रविवार, 10 फ़रवरी 2013

राजीव आनंद की कविता - बिना जुर्म के जेल

बिना जुर्म के जेल

एक दार्शनिक ने बताया न्‍याय का हाल

लिखित कानून है एक मकड़जाल

अमीर जिससे निकल जाते है फाड़

फंसकर निर्धन बेचारा हो जाता है बेहाल

दूसरे दार्शनिक ने दिया वक्‍तव्‍य कानून पर

शासन करता है कानून गरीब औ' निर्धन पर

अमीर करता है शासन अमूमन कानून पर

मनमानी करता चढ़ाता है गरीब को सलीब पर

दवा की खुराक की तरह जहां

मिलता है गरीबों को खाना

झूठे-फर्जी मूकदमों में भी अक्‍सर

पड़ता है गरीबों को जेल जाना

न्‍याय सूलभ हो गरीबों के लिए भी

क्‍या ऐसा हमारे देश में हो पाएगा ?

या फिर हमेशा की तरह जुम्‍मन औ' अनुपवा

बिना जुर्म के ही जेल भेजा जाएगा ?

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह, झारखंड़ 815301

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