मंगलवार, 12 मार्च 2013

राजीव आनंद की कविता - कचहरीनामा

कचहरीनामा

आने से समाज में कानूनी जागरूकता

दीवानी मुकदमा होनी हो गयी बंद

आ रहा था तो समाज में सुधार

देखा जा रहा था मगर वकीलों में द्वंद्व

समाज में आए जागरूकता का

वकीलों के समक्ष यही था तकाजा

संभावित मोवक्‍किलों को समझाए-बुझाए

लड़ना मुकदमा अब हो चुका है बेजा

हुंकारता हुआ कभी किया था वकालत

सिर्फ जिसकी है स्‍मृतियां बाकी

विश्‍वास आज कौन करेगा कभी

मन में थी वकालत के लिए पाती

 

कचहरी के प्रांगण में अब

नहीं जुटती मोवक्‍किलों की भीड़

झुंड में बैठे है वकील सब

सोचते अब कहां ले जाएं नीड़

तनाव लेकर जीने की आदत

हयात-ए-वकील में थी शामिल

तनाव रहित अब जीना होगा

वकीलों को यही करनी थी तामील

किताबों में कानून की उलझ कर

बन गए थे वकील किताबी कीड़ा

बेकार पड़े किताबों को देखकर

हो रही है अब वकीलों को पीड़ा

बीता दिए दशकों लड़ते-झगड़ते

कमाने की कभी नहीं आस टूटी

तय-तसफिया की आंधी चलकर

भरी-पूरी वकीलों की बगिया लूटी

 

क्‍या करते न्‍यायाधीश महोदय

बजा रहे थे उपर के आदेश

थोक मुकदमों का नित्‍य निपटारे में

कानून से कर रहे थे प्रद्वेष

विचित्र न्‍याय था विचित्र निर्णय

दोनों पक्षकारों की थी जय-जय

क्‍या करना था वकीलों को रस्म अदायगी के सिवा

मोवक्‍किलों के साथ न्‍यायाधीशों का कर रहे थे जय-जय

बाप-दादा की वकालत अब

विगत स्‍मृति बनकर स्‍मृति पटल पर छायी

खाएगें क्‍या कमाएगें कैसे

अब वकीलों को ये चिंता सतायी

आ गयी है समाज में शांति

लायी है कानूनी जागरूकता ने ये क्रांति

लड़ना नहीं चाहता है अब पक्षकार

कर दी गयी है दूर उनकी कानूनी भ्रांति

 

लड़कर जब जितना है एक को

क्‍यों हम धन औ' समय गवाएं

आओ मिल-बैठ कर सारे उलक्षण

पंचों के बीच ही सुलझाएं

भ्रमित होकर बहुत गवांया

धन औ' समय कचहरी में

हर समस्‍या का निदान अब

ढूढ़ रहा है पक्षकार सहचरी में

काले कोर्ट औ' गाउन में

वकील खड़ा है ठगा सा

आए समाज में इस सुधार को

मारे कैसे पत्‍थर अब बड़ा सा

रोजी-रोटी के पड़ गए है लाले

लड़ेगा नहीं वकील तो मरेगा

समाज सुधारक बनकर

क्‍या उसका पेट भरेगा ?

 

पेट के लिए पक्षों को लड़ाना

नैतिक रूप से है बुरा

द्वंद्व वकील का बन चुका ऐतिहासिक

करे अब क्‍या भला और क्‍या बुरा ?

वरिष्‍ठ जो थे वकालत में

राय देकर बसर जीवन कर लेगा

वकील जो बने है नये-नये

राय भी उनसे मगर कौन लेगा ?

कमाया बाप-दादा ने था जो

वकीलों को क्‍या वही खाना पडेगा

कमा कर जोड़ा मगर नहीं गया

सोने का ईंट भी खाने को कम पडेगा

 

पहनकर गर्मियों में काले कोट

पड़ जाते थे बदन में छाले

खत्‍म हुआ तनाव अबकी बरस

कर दूंगा कोट को अलमारी के हवाले

मुकदमा का नहीं होना

सभ्‍य समाज के लिए बेहतर है

वकील औ' न्‍यायाधीश का हुजूम

अब सरकार के पेशतर है

अपनी बहुमूल्‍य सेवाएं दशकों तक देकर

वकील औ' न्‍यायाधीश अब क्‍या करेगा

जीवन के गौधूली में क्‍या

अब कहीं उन्‍हें नौकरी मिलेगा ?

 

करते थे विगत दिनों में वे ही वकालत

देख नहीं सकते थे जो दूसरों की जलालत

सेवा नहीं अब व्‍यवसाय बन चुका वकालत

नहीं कमाया जिसने घर पर हुयी मलामत

हाय! कितनी नौकरियां छोड़ी

वकालत करने की खातिर

किसे पता था यही वकालत

भूखों मारने की रखती तासीर

नहीं चाहता छोड़ दूं लड़ना

कचहरी के बृहद प्रांगन में

मुंह छिपा रेत के भीतर

पड़े है वकील आंगन में

शुर्तमूर्ग के चाल से कब

समस्‍या का होता है समाधान

कमाई में व्‍यवधान को न स्‍वीकारना

क्‍या दूर कर देगा व्‍यवधान ?

 

भाषण में राष्ट्रपति महोदय ने न्‍यायपालिका पर

मुकदमों का भारी बोझ बतलाया

प्रधान मंत्री महोदय ने भी

यही बात भाषण में दुहराया

मुकदमों का बोझा बन गयी चुनौती

वकील-न्‍यायाधीश हरकत में आए

लोक अदालत के प्रांगन में हर हफते

लाखों मुकदमें को निपटाए

मुकदमें में तारीखों का पड़ना

अब हो गया गुजस्‍ते दिनों का इतिहास

वकील बेचारा अब क्‍या करे

बिगड़ गया उसका विधिशास्‍त्र

मानने को वरीय वकील तैयार नहीं

खत्‍म हो जाएगा मुकदमें का चलन

धरी रह जाएगी उनकी पुस्‍तकालय

खत्‍म हो जाएगा पुस्‍तकों का प्रचलन

क्‍या करेगा एआईआर लेकर वकील

तसफीया से करना है अंत मुकदमें का

हो चुकी घोषणा इतिहास के अंत का

घोषणा बाकी है होनी विधि के अंत का

अब नहीं आवश्‍यकता विधिशास्‍त्र की

समाजशास्‍त्र बस पढ़ना होगा

सामाजिक अनुबंधों के आधार पर

मुकदमों को निपटना होगा

 

विधि के बारीकियों को वकालत में

समझने-समझाने के दिन लद गए

हॉब्‍स-लॉक्‍स-रूसो को अब पढ़ना होगा

साइमंड़ के जूरिसप्रूडेन्‍स के दिन लद गए

जूरिसप्रूडेन्‍स हुआ करती है विधि की आंख

विधि परीक्षा किया था उत्तीर्ण पढ़ते-पढ़ते

विधि की आंख से देखना चाहते हैं वकील

साइमंड ही सो चुके है दास्‍तां कहते-कहते

--

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह, झारखंड़ 815301

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