गुरुवार, 14 मार्च 2013

अवधेन्द्र दाधीच की कविता - "पतझड़"


"पतझड"

मानव तू क्यों चिंता करता है
पतझड़ आता रहता है
पतझड़ होने से ही नूतन फूल खिलते हैं
पतझड़ आने से ही नूतन फूल उपवन बन महकते हैं
आज नहीं तो कल तुझे लौट जाना है
क्यों व्यर्थ चिंता करता अपना फर्ज निभाना है
बीज मिटता है
अपना अस्तित्व दिखाने को
नाम मिटा देता है अपना
अपने स्वप्न दिखाने को
कर्म किया माली ने
स्वंय फल न खाने को
कर्मरत है फिर भी दीन दुखियों को खिलाने को
भूल स्वार्थ अपना
कर्मरत हो कर्मण्य बन
छोड़ लिप्सा जीवन की तू जा फिर से बीज बन


संकलन- विनय भारत
संपादक
विविधा - 2013

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