गुरुवार, 14 मार्च 2013

अनीता मिश्रा की कविता - मैं ही तुम्हें बनाती हूँ

मैं ही तुम्हें बनाती हूँ
     अभी कितनी अग्नि परीक्षाएं शेष है।
     लोग कहते है हम चाँद और मंगल पर पहुंच गये हैं।
    और मै अभी अंगारों पर ही चल रही हूँ।
   तब से अब तक खुद को सुचरित्र सिद्ध करने के लिए। 
   वही चरित्र .........................................!
  जिसका हनन तुम कभी किसी चलती बस में करते हो।

  या कभी किसी स्कूल में ........
  तुम सात और सत्तर वर्ष में भी अंतर नहीं करते ........
   तुम्हारे पास हथियार है गुलामों को उनकी औकात बताने के लिए
तुम्हारे पास बच निकलने के रास्ते हैं।
तुम्हें समाज से मुहँ छिपाने की भी जरूरत नहीं है।

वो भी हमें ही करना पड़ता है। .......................
तुम इस घायल शरीर और आत्मा को
फंड का मरहम दे रहे हो
हंसी आती है मुझे ,तुम्हारी इस दयालुता पर
खुद तुम भी जानते हो किन के पास जायेगा ये फंड
तुम कब ये समझोगे ?
हमें फंड नहीं ,सम्मान और सुरक्षा चाहिए।

उन बीमार लोगों का इलाज़ चाहिए
जिनके लिए हम उपभोग्य वस्तु हैं।
तुम भूल जाते हो .......
जिसे तुम 'नरक का द्वार' या 'ताड़ना  की अधिकारी' कहते हो
उसी के लहू से निर्मित है तुम्हारा अस्तित्व
जिसे तुम मिटा डालना चाहते हो…
वही तुम्हें बनाती है।    

अनीता मिश्रा
( ३ फरवरी को दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर बिहार में एक स्त्री को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी से प्रेरित )

10 blogger-facebook:

  1. उत्तर
    1. dhanywaad ...krpya 4th line me khud ko sucharitra sidh karne ke liye padhe... anita

      हटाएं
  2. समाज की कडवी सच्चाई, जिसका इलाज़ होना ज़रूरी है

    उत्तर देंहटाएं
  3. नारी का यह भी एक रूप देखिए-

    माँ देखना....


    माँ मैं जीना चाहती थी
    पर जी नहीं पाई
    अलविदा,
    अब मैं चलती हूँ.

    माँ तू रोना मत
    मेरे भाईयों को भी मत रोने देना
    अब तो मेरे भाई बहन भी
    गिनती से परे हैं

    मैं जब सफदरजंग अस्पताल में थी
    तो मेरे साथ घटी घटना के विरोध में
    सुना संसद की सड़कों पर
    क्रोध उफन पड़ा था
    शीत की लहरें लू बन गई थीं
    उसकी तपन से देश के तथाकथित मसीहा
    सनाका खा गए थे
    दर्द में तड़पती हुई भी
    मैं भाई बहनों और माँओं के
    चेहरों पर तमतमाए
    काली के रौर्द्र रूप की कल्पना कर
    कुछ क्षण के लिए
    स्फुरित हो जाती थी
    लेकिन अब तो मैं वायु की तरंगों में
    मिल गई हूँ माँ,

    उन्हीं सड़कों को कल
    मेरे शुभेच्छुओं ने
    अपने आँसुओं के जल से सींच दिया था
    ठंढी हवाओं के साथ
    एक एक जन को छू कर
    उनके मन में उमड़ते दर्द को
    मैंने नहसूस किया
    कितनी पीड़ा में थे वे मेरे प्रति
    लेकिन माँ
    उनके भीतर उफनते क्रोध की धाराएँ भी
    उनके चित्त में चक्रवात बना रहीं थीं
    देखना माँ
    उनके क्रोध के चक्रवात में
    यह देश डूब न जाए.

    उत्तर देंहटाएं
  4. उसी के लहू से निर्मित है तुम्हारा अस्तित्व
    जिसे तुम मिटा डालना चाहते हो…
    वही तुम्हें बनाती है।
    सच है, अच्छी कविता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनिता जी,'मैं ही तुम्हें बनाती हूँ' कविता बहुत अच्छी रही।
    दुनिया के तथाकथित विद्वान, साधु-संत या कोई कुछ भी कहे नारी प्रथम ही रहेगी। उसके अस्तित्व को नकारा नहीं जाएगा। हां कभी-कभार उसे अपमानित कर धक्का जरूर दिया जाता है पर इस पर भी उसी को उपाय ढूंढ कर कडी तपस्या करनी पडेगी और ध्रुव ने जैसे अति उच्च न डिगने वाला स्थान पाया वैसे हासिल करना होगा। कविता पढ कर मैंने अपने आपको पुरुष होने के नाते नारी, मां, बहन... के सामने बौना महसूस किया।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
  6. dhanywaad vijay ji.....umeed hai sab badlega safar jari hai....
    anita

    उत्तर देंहटाएं

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