सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - प्रधानमंत्री बनने की चाहत

प्रधानमंत्री बनने की चाहत

जैसे-जैसे २०१४ का आम चुनाव निकट आता जा रहा है। वैसे-वैसे नेताओं के भीतर प्रधानमंत्री बनने की चाहत बढ़ती जा रही है। कइयों के मन में लड्डू फूट रहे हैं। अबकी बारी हमारी बारी का नारा मन में ज्वार की भाँति उठता है। परंतु अगले ही क्षण मुश्किलों को भापते ही भाटा हो जाता है। तब लगता है जैसे किसी ने जोरदार चाटा लगा दिया हो और अभी नहीं तो कभी नहीं बुदबुदाकर मन मसोस कर रह जाते हैं।

तरह-तरह के कयास भी लगाये जा रहे हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा ? हमें तो पता है। कोई नेता ही होगा। लोग नाम को लेकर नाहक परेशान हैं। क्योंकि काम तो सब एक सा ही करते हैं। कोई काम करना चाहे भी तो दूसरे करने नहीं देते। अपना बेड़ागड़प्प होने का डर जो होता है। इसलिए कोई सेकुलर तो कोई जोकर, कोई लेकर तो कोई देकर बन जाता है। अभिनेता और नेता होते कुछ और हैं और दिखते कुछ और हैं। जब हल्ला मचाना और हीला हवाली ही करना होता है तो चाहे जो और जैसे बनें। देश की जनता भी काम न हो इसलिए बहुमत नहीं देती ताकि टांग खिचाई होती रहे।

प्रधानमंत्री बनने की चाहत कभी-कभी बड़ी अकुलाहट में बदल जाती है। कुछ लोग चिंता कर रहे हैं तो कुछ चिंतन करने में लगे हुए हैं। क्योंकि देश में एक समय में केवल एक ही प्रधानमंत्री होता है। फिर भी चाहत खराब थोड़े होती है। कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि कोई किसी को भी चाह सकता है। क्योंकि चाहना लोगों का मौलिक अधिकार होता है जिसका आज के नवयुवक काफी लाभ उठाते हैं।

जब हीरो किसी को चाहता है तो पहले प्यार होता है और फिर मार। बस एक फिल्म बन जाती है और अच्छी खासी रकम हाथ लग जाती है। जब रियल वर्ल्ड में नवयुवक इस तकनीक को अमल में लाते हैं तो हाथ में रखी रखाई रकम भी हाथ से निकल जाती है। लेकिन प्रधानमंत्री बनने की चाहत अनूठी है। जिसकी चाहत कम से कम हर नेता करता है। आम आदमी भी जिसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, इस चाह से बच नहीं पाता है। और स्कूल के दिनों में कम से कम ‘काश मैं देश का प्रधानमंत्री होता’ बिषय पर निबन्ध लिखकर ही अपनी चाहत का इजहार करता है और झूठी तसल्ली प्राप्त करता है।

लोग कहते हैं कि जहाँ चाह वहाँ राह। लेकिन यह कहावत सही नहीं लगती है। क्योंकि हमारे नेताओं के पास प्रधानमंत्री बनने की चाह है। लेकिन राह या तो बिल्कुल है ही नहीं अथवा ग्रामीण हिंदुस्तानी सड़क की भाँति बिल्कुल ऊबड़ खाबड़ मुश्किलों भरी है। छुटभैए से लेकर बड़े-बड़े नेता इस चाह के लिए राह बनाने में लगे रहते हैं। कई तो ‘र’ का फंडा तक नजरंदाज कर देते हैं। एक विद्वान ने हमें बताया था कि आज तक देश में जितने प्रधानमंत्री हुए हैं उनके नाम में ‘र’ जरूर जुड़ा था चाहे वह डॉक्टर के जरिये ही रहा हो। और आगे भी ऐसा ही होगा। भले ही कोई लाख हाथ पाँव मारे। क्योंकि इस देश का ‘र’ से बहुत गहरा सम्बन्ध है और देश में भी ‘र’ है।

मजे की बात यह है कि जिसमे कोई दम नहीं वह भी हम किसी से कम नहीं के सिद्धांत को अमल में ला रहा है। ऐसे नेता जिनकी पार्टी को उसके प्रदेश के बाहर के लोग जानते तक नहीं वह भी ताल ठोक रहे हैं। और हिंदुस्तान जैसे देश का प्रधानमंत्री बनना चाह रहे हैं। कई लोग जो अपने प्रदेश की दशा और दिशा दोंनो बिगाड़ चुके हैं वे अब देश की ओर देख रहे हैं क्योंकि प्रदेश में अब उनले लायक कुछ खास नहीं बचा है। क्योंकि हर चीज की एक सीमा जो होती है।

एक बार एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि नेता देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। मैंने कहा बहुत अफ़सोस है और देश का दुर्भाग्य है कि नेताओं को दिशा का ज्ञान ही नहीं। ऐसी स्थिति में किधर ले जाएंगे। जिधर चला जाये वही आज इस महान देश की दिशा है। नेता को सिर्फ कुर्सी दिखती है कमसे कम मंत्री की और प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए घात लगाये रहते हैं। इस कुर्सी में इतनी चमक होती है कि आँखे चौधियाँकर चमक खो देती हैं।

कुछ लोग केवल कुछ चीजों का ही राजनीति करते हैं प्रदेश अथवा देश की नहीं। जैसे तुष्टीकरण, भाई-भतीजा और जात-पात की। इन्हें मालुम ही नहीं कि देश बिबिधिताओं का देश है। बिबिधिता में एकता इसकी अखंडता के लिए जरूरी है। और कुछ चीजों की राजनीति करके मंत्री तो बन सकते हैं लेकिन देश को ज्यादा दिन तक चला नहीं सकते। चुनाव जीतने के बाद नेता संविधान की रक्षा और देश की एकता व अखंडता कायम रखने की शपथ लेते हैं। लेकिन बाद में क्षुद्र राजनीति करने वाले नेता जनता से किए गए वादों की बात तो दूर अपनी शपथ तक भूल जाते हैं। कई तो सेकुलर होने के नाम पर राष्ट्रवाद की विचारधारा को ही त्याग देते हैं। और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपरोक्ष रूप से धर्म की ही राजनीति करते हैं। तुष्टीकरण से देश नहीं चल सकता बँट जरूर सकता है। जिसका नेताओं को कोई गम नहीं दिखता। क्योंकि बंटने के बाद भी कुछ न कुछ लूटने के लिए शेष बचेगा ही।

किसी को कोई छोटी-मोटी जिम्मेदारी सौपनी होती है अथवा कोई काम देना होता है तो उसका पिछला रिकोर्ड और अनुभव देखा जाता है। दीगर है देश की जनता जिसे देश की जिम्मेदारी सौंपती है उसका पिछला काम नहीं देखती। इसी से सबके मन में प्रधानमंत्री बनने की चाह प्रबल से प्रबलतम होती जा रही है। देश की जनता को देखना होगा। आँखे देखने के लिए ही तो होती हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाह रखने वाला देश अथवा अपने प्रदेश के लिए पहले कैसी राह बना चुका है। यही राह उसकी हमराह होगी और वह आगे भी ऐसा ही करेगा।

किसी को अपने भाई की पड़ी है। किसी को नात-रिश्तेदार की तो किसी को जाति की। किसी को अपने तात्कालिक लाभ की। किसी को टीवी की तो किसी को फ्रिज की तो किसी को कूलर की, किसी को लैपटाप की तो किसी को कम्प्यूटर की, तो किसी को वजीफे की। देश की किसी को भी नहीं। हिंदुस्तानियों के आँख से पट्टी कब हटेगी ? कहीं तब तो नहीं जब देश के गद्दार आँख ही निकाल चुके होंगे। सबसे पहले देश होता है। जब देश ही नहीं होगा। तब ये सब भी नहीं होंगे। हमारे नेता जानते हैं कि बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहिए। न हर्रे लगे न फिटकिरी और रंग भी चोखा हो तो किस बात का गम। जब हिंदुस्तान की जनता आँख मूँदकर प्रधानमंत्री बना ही रही है तो बन जाने में क्या बुराई है ?

हमारी सलाह तो यह है कि यदि सब नेता प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और वे ‘र’ के फंडे में बिश्वास करते हैं तो उनमें से कई लोगों को बिना कोई देर किए अपना नाम बदल लेना चाहिए। तथा साथ ही एक संविधान संशोधन विधेयक लाना चाहिए। जो फौरन पारित भी हो जायेगा। वह भी सर्वसम्मति से मेज थपथपा के। इसमें कोई दो राय नहीं है। इसमें प्रावधान यह होना चाहिए कि हर नेता जो चुनाव जीतकर आएगा उसे प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य मिलेगा। भले ही कुछ दिन के लिए ही सही। क्योंकि पाँच साल जाते देर थोड़े लगता है। और अगर सबकी बारी नहीं आई तो उसकी चाह का क्या होगा और वह सरकार की राह भी तो आसान नहीं रहने देगा।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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