें षॉट

क्‍या कठिन है पैसा कमाना

क्‍या कठिन है धनवान बनना

कॉलर ऊँची सदा अपनी रखो

जुबां में रॉब अपना बनाये रखो

व्‍यापारी हो तो कम तुम तोलो

जितना हो सके मिलावट कर लो

जितनी चाहे उधारी कर लो

मांगे गर कोई तो हलाली कर दो

अकेला नहीं होता है भ्रष्‍टाचारी

संग रहती है सदा उसके दादागिरी

सीना ताने भौंहे ताने वह चलता है

गाली की बौछारों से सुप्रभात वह करता है

रातें अंधेरी उसकी कदापि नहीं होतीं

उजाले से चमकती दुनिया उसकी होती

संस्‍कार सदाचार का अर्थ नहीं उसे मालूम

डरता रहता उससे हर सीधा सादा मासूम

आंखें नम नहीं उसकी कभी होती

अश्कों की व्‍यथा महसूस न होती

मधुशाला में मदमस्‍त वह रहता

नहीं कभी किसी से वह डरता।

दूर भगाओ इस भ्रष्‍टाचार को

चहुं ओर फैलाओ सदाचार को

सार्थक बनाओ मनुष्‍य जन्‍म को

धन्‍य करो इस जगतीतल को

-

प्रेम मंगल

कार्यालय अघीक्षक

स्‍वामी विवेकानन्‍द इंजीनियरिंग कॉलेज

इन्‍दौर म़़़.प्र.

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बृजेश नीरज की 2 कविताएँ -

सफर

यूं ही दरो-दीवार में कैद ये उम्र गुजरी

खुली आबो-हवा में चलो सफर करते हैं

रात भर जगने से बोझल हो गयीं आंखें

लेकिन नींद और ख्वाबों की बात करते हैं

पेट की खातिर शरारों पर चलता आदमी

लोग उसके करतब की तारीफ करते हैं

जो उम्मीद थी वो अब खत्म होने लगी

जाने क्यूं फिर भी हम इंतजार करते हैं

जबानें सिल रखी हैं जिन्होंने जमाने से

खाली होते ही सियासत की बात करते हैं

दिन भर घूमते थे जो खुद खुदा बनकर

रात में दरगाहों पर वो सज़दा करते हैं

इन शिकवो-शिकायत से क्या हासिल

जो फासले हैं उनको कुछ कम करते हैं

जख्म हैं परों पर इरादे तो नहीं जख्मी

उड़ने की कुछ कोशिश चलिए करते हैं

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वक्त

रेत की मानिंद फिसलता चला गया

रोकना चाहा, वक्त गुजरता चला गया।

रंजिशें कम हों कोशिश बहुत की

एक शोला था दहकता चला गया।

अश्कों ने लिखीं दर्द की कहानियां

बच्चा था भूख में पलता चला गया।

मौसम की तरह बदलता है मिजाज

दोस्त था अदावत करता चला गया।

मसीहा आएगा लोगों को था ऐतबार

न आया इंतज़ार बढ़ता चला गया।

जब थी ज़मीं को बारिश की जरूरत

हवाओं का रूख बदलता चला गया।

इन रास्तों पर सांस लेना भी मुहाल

आदमी माहौल में ढलता चला गया।

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प्रदीप तिवारी की ग़ज़ल

ये मौसम जो दिन-ब-दिन सर्द होता है

ये मौसम जो दिन-ब-दिन सर्द होता है।

किसी की मौज होती है किसी को दर्द होता है।

मैं अब भी प्‍यासा था और वो उफनाने लगा,

समंदर और दरिया में यही तो फर्क होता है ।

ये जख्‍म-ए-मोहब्‍बत है अलग है इसका इलाज भी,

इस बीमारी में मलहम से बेहतर मर्ज होता है ।

सुना है सरहद पे था आया नहीं माँ को चिता देने

इक कर्ज से बढ़कर इक फर्ज होता है ।

अब अक्‍सर रोते मिलता है जो पहले कहता था

जिसको दर्द नहीं होता वही मर्द होता है।

दुआ और दाद देने मे भी कंजूसी इतनी

तुम्‍हारी जेब से जैसे कुछ खर्च होता है ।

सुनो कानून अब ये खुदकुशी पे पाबंदी क्‍यों

हमारे फायदे से भला, तुम्‍हें क्‍या हर्ज होता है ।

‘प्रदीप‘ ये नाजुक, नादान, मासूम सा इश्‍क

बड़ा बेईमान होता है, बड़ा बेदर्द होता है ।

 

नाम - प्रदीप तिवारी

जन्‍म - 10.08.1988

जन्‍म स्‍थान - दमोह (म.प्र.)

षिक्षा - बी.ई (सिविल), एम.टेक

भाषा - हिन्‍ही, उर्दू, अंग्रेजी, बुन्‍देलखण्‍डी

लेखन - गजल, कहानी, कविता (स्‍वतंत्र लेखन)

सम्‍पर्क - 9755621252

pradeept_2007@yahoo.co.in

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1 blogger-facebook:

  1. इस अंक में मुझे स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

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