शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

प्रीत अरोड़ा का आलेख - वो पहली मुलाकात ( संस्मरण )

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(प्रीत अरोड़ा, तेजेन्द्र शर्मा, दीप्ति शर्मा)

वो पहली मुलाकात ( संस्मरण )

जीवन में जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आते हैं जो किसी क्षेत्र विशेष में अपना अमूल्य योगदान देकर अपने देश ,भाषा ,सँस्कृति व सभ्यता की सेवा करने में तन – मन से समर्पित होता है तो उसके प्रति हमारे हृदय में अगाध श्रद्धा और प्रेम –भाव होता है .ऐसे व्यक्ति से रू – ब – रूह होने की उत्सुकता स्वाभाविक ही है .देश की महान् विभूतियों में साहित्य के क्षेत्र के अन्तर्गत श्री तेजेन्द्र शर्मा न केवल साहित्य जगत में एक प्रसिद्ध लेखक के रूप में जाना –पहचाना नाम है अपितु उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में भी सफल पहचान बनाई है और उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी ये है कि वे एक अच्छे व नेकदिल इन्सान भी हैं .

यूँ तो मैं अपने अध्ययन काल से ही तेजेन्द्र शर्मा जी की रचनाएँ अक्सर पढ़ा करती थी परन्तु उनसे इन्टरनेट के माध्यम से दो वर्ष पूर्व ही मेरा सम्पर्क हुआ .सौभाग्यवश मुझे तेजेन्द्र जी का साक्षात्कार लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ .साक्षात्कार में लिए गए प्रश्नों के द्वारा मैं उनके जीवन-दर्शन से और भी अधिक प्रभावित हुई .अब तो दिन –प्रतिदिन उनसे मिलने की लालसा मन के भीतर बढ़ती ही जा रही थी .तेजेन्द्र जी हमेशा मुझे ‘ बेटी ’ के रूप में प्यार ,अपनत्व और ढ़ेरों आशीर्वाद देते हुए “ बिट्टू ” नाम से सम्बोधित करते थे .ये “ बिट्टू ” शब्द जैसे मेरे मन की अतल गहराइयों को छू जाता और फिर मैं तेजेन्द्र जी को लेखन के क्षेत्र में अपना गुरू और मार्ग-दर्शक भी मानने लगी .मेरी ईमेल ,फेसबुक व फोन के जरिये अक्सर तेजेन्द्र जी से बातचीत होने लगी .साक्षात्कार लेने के उपरांत जल्दी ही मुझे उनकी कहानी ‘ अभिशप्त ’ की समीक्षा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .मेरे द्वारा लिया गया उनका साक्षात्कार और उनकी कहानी अभिशप्त की गई समीक्षा का ‘ बातेँ ’ व हिन्दी की वैश्विक कहानियाँ ( संदर्भ : तेजेन्द्र शर्मा का रचना संसार ) नामक पुस्तकों में प्रकाशित होना मेरे लिए किसी अमूल्य उपहार से कम न था .

हालही में ड़ी .ए .वी गर्ल्स कालेज ,यमुनानगर (हरियाणा ) में आयोजित ‘दूसरे अन्तरराष्ट्रीय प्रवासी साहित्य सम्मेलन ’ में मुझे तेजेन्द्र जी के भारत आने और इसमें शिरकत करने की खबर पता चली .इस खबर से मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा क्योंकि इस सेमिनार में मुझे भी पत्र – वाचन के लिए अजय नवरिया जी द्वारा आमंत्रण पत्र मिला.मैं अक्सर जिस व्यक्ति से मिलने के सपने बुना करती थी .उन सपनों को साकार होने में अब देरी न थी .इस सेमिनार में मैं अपने पिता जी के साथ गई .वहाँ मेरी मुलाकात विदेशों से आए अनेक साहित्यकारों से हुई परन्तु मेरी आँखें सिर्फ और सिर्फ तेजेन्द्र जी को ढ़ूँढ़ रही थी .अचानक मेरे कानों में वही चिर –परिचित तेजेन्द्र जी की मधुर आवाज़ सुनाई पड़ी .मैंने पलट कर देखा एक हँसता –खिलखिलाता ,तेजस्वी चेहरा भीड़ में सबसे अलग ही था .बड़े खुले दिल और गर्मजोशी से तेजेन्द्र जी ने हमारा स्वागत किया .तेजेन्द्र जी ने वहां उपस्थित अपने ही अक्स यानिकी अपनी बेटी दीप्ति और सुप्रसिद्ध लेखिका जाकिया जुबैरी जी से परिचय करवाया.दो दिन के इस कार्यक्रम में मैंने तेजेन्द्र जी को सबसे सहज भाव प्रेमपूर्वक बातचीत करते देखा .मैं चकित थी कि दुनिया में क्या ऐसे भी इन्सान हो सकते हैं जो बुलन्दियों पर पहुँचने पर भी अहं भाव नहीं रखते .देखने में तो लेखक भी दूसरे व्यक्तियों की तरह साधारण व्यक्ति होता है परन्तु उसका आन्तरिक व्यक्तित्व कुछ ऐसी विशेषताएं लिए होता है जो उसे आम जनमानस से अलग करती हैं .तभी तो उनकी मेहनत ,अथक प्रयास ,लगन व अदम्य साहस दूसरों के लिए एक मिसाल कायम कर देती है .तेजेन्द्र जी के व्यक्तित्व में उनकी स्नेहिल प्रकृति ,जिन्दादिली व खुशमिज़ाजी और उनके कृतित्व में कठोर परिश्रम ,भाषायी प्रेम व साहित्य-साधना निश्चित रूप से हमारे लिए प्ररेणा स्त्रोत है .

मूलतः भारतीय होते हुए भी तेजेन्द्र जी विदेश में रहकर अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को एक नई दिशा प्रदान कर रहे हैं .मेरा मानना है कि एक लेखक व साहित्यकार किसी भी परिवेश परिधि में बँधा हुआ नहीँ होता क्योंकि उसका मूल उद्देश्य समाज व देश को सही दिशा देना है .आज विदेश में रह रहे भारतीय रचनाकारों को ‘ प्रवासी रचनाकार ’ कहकर उन्हें अलग से श्रेणीबद्ध करना कहाँ का न्याय है ? इसलिए आज प्रवासी साहित्य को किसी दायरे में सीमित करने या भारत में लिखे जा रहे साहित्य से अलग करके देखने की जरूरत नहीं है अपितु जरूरत है उस मानवीय सम्वेदनाओं से रू –ब - रूह होकर उन्हें महसूस करने की जिनका ज्रिक ये भारतीय रचनाकार विदेशों में रहकर कर रहे हैं .इसका बेमिसाल उदाहरण हैं श्री तेजेन्द्र शर्मा जी .तेजेन्द्र शर्मा जी से हुई ये पहली मुलाकात मेरे हृदय पर अमिट छाप छोड़ गई जिसे मैं कभी नहीं भूल सकती .

ड़ॉ प्रीत अरोड़ा

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