मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

उमेश मौर्य की लघुकहानी - मटन-चिकेन

लघुकहानी -

॥ मटन-चिकेन॥

वेद प्रकाश जी बिल्‍कुल विशुद्ध पंडित थे। लेकिन आदत है लग गयी। थोड़ा उल्‍टा पुल्‍टा बोलने की। बुराईयॉ तो व्‍यक्‍ति के अन्‍दर में उसी तरह आती है। जैसे दाढी के पके हुए बाल। पहले थोड़ा सुनहरे लगते है और बाद में एक एक कर पूरे चेहरे पर छा जाते है। आँखो के नीचे रहते है। फिर भी पता नहीं चलता। पता तो तब चलता है। जब पूरा सत्‍यानाश हो जाता है। वैसे ही बुरी आदतें पहले तो अच्‍छी लगती है और बाद में सब सत्‍यानाश करके ही छोड़ती है। इसका शुरू में ही नियंत्रण कर लिया जाये तभी सही रहता है। वही हाल पंडित जी का घर में जवान बेटी की शादी के लिए एक से बढ़कर एक ब्राहमण आते थे। बिल्‍कुल शाकाहारी, धर्मनिष्‍ठ, मॉस मदिरा का तो नाम सुनना भी पसंद नहीं। पंडित वेद प्रकाश भी आधुनिक पंडितों में से ना थे। लेकिन ये आदत कहाँ से घुस गयी। पता नहीं । किचेन को चिकन और मटर को मटन बोलने की।

आज बेटी के शादी की बात पक्‍की होनी थी। पूरा द्वार पंडितों से भरा था। सब के सब पूरे धार्मिक प्रवृत्‍ति के तन से भी मन से भी, देखने से ही श्रद्धा का भाव उमड़ पड़ता था। लगता था कि अभी भी सच्‍चे ब्राह्‌मण भारत की धरती पर बचे हैं। लग रहा था कोई शास्‍त्रार्थ होने वाला हो। पंडित जी की पत्‍नि ने पंडित जी को बुलाकर धीरे से कहा-

- ''आज कुछ उल्‍टा पुल्‍टा मत कह देना। कितने-अच्‍छे अच्‍छे रिश्‍ते केवल आपके कारण ही लौट चुके है''।

पंडित जी- ''तुम निश्‍चिंत रहो। इस बार पूरे होश हवास में कोशिश करूँगा।''

सब कुछ अच्‍छा चल रहा था। लेकिन जाते जाते पंडित जी ने अपनी आदत का प्रयोग कर ही दिया।

पंडित जी-''देखिये आप लोग सुबह से आये है। रिश्‍ते की बात तो पक्‍की हो ही गई है। थोड़ी देर रुक जाते तो.........। मार्केट से सुबह ही ताजा मटन लाया था। चिकेन में ज्‍यादा देर नहीं लगेगी।''

सारे किये कराये पर पानी फिर गया। ये रिश्‍ता भी कैंसिल हो गया। सिर्फ पंडित जी के कारण। जो खाते तो न थे लेकिन जुबान पे रखने की आदत पड़ गयी थी।

- उमेश मौर्य

सराय, भाईं,

सुलतानपुर, उ0प्र0।

ukumarindia@gmail.com

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