गुरुवार, 14 मार्च 2013

आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - सुबह की सैर

सुबह की सैर


शाम के समय मि . मलिक बाहर बरामदे में बैठ कर  अखबार पढ़  रहे थे तभी उनकी बेटी रश्मि चाय लेकर आई। चाय का प्याला पकड़ते हुए उन्होंने पूछा " कुछ सोचा आगे क्या करना है।" रश्मि वहीं कुर्सी पर बैठ गई   " सोचना क्या है अब मैं वहाँ वापस नहीं जाऊंगी। सोच रही थी कि अपने पुराने ऑफिस जाकर पता करूं शायद कोई काम बन जाए।"    "पूरी ज़िन्दगी का सवाल है जो भी फैसला लेना सोच समझ कर लेना।"  मि . मालिक ने समझाया। " "इस बार फैसला मेरे हाथ में है पापा सोच समझकर ही लूंगी।" यह कह कर रश्मि चली गई।

मि . मलिक सोच में पड़ गए। रश्मि क्या कहना चाहती थी। क्या वो अपनी इस स्थिति के लिए उन्हें दोष दे रही थी। उन्होंने तो सब कुछ देख परख कर ही किया था। रश्मि और दामाद के बीच सब सही चल रहा था। किन्तु पिछले एक वर्ष से उनके बीच तनाव बढ़ गया। वजह क्या थी रश्मि ने कभी खुल कर नहीं बताया। बस एक दिन अचानक घर छोड़ कर मायके आ गई।

मि . मलिक और संघर्ष का पुराना सम्बन्ध था। पिता के असामयिक निधन के कारण छोटी उम्र में ही घर की ज़िम्मेदारी उनके कंधे पर आ गई। अतः उन्हें घर चलाने के लिए नौकरी करनी पड़ी। किन्तु जीवन में कुछ करने की चाह के कारण उन्होंने काम के साथ साथ पढ़ाई भी ज़ारी रखी। बड़े परिश्रम से उन्होंने अपने लिए एक मुकाम बनाया। तिनका तिनका जोड़कर उन्होंने यह गृहस्थी बनायी थी। किन्तु अब सब कुछ बिखरता सा लगता है।

बेटा राकेश  कुछ ख़ास नहीं कर सका। अपने जीवन की जमा पूँजी से उन्होंने उसे व्यापार शुरू कराया किन्तु उसका मन उसमे भी नहीं लगता है। आए दिन दुकान बंद रहती है। कितनी बार उन्होंने समझाया कि उस पर उसके बीवी बच्चे की ज़िम्मेदारी है। अतः अपनी ज़िम्मेदारी समझे किन्तु वह ध्यान नहीं देता है। आज भी सुबह सुबह ही वह अपनी पत्नी और बच्चे को लेकर अपनी ससुराल चला गया।

चाय पीकर मि . मलिक किसी काम से बाहर चले गए । लौटने में रात के ९ बज गए। खाना खाने बैठे तो पता चला की राकेश अभी तक वापस नहीं आया है। खाना खाकर वो राकेश के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। उनकी पत्नी भी साथ थीं। करीब दस बजे जब राकेश लौटा तो मि . मलिक ने उसे बुलाकर समझाते हुए कहा " आज भी दुकान नहीं खोली। इस तरह कैसे चलेगा। ऐसे तो एक दिन दुकान बंद हो जायेगी। अपनी ज़िम्मेदारी समझो। यह सब तुम्हें ही संभालना है।"  राकेश कुछ नहीं बोला चुप चाप अपने कमरे में चला गया किन्तु उसकी पत्नी वहीं रुक गई " ऐसा नहीं की हमें अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं किन्तु हमारा भी अपना जीवन है। माना  की पैसे आप ने लगाए हैं किन्तु बात बात में टोकना ठीक नहीं।" यह कह कर वह तेज़ी से अपने कमरे में चली गई।

मि .  मालिक अवाक रह गए। उन्होंने अपनी पत्नी की ओर कुछ ऐसे देखा जैसे कह रहे हों कि  देखा तुमने।

" मैं तो पहले ही कह रही थी कि चल कर सो जाओ। सब अपना भला बुरा समझने के लायक हैं। किन्तु आप तो किसी की सुनते नहीं हैं। क्या ज़रुरत है उनके बीच दखल देने की।" यह कह कर वह भी सोने चली गयीं।

मि . मालिक भी आकर लेट गए किन्तु उन्हें नींद नहीं आ रही थी। मन में विचारों का बवंडर चल रहा था। उनके मन में पीड़ा थी। उन्हें ऐसा लग रहा था कि सब कुछ रेत की तरह हाथों से फिसलता जा रहा है। हर कोई उन्हें ही दोष देता है। जिसके साथ पैंतालिस वर्ष बिताये आज वो भी उन्हें ही गलत ठहरा रही है। बहुत देर तक यही सब सोचते हुए न जाने कब उन्हें नींद आ गई।

घड़ी का अलार्म सुन कर वह जागे। सुबह के पांच बजे थे। आज मन और तन दोनों थके हुए थे। किन्तु उनका नियम पिछले पच्चीस वर्षों से कायम था। वो उठे तैयार हुए अपनी टोपी लगाई और बेंत हाथ में लेकर सुबह की सैर को चल दिए। सुबह की ताज़ी हवा ने मन की सारी पीड़ा हर ली। सब कुछ भूल कर वो सैर करने लगे।

---

मेरा परिचय

नाम - आशीष कुमार त्रिवेदी

जन्म तिथि - 7-11-1974

शिक्षा - B .COM [1994]

पेशा- प्राइवेट टयूटर

अपने आस पास के वातावरण को देख कर मेरे भीतर जो भाव उठते हैं उन्हें लघु कथाओं के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।

C -2072 इंदिरा नगर

लखनऊ-226016

E-MAIL OMANAND.1994GMAIL.COM

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------