शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

मोतीलाल की कविता - संस्कार

माँ, तुमने चलते वक्त विदाई में
जो कुछ मेरे कानों में उड़ेला था
वही कुछ उड़ेल दिया है मैंने
अपनी बेटी की विदाई में ।

माँ, पिछले समय
तुमने जो गहने मुझे दी थी
बड़े दुलार के साथ
जिसे शायद तुझे
तेरी माँ ने दी होगी
आज वही गहने
मैंने अपनी बेटी को दे दी
बड़े दुलार के साथ ।

माँ, तुमने जो सहा था
दुख की कालिमा
मेरे बाबा के साथ
आज वही कुछ
अपनी बेटी की विदाई में
देते हुए बड़ा डर लगता है
और खो जाता है मेरा चेहरा
अपने ही चेहरे की रेखाओं के भीतर ।

आज जब मेरी बेटी की बेटी की सगाई
होने वाली है
मेरे हाथ-पाँव थरथराने लगे हैं
बूढ़ी हड्डियां चरमराने लगी है
और याद आने लगी हो माँ तुम
जबकि तुम तो अब ऊपर कहीं हो
और मैं वह कोना ढूंढ रही हूँ
अपने ही घर में ताकि छुपा दूँ
वही कुछ देने का सिलसिला ।

हाँ माँ
इधर बहुत कुछ बदलता गया है
वक्त के साथ-साथ इस नवयुग में
तुम्हारी तरह के विचारों को
अब दकियानूसी समझा जाता है
इसलिए मैं नहीं चाहती
कि शामिल हो लूँ
अपनी पोती की शादी में ।

मन के भीतर
यही डर समाया है
कि तुम्हारी चीजों के साथ-साथ
मुझे भी कहीं
फेंक न दें
दकियानूसी कुड़े के ढेर में ।

* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

6 blogger-facebook:

  1. BAHUT HI SAMVEDNAATMAK..MAARMIK CHITRAN KARTI HUI RACHNAA...BADHAAI ..!!

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  2. सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahur sachchhi,aur marmik hai, dar swavawik dai, aur hamari umr ke har kisii ke man men hai.bahut khub.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही भावपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति. बधाई
    शंकर लाल

    उत्तर देंहटाएं

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