गुरुवार, 14 मार्च 2013

मोहसिन खान की 2 ग़ज़लें

ग़ज़ल-1

आज इश्क़ का हरेक हिसाब होगा ।

किसी का चेहरा बेनक़ाब होगा ।

 

उसके वादे और न आने के बहाने,

आँखों में उसके कोई ख़ाब होगा ।

 

हम जब भी मिले ख़ुद को न समझा पाए,

उसके इम्तेहान में कौन क़ामयाब होगा ।

 

रात भर रोया है परिन्दा छत पर मेरी,

कल रात शबाब पर महताब होगा ।

 

तुम्हारे गुनाहों को ‘तन्हा’ माफ़ करते हैं,

यही सोचकर के एक सवाब होगा

 

ग़ज़ल-2

यूँ तो मेरी हरेक अदा से उसे प्यार था ।

ख़ोफ़े बदनामी, साथ रहना दुश्वार था ।

 

वो एक शख़्स जो अपनी दुनिया का था,

जो मेरी तरह इस दुनिया से बेज़ार था ।

 

दो रोटी के लिए काभी न की सौदागिरी,

कितने रात-दिन भूखा था, बेकार था ।

 

ज़माने बाद दिखा तो मज़दूरी करते हुए,

बच्चा मेरी जमात का जो होशियार था ।

 

तुम तो ख़ुदावाले हो क्यों मैख़ाने आये ।

‘तन्हा’ तो पैदाइशी ही गुनाहगार था ।

 

मोहसिन ‘तन्हा’

अलीबाग (महाराष्ट्र) 09860657970

khanhind01@gmail.com

4 blogger-facebook:

  1. दोनो गज़ल अच्छी है, बधाई !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद ! गिरिराज जी यह आपकी हौसला अफ़जाई है, वरना कहाँ हम इस क़ाबिल हैं ।
    मोहसिन 'तन्हा'

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी4:28 pm

    bahut achchhi gazal hai..Dr. dhirendra kerwal

    उत्तर देंहटाएं

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