सुधीर मौर्य 'सुधीर' की 2 लघुकथाएँ

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दंगे की लूट

दंगाई आग लगते हुए बाज़ार में घुसे और लूटमार करने लगे।

जलेबी खाने का शौकीन बारह साला पिंटू इस अफरा-तफरी में छन्नू हलवाई की दूकान से जलेबी का थाल ले कर रफूचक्कर हुआ। छन्नू ने भी पूरी ताकत से पिंटू का पीछा किया और जलेबी का थाल बरामद कर लिया।

छन्नू के लौट आने तक उसकी दूकान के साथ-साथ बाजार की साड़ी दुकानें लुट चुकी थी। उसे देख कर उसका पडोसी दूकानदार शंकर जिसका एक हाथ दंगाईयों ने तोड़ दिया था, कराहते हुए बोला- क्या छन्नू साडी दूकान छोड़कर एक जलेबी के थाल के पीछे

भाग खड़े हुए।

जलेबी के थाल को वापस दूकान में सजाते हुए छन्नू बोल तभी मेरी पूरी दूकान में ये जलेबियाँ बाख गयी नहीं तो मै भी तुम्हारी तरह पूरी दूकान लुट्वाता और साथ में बांह भी तुड़वाता

 

बीवी का भाई

दो लुटेरों में लूट के माल को लेकर झगड़ा हो गया। झगड़ा इतना बढ़ा की एक लुटेरे ने अपने पिस्तौल से दुसरे पर गोली चला दी।

गोली सनसनाती हुई दूसरे लुटेरे के कान को हवा देती हुई निकल गयी। पहला हँसते हुए बोला खैरकर तू मेरी बीवी का भाई है नहीं तो गोली सीधे सर से टकराती। चल तेरा एक हिस्सा और मेरा तीन हिस्सा।

कुछ दिन बाद वापस लूट के माल को ले के वो फिर झगड़ बैठे। अबकी बार पिस्तौल दुसरे लुटेरे के हाथ में थी। वो पहले के सीने में गोली मरते हुए बोला तुझसे कितनी बार कहा अपनी बहन को मेरी बीवी बना दे। पर तू मेरी बात मजाक में टालता रहा। न तीन न एक अब सारा हिस्सा मेरा।

सुधीर मौर्य 'सुधीर'

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