रविवार, 10 फ़रवरी 2013

प्रतिभा शुक्ला की कहानी - कुम्भ कथा

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कुम्भ कथा
प्रतिभा शुक्ला
अम्मा का धर्म अपना है। मानव धर्म से ज्यादा कर्मकांड के साथ देव पूजा। इस कर्मकांड के लिए  किसी भी तरह के विपद और जटिल चुनौतियों के लिए तत्पर रही हैं। पूरे पचहत्तर साल की हो चुकीं। आम तौर पर बीमार सी नजर आती अम्मा की देह में धर्म की बात आते ही जाने कहाँ से पंख लग जाते। कूद कर खड़ी हो जाती। एकदम चपल बालिका की तरह। फिर बड़े से बड़ा जानकार भी अम्मा के पीछे। अम्मा सबसे समझदार। अम्मा में सब की आस्था। जिनके पास अम्मा के प्रति आस्था नहीं, वह पापी और घमंडी


अभी पिछले साल की ही तो बात है। एक दिन अम्मा नाराज न थी। पता नहीं क्यों। मैं उनके सर पर तेल रख रही थी। वे एकटक छत की ओर निहार रही थीं। आँखों में कुछ उम्मीदें साफ़ नजर आ रही थीं, पर अम्मा के लबों पर उतर न पा रहे थे।
मुझसे रहा न गया, क्या बात है अम्मा जी? कुछ कहना चाहती हैं?


नाही हो। कहने से ही का फायदा होगा।
आप बताएं तो सही। कोई बहुत बड़ी बात है क्या?


अब का बताएं बिटिया। हमरो मन कर रहा है कि हर साल कल्पवास कर लें। बिटिया तू बात कर उससे। उसने मेरी हर इच्छा पूरी की है। बस यही आखिरी इच्छा है। फिर कभी कुछ न कहूँगी।


अम्मा की यह फरियाद मन तक भिगो गयी। हमेशा बरसने वाली अम्मा जी ऐसे समय पर कितनी करुण हो जाती हैं। कोई बात नहीं। पति के रहते जो लालसाएं न पूरी कर पायीं, उसे जरूर पूरी करा देनी चाहिए। आखिर बेटा-बहू का इससे बड़ा धर्म क्या हो  सकता है। शायद यह प्रभु का संकेत ही है।


अम्मा की सारी खरीदारी हो गयी। दरवाजे पर गाडी खड़ी हुई तो उनकी पूरी गृहस्थी उस पर सजा दी गयी। एक किलो सुपारी और ढाई सौ ग्राम जर्दा के साथ। पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने पाँव छुए और अम्मा जी का लाड बरस पड़ा। हजार नियामतों के साथ वह विदा हुयी तो आँखों में करुणा उतर आई। दिल से निकला, प्रभु तू सब का खेवनहार। अम्मा की रक्षा करना। इनके हर मनोरथ पूरा करना।


हफ्ते भर बीते थे कि  अम्माजी का बुलावा आ गया। सबकी बहू-बेटियां पहुँच कर शामिल हो रही हैं।अम्मा के भी परिवार का कोई न कोई तो पहुंचना चाहिए। वरना आदमी का कद छोटा हो  जाता है।


मैं पहली बार कुम्भ आई थी। चारो ओर छोटे-छोटे घरौंदे और मुंड। किसिम किसिम के लोग। धार्मिक कोहराम लाउड स्पीकरों के माध्यम से कान फोड़ रहा था। बिजली के लट्टू इफरात संख्या में टिमटिमा रहे थे। किसी सड़क पर पाँव रखने की जगह न थी। किसको कौन धकियाते जा रहा है, किसी को परवाह नहीं। धर्म क्षेत्र में किसी की नीयत खराब हो सकती है भला!


अम्मा जी के टेंट में घुसते ही मन खराब हो गया। हमने तो अम्मा जी को अकेले ही भेजा था, पर यहाँ तो मजमा लगा है! बड़ी वाली मौसी और उनके बेटे भी हैं, जिन्होंने हमसे तीन साल से रिश्ता तोड़ लिया है। मझली मौसी और भी दो महिलायें। झोरा-बोरा का जैसे अड़ार लगा हो। सर पर पल्लू रख सबके पाँव छुए। सबके ठहाके बंद हो गए। मैं अम्मा जी के पास जाकर बैठ गयी।


भांजा साथ में था। बोली, बेटा मैं यहाँ  नहीं रहूंगी। मेरी व्यवस्था अपने कमरे पर कर दो। सुबह आ जाऊंगी। मैंंने अपने पति से भी बात कर सूचित कर दिया।
टेंट में बालू भरा था। उसी पर पुवाल डाल कर बिस्तर लगाये गए थे। द्वार के बगल में अस्थाई किचेन बनाया गया था, जहाँ सिलेंडर बालू में बर्नर तक धंसा था। इर्द-गिर्द बर्तनों का अम्बार। रिश्तेदारों के सामान कोढ़ में खाज की तरह बिखरे थे।
बड़ी मौसी ने चाय बनाई। हमने साथ बैठ कर चाय का लुत्फ़ लिया।


कल्पवासी एक वक्त के अहारी होते हैं। वह भी स्वपाकी। या फिर कोई ऐसा व्यक्ति जो पूरे कल्पवास तक रह सके, वह बना सकता है। शेष लोग उसके सहयोगी। कोई बरतन धुलेगा तो कोई सफाई करेगा और कोई चाय बनाएगा। पुन्य हासिल करने के इच्छुक लोग चाहें तो उनके पावों की मालिश कर सकते हैं। इसलिए भोजन केवल मेहमानों का बना, जो उनके सहायतार्थ उपस्थित हैं और घर के सदस्य हैं।
मेरे भीतर बचपन की चुनौती वाला स्वभाव जागा। अब मन बदल गया था। लगा यही रहो और इसका भी लुत्फ़ उठाओ। भांजा लौट गया।


अब सभी इत्मीनान से जमा होकर देश-दुनिया की बातों में रम गए। रात के नौ बज चुके थे। सभी लोग पुवाल के बिस्तर में दुबक गए। भारी ठण्ड में एक दूसरे की देह अलाव बन गयी। महिलायें एक ओर और पुरुष एक ओर। नीद ऐसी गहराई कि कब सुबह हुई मुझे पता ही न चला। मुह अँधेरे "उठो रे, चलो रे------------सीताराम चरण रति मोरे----------पानी क पिंड सवारी खडा कर साहेब जय जय दुर्गा महारानी" का जो शोर और भगदड़ शुरू हुई कि सो पाना मुश्किल हो गया। महिलायें-पुरुष अपने अपने कपडे गठिया चुके थे। संगम में दान के लिए तिल, गुड, दाना आदि बाँध लिए गए। अम्मा ने पुकारा, चल जल्दी कर तू भी तैयार हो जा। जा जल्दी से बहार-भीतर हो ले। आलस के लिए अवकाश न था। न चाहते हुए मैं भी उन्ही की रफ़्तार में दौड़ाने लगी। दस मिनट में ही तैयार।


भक्तो की टोली संगम भगवान के रास्ते जो भी टेंट दिखा अम्मा नेता की तरह सबको हरकारा लगाती चलती, चलो फुआ आज बहुत देर कर रही हो। चलो मौसी सूरज देवता निकल रहे हैं। ------अरे नानी, तब का आई हो तीरथ करने, अभी तक सो ही रही हो।


फिर क्या मजाल कि कोई रजाई के भीतर पड़ा रह जाए। एक एक कर काफिला बढ़ता जा रहा था। देखते ही देखते हम सैकड़ों की संख्या में हो गए। आश्चर्य हो रहा था की एक ही सप्ताह में अम्मा की कुनबा इतना बड़ा कैसे हो गया। और कहाँ से आ गए इतने रिश्तेदार। फिर हंसी-ठिठोली के साथ हमारा जुलुस नंगे पाँव संगम तट पर जा पंहुचा।


बर्फ की तरह ठन्डे पानी को देख मेरी तो हिम्मत छूती जा रही थी, पर यह क्या अम्मा तो झम्म से कूद गयीं। फिर तो एक-के कर सारे रिश्तेदार लोग भी कूदना शुरू किये और सभी पानी में हो गए। मैं कपड़ों की सुरक्षा के बहाने किनारे खड़ी रह गयी। बड़ी मौसी सबसे पहले आ गयीं, अब जा तू भी नहा ले।


क्या करती। तैरना आता न था। संभल-संभल माँ के पास जैसे तैसे पहुंची। अम्मा मन में मन्त्र बुदबुदा रही थीं। मैंंने उनको पकड़कर पहला गोता लगा लिया। बड़ा मजा आया। बचपन में मैं अपनी माँ के पास गंगा जी जाती तो ऐसे ही दुबकी लगाती। फिर तो बचपन की अल्हड़ता जैसे ताजा हो गयी। अम्मा को पकड़ कर कई गोते लगाये। इतना कि अम्मा जी अब खिसियाने लगीं। उन्होंने आँख तरेरी तो अपने पर काबू करना जरूरी हो गया।


अम्मा जी की पूजा का अपना तरीका था। वह कांपती जा रही थीं और मन्त्र तेज आवाज में बोलते जाना। पढ़ी-लिखी नहीं हैं इसलिए हर मन्त्र उनके मुह से अपभ्रंश होकर निकल रहे थे। कितनी तो चालीसा और कितनी प्रार्थना कुछ इसी तरह भर्र भर्र अम्मा के मुह से फुट रहे थे। जैसे-जैसे अम्मा जी पूजा करती जातीं, शेष लोग भी उसी तरह का अनुशरण करते। शंकर जी का पार्थिव बनाया तो बीसियों पार्थिव प्रतिमाएं तैयार हो गयीं। भगवान आ गए मूर्ति में। ॐ शंकराए नमः, ॐ ॐ ॐ" देवताओं के नाम भूल गये----------फिर याद आ गया, ॐ गणेशाय नमः, विश्नुवाय नमः, ब्रह्मय नमः-----------पार्थिव पिंड दही फूल, माला, अक्षत, तिल, गुड, आरती ग्रहण करता जा रहा था। मैंंने मोबाइल से फोटो खींचना शुरू किया तो महिलायें सावधान हो गयीं। आस्था का रंग और रंगीन हो गया। हर किसी की चाहत कि मेरी फोटो बड़ी धर्मात्मा का आये। अम्मा तटस्थ। प्रधान पुजारी अम्मा। उन्होंने आसन जमा लिया। बालू की रेत से ठण्ड सर तक घुस रही थी, पर भक्त मंडली पूजा खेलने में व्यस्त। अब मेरी ही हिम्मत छूटने लगी। ज्यो मोबाइल बैग में रखा, पूजा ख़त्म।


अब सभी लोग पंडित जी के पास पहुंचे। मुस्टंड पंडित मुह में पान की गिलौरी दबाये किसी युवती के माथे पर बड़े इत्मीनान से टीका लगा रहे थे। इधर की बड़ी टोली देखे तो मुस्कुरा पड़े। चहरे पर उल्लास फ़ैल गया। उन्होंने कुछ खली कुरई अर्थात टोकरी हमारी ओर उछाली। महिलाओं का समूह लपक लिया। फिर तो गठरी में से तिल-गुड-चावल आदि के साथ पांच रुपये की नोट या सिक्का रख दान का सिलसिला शुरू हुआ कि पंडित जी की झोली और पाकेट छलक पड़े। पंडित जी को सबने पालागन किया। उन्होंने कुछ संस्कृत और कुछ हिंदी में आशीर्वाद दिया।


टोली चल पड़ी। अम्मा जी पेट के पास आँचल का अस्थायी झोली बना चावल भरी थी। बाकी महिलाओं ने भी कुछ ऐसा ही अनुशरण किया। अम्मा जी मुट्ठी में चावल तिल एक-एक दाना गिराती जातीं। अब भिखारियों की पंक्तियाँ सामने थीं। रिरियाते हुए, ए माई, तोहार सुहाग अमर रहे। भगवान तोहे दुनिया भरे क ख़ुशी देइहैं। उनकी बातों से किसी से कोई मतलब नहीं। टोली की सभी महिलायें चावल-गुड-दाना आदि फेंकते हुए आगे बढ़ लेतीं। मैं परेशान कि इन भिन्न-भिन्न दानों को ये लोग कैसे अलग करेंगी। लेकिन टोली को कोई फर्क न पड़ता था।


अम्मा के कितने देवता थे पता ही न चल पाता। टेंट में आने के बाद अम्मा के देवताओं के पिटारे और चित्र निकलने लगते। फिर ढेर सारे डिब्बे। किसी में धूप तो किसी में रुई की बत्ती, किसी में रोली किसी में अक्षत, टिल, कपूर आदि जाने कितने प्रकार के सामान। ॐ विश्नुवाये नमः, ॐ शंकराए नमः, ॐ दुर्गाये नमः ------------------ के अपभ्रंश नाम। साथ की महिला टोली उनका अनुशरण करने लगती। मैं एक कोने में बैठ गयी। आँखों में विस्तीर्ण संगम का पाट और ऊपर वाले छलिये की लीला फ़ैल गयी, क्या प्रभु कोई एक विधा नहीं बना सकते थे आस्था के। हिन्दू मुस्लिम, सिख, इसाई सब अपने-अपने ढंग से तुम्हे याद कर रहे हैं। एक ही धर्म में अनंत उपासना पद्धतियाँ! एक घर में अनेक परम्पराएं। कितने तरह से जोड़ कर खड़ा कर लेते हो अपना साम्राज्य। उस महाकुम्भ में मैं रहते हुए भी न रह पायी। आँखों में सारंडा का जंगल और किरीबुरू का सन राइज प्वाइंट उभर आया। न कोई जन न कोई ध्वनि। सूर्य मानो पास से चला आ रहा है। पर्वत श्रृंखलाओं के बीच उसका लगातार आगे बढ़ते हुए प्रतीत होता कि अभी आकर कह देंगे, तू चल मेरे साथ अनंत की यात्रा में। यह दुनिया बड़ी छोटी है। मैं तुझे ब्रह्माण्ड का दर्शन कराऊंगा। आँखों की कोरों से आंसुओं की लड़ी चल पड़ी। हे देव तुम अनंत। हम कितने तुच्छ। हम संसार के हाथों में संसार तुम्हारे हाथों में।


अचानक कानों में अम्मा का मंत्रोच्चार गूंजा, नमो नमो अम्बे दुःख हरनी, नमो नमो आंबे सुख करनी। बाला में है ज्योति तुम्हारी, तुम्हे सदा पूजे नर नारी।
अम्मा का सस्वर पाठ शुरू हुआ। शेष महिलायें भी अपने-अपने मन्त्र शुरू कर दी। किसी को किसी से मतलब नहीं। सब के देवता अपने। अपने देवताओं को मनाने और पूजने की ऐसी होड़ मची कि कोहराम मच गया। किसी को दूसरे की सुनने की फुरसत नहीं।


पूजा के बाद अम्मा ने बताया, जल्दी करो रे लोगों। महात्मा जी आते ही होंगे। फिर क्या सभी लोग अपने-अपने काम में लग गए। कोई आलू छील रहा है तो कोई दाल बीन रहा है। जल्दी से चुल्हा जला और भोजन पकने लगा।


महाराज आ गए। अम्मा ने उनके पाँव धुले। कपूर जलाकर आरती की। और आखिर में उनके पांवों पर सर टिका दिया। महात्मा जी ने नारायण-नारायण कह आशीष दिया।
अम्मा जी कनखियों से मुझे भी पाँव छूने का आदेश देती रहीं, पर भीतर से श्रद्धा न उमड़ी। अम्मा नाराज हो गयीं, पर कुछ बोली नहीं। श्रद्धापूर्वक महात्मा जी को भोजन परोसा गया। उन्होंने सब कुछ अपने खप्पर में मिला लिया। फिर विचित्र तरीके से उसे सानने लगे। जाने कैसा बन गया भोजन का रूप। मन में हिकारत हो आयी। उन्होंने उसे सड़प सड़प करके खा लिया। अम्मा बाहर विदा करने गयीं तो फिर उनके पांवों पर मत्था टेक दी।


महात्मा-भोग के बाद हम सभी ने भोजन किया। महिलाओं का समूह अब बाहर धूप में आ गया। रेती पर चटाई और बोरा बिछाकर सभी लेट गए। अब शुरू हुआ घर की बहुओं की दन्त कथाएं। सब के पास दुखों का अनंत पिटारा। बात आते-आते लोगों के यौन कथाओं पर टिक जाती। फिर जो समीक्षा शुरू होती तो कुम्भ में नाना चरित्र हनन के किस्से भरते चले जाते। यह रोज का दस्तूर था।


दोपहर का समय संत समागम का। बुजुर्गों की टोली निकल पड़ती। मैं पीछे नयी साधू सी डोलती जाती। चांदी के सिंघासनों पर बैठे चवर की हवा लेते साधु पुराणों की कथाएं कहते और मोह माया से विरक्त हो गुरु की सेवा करने और मोक्ष प्राप्त करने के तरीके बताते। महिलाओं का समूह हाथ जोड़े मुग्ध भाव सुनता रहता।


तीसरे दिन बड़ी मुश्किल से अम्मा को अलग कर बाजार ले जाने का मौका मिला। बाबू जी जब तक जीवित रहे, आठ बच्चों को पोसने में ही लगे रहे। अम्माजी को अलग से कोइ सुख न दे सके। बेटे कुछ करने लायक हुए तो दुनिया से चल पड़े। अम्मा जी के जीवन की अत्रिप्तियाँ बचपन से अवचेतन में कुलबुलाती ही रह गयीं। बाजार लेकर अम्मा को जब भी गयी, वह छोटी सी बच्ची बन गयीं। हिचकिचाते हुए मेरी जिद पर फुल्की, चाट, मिठाइयाँ खातीं। फिर आशीषों की बरसात। मन भींग जाता। लगता, मेरा देवता प्रसन्न हो गया। मेरे लिए हमेशा यही सबसे बड़ी पूजा होती।
अब कुम्भ क्षेत्र मेरे लिए आनंद लोक बन गया। भूल ही गयी कि पतिदेव अकेले होंगे। खुद बनाने खाने के बाद दफ्तर में जाने आदि में कितनी कठिनाई हो रही होगी।
एक सुबह अम्मा जी बोली, चल तुझे एक और ख़ास चीज दिखाती हूँ। ठीक से देख लेना बिटिया। काहे की मेरे लिए भी वही सब इंतजाम करना पड़ेगा। हम पहुंचे शय्यादान महोत्सव में। थोड़ी देर पहले जो महिला निमंत्रण देने आई थी, वह पंडित जी के पास बैठी थी। मैंंने अम्मा जी को देखा। वे बोली, शय्या दान हो रहा है। अब यह जन्म जन्म के लिए गुरु की हो गयीं। गुरु की सेवा ही अब इनका धर्म होगा। इसलिए उन्हें माला पहनाकर पैर पखार रही हैं। मुझे बहुत अटपटा लगा कि जब वे विधवा हैं तो ये श्रृंगार के सामान क्यों दिए जा रहे हैं! बिंदिया, पायल कंगन, साड़ी आदि सभी कुछ तो है। जैसे किसी का ब्याह हो रहा हो। बाप रे कूलर, फ्रीज, टीवी भी! जीते जी आत्मा की शान्ति के लिए। यहाँ "मुट्ठी बाँध आये और हाथ पसारे जाने का" कोई अर्थ नहीं। मैंंने उस बालू की रेत पर नजर दौड़ाई तो चारों ओर ढेर सारी बालू की वेदी, पूजा पर बैठे लोग और सामानों का जखीरा, गाती हुई महिलायें और परेशान पुरुष वर्ग दिखाई पड़ा। लेकिन पंडित तो एक ही। उन्ही को सब जगह शय्यादान करनी है। सारा असवाब उन्ही को ले जाना है। सुई से लेकर पलंग तक। गृहस्थी का सारा सामान। रुपये की बरसात।


मन घृणा से भर गया कि हमारे पूर्वजों ने धर्म को जिस मकसद से खड़ा किया, कुम्भ में तो दूर-दूर तक उसका नामोनिशान नहीं छोड़ा इन विचौलियों ने। यह एक धार्मिक व्यापार के रूप में शुरू हो गया। दूसरी ओर एक गाडी उन सामानों को ढोकर बाजार ले जा रही थी। इन सामानों को फिर कोई खरीदेगा शय्यादान के लिए। आखिर एक पंडित कितना सामान रखेगा अपने घर। इस बात को हर कोई जानता है, पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हमने तो दे दिया। अब पंडित की मर्जी। बेचें या घर रखें।
उनसे कोई मतलब न था। किसी ने शय्या दान के लिए जमीन गिरवी राखी थी तो किसी ने लोन लिया था। किसी ने घर ही गिरवी रख दिया था। किसी ने बच्चे की पढाई रोक दी थी तो किसी ने किसान क्रेडिट कार्ड का पैसा ही लगा दिया था। इन सब संसारी सुविधाओं से आखिर मोक्ष का कौन जोड़। सबका उद्देश्य तो मोक्ष ही पाना है। उन्हें मोक्ष मिला कि नहीं, पर अम्मा हमसे वचन लेने पर आमादा थीं, वचन दो बिटिया, हमारे कल्पवास के समापन पर तुम यह सब करोगी। करोगी न?
गाय दान देकर मुझे वैतरिणी पार कराओगि न?


मैं खामोश थी। न ना न हाँ। उन्हें कैसे बताती की स्वर्ग और नरक इसी धरती पर मनुष्य के कर्मों के अनुसार मिलते हैं। पचहत्तर साल की अवस्था हो गयी अम्मा की। जहाँ उन्हें ज्ञान की अंतिम स्थिति में अनुभव बांटना चाहिए, अम्मा दलदल में फंस रही हैं। तो क्या अभी भी ईश्वर ने उनपर कृपा नहीं की! फिर क्या उनका धर्म और पूजा लोगों में अपने लिए आदर बनाना था?


हमारे लिए तीन बेटियों के ब्याह से ज्यादा अब अम्मा का शय्यादान जरूरी है। ------------------को कहि सकत प्रयाग प्रभाऊ।

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पुलिस अस्पताल के पीछे
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर
उत्तर प्रदेश

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