गुरुवार, 14 मार्च 2013

सुरेन्द्र कुमार पटेल की 2 लघुकथाएँ

1.

॰किराए का घर॰

स्कूल से लौटकर आया था । द्वार पर उदास खड़ी पत्नी का म्लान मुख देखकर समझ

गया कोई बला है । चाय-पानी के बाद पूछा ,'सब ठीक तो है? '

उत्तर मिला ,

'बूढ़ा आया था । ' मेरा मन कसमसा गया । बूढ़ा यूँ ही नहीं आता । ' कह रहा था

,रूमरेण्ट बढ़ाएगा ' पत्नी ने बताया । ' अभी पिछले जुलाई में बढ़ाया तो था

रूमरेण्ट । चार मास भी न हुए होंगे । ' मेरा सिर चकरा गया । खीझकर अपनी ही

जंघा पर एक मुक्का दे मारा । ' वह कह रहा था अधिक रेण्ट पर नये किराएदार

मिल रहे हैं । ' पत्नी ने जोड़ा । ' ये सब यहाँ लग रहे पॉवर प्लान्ट की वजह

से है । दो साल के भीतर पाँच गुना से भी ज्यादा रूमरेण्ट बढ़ा है ' -मैने

झुंझलाते हुए कहा -' कल ही कमरा बदल देंगे । नहीं हुआ तो किसी गाँव में रह

लेंगे । '

घोषणा के मुताबिक अगले दिनभर की तलाशबीन के बाद पत्नी को कमरा मिलने की

खबर दी तो ऐसा लगा हीरे का हार दे रहा हूँ । मैने कहा , ' तैयारी कर लो ,

कमरा मिल गया है । ' वह चुप रहीं । ' अच्छी बात ये है कि उसी रेण्ट पर वैसा

ही कमरा मिला है। ' मैने बात दोहराई । वह फिर भी चुप रहीं। मैने कहा , '

आज ही से सामान बाँधना शुरू कर दो । एडवांस बतौर दो दिनों की मोहलत दी है

मकान मालिक ने । ' इस बार वह सकपकाकर बोलीं ,'तो आप एडवांस भी दे आए? '

'और नहीं तो क्या । एडवांस नहीं देता तो कमरा उठ न जाता ?' वह कुछ न

बोलीं । मैने ही हौले पूछा ,' कमरा बदलने का विचार नहीं है क्या ?'

' नहीं

जी ,ऐसी बात नहीं है । सोचती हूँ जब आई थी तब ये सिर्फ किराए का कमरा था

। धीरे-धीरे घर बना है । मोहल्ले के सारे लोग अपने लगने लगे हैं । ' उसकी

आँखें सजल हो उठीं । कण्ठ रुंध गया । मैं भी सोच में पड़ गया। सच ही तो है

। बच्चे भी कितना घुल मिल गये हैं इस परिवेश में । फिर नई जगह । फिर नई

शुरुआत । फिर नये रिश्ते । मैने कहा , ' तो इस बार रहने देते हैं । ' ' मगर

बढ़ा हुआ किराया ? ' पत्नी ने सचेत किया । मैने कहा , 'समझ लो वो किराया कमरे का नहीं

घर का देंगे । ' तब से अब तक रुमरेण्ट तो कई बार बढ़ा मगर घर नहीं बदला ।

 

2.

॰जरूरत॰

घर -गाँव छोड़कर नौकरी किए आठ-दस वर्ष हो गए । पुराने परिचितों और मित्रों

के आमंत्रण घर के पते पर ही प्राप्त होते । प्रत्येक आमंत्रण पर घर से

सूचना दी जाती , " अमुक के घर का आमंत्रण है । क्या करना है ? " यहाँ

'क्या करना है ' के दो निहितार्थ होते । एक तो यह कि आमंत्रण पर जाना है

या नहीं और दूसरा यह कि उपहार का स्वरूप और मात्रा क्या होगी । प्रत्येक

आमंत्रण पर मेरा पहुँचना संभव तो था नहीं । मेरे अनुजों में से किसी एक को

मेरी ओर से उपस्थिति दर्ज करानी होती ।

उस रोज भी मुझे मेरे परिचित के आमंत्रण की सूचना दी गई थी । स्मृति पटल पर

संचित यादों के सहारे मैने एक दृष्टि मेरे घर पर सम्पन्न हुए एक

कार्यक्रम पर डाली । फोन पर प्रत्युत्तर दिया , " उनके यहाँ जाना जरूरी

नहीं है । वे भी हमारे कार्यक्रम में कहाँ शामिल हुए थे ?"

यह पहला अवसर नहीं था जब मैने किसी का आमंत्रण ठुकराया था । इसके पहले भी

कई आमंत्रणों पर ऐसी ही राय दे चुका था । तभी यौवनारंभ पर खड़ी बेटी का

ख्याल आया । बेटी का रिश्ता आखिर इन्हीं पुराने परिचितों की मदद से ही

तलाशा जा सकेगा । फिर चार लोगों का दरवाजे पर होना भी तो जरूरी होगा । जहाँ

काम करता हूँ क्या वे लोग वो सब कर सकेंगे ? आमंत्रण को ठुकराकर मैं

स्वयं अकेला पड़ता जा रहा था । मस्तिष्क में विचारों के तन्तु एक -दूसरे

से उलझने लगे थे। फिर अकस्मात सब कुछ स्वत: स्पष्ट होता चला गया ।

घर पर फोन कर कहा , ' मेरी ओर से कोई एक चले जाना और उपहार देकर कहना

मेरी बड़ी इच्छा थी कार्यक्रम में शामिल होने की । किन्तु चाकरी की विवशता

है । फिर कभी अवश्य आऊँगा । '

और अब प्रत्येक आमंत्रण पर यही रटा -रटाया जवाब देता हूँ ।

(दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित)

-0-

सुरेन्द्र कुमार पटेल

वार्ड क्रमांक -4 ,ब्योहारी जिला -शहडोल (म0प्र0)

484774

2 blogger-facebook:

  1. सुन्दर प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुरेंद्र जी'किराए का घर' अच्छी लघुकथा रही। आज कल छोटे-बढे शहरों में घर खरीदना मुश्किल है अतः किरयदारों की कमी नहीं। इधर मालिक किराया बढाते जाते हैं और किरायेदार की कमर टूटने लगती है। वेतन का आधा हिस्सा किराए में जाने लगता है। किराया देते-देते इससे छुटकारा पाने के लिए वह घर खरीदने की मंशा रखता है पर किराए में खर्चा बढे तो जमापूंजी बढेगी कैसे? आपने आम परिवारों के दुःख को कहानी में अभिव्यक्ति दी है।

    उत्तर देंहटाएं

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