रविवार, 10 मार्च 2013

चंद्रेश कुमार छतलानी का आलेख - शिक्षा का परिवार पद्धति पर प्रभाव

चंद्रेश कुमार छतलानी


शिक्षा का परिवार पद्धति पर प्रभाव

गौतम बुद्ध ने एक बार कहा था कि, “मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है।“ – यह किसी भी शिक्षा का मूल है| जो शिक्षा मानवीय मूल्यों से जुड़ी हुई होती है, वह शिक्षा ही किसी व्यक्ति को शिक्षित करने में सक्षम होती है|

लेकिन शिक्षा का पश्चिमीकरण होने के पश्चात धीरे धीरे संयुक्त परिवारों का विघटन होने लगा और एकल परिवार की भावना विकसित होने लगी| फलस्वरूप परिवार के सदस्यों के बीच आपसी सामन्जस्य में भी कमी आना प्रारम्भ हो गया।

स्वामी विवेकानंद जी ने भारत की शक्ति के बारे में यह समझाया था कि “पूरा अस्तित्व एकात्म है, परमात्मा से जुड़ा हुआ है। भारत का यह आध्यात्मिक ज्ञान ही भारत की शक्ति है। भारत, जो कि पुण्यभूमि है, तपोभूमि है। दीन, पिछडे़, गरीब सभी में ईश्वर है। इनकी भूली हुई इस शक्ति को ह्रदय में जगाना है।“ स्वामी जी जीवन भर इस शक्ति को भारतीय ह्रदय में जगाने का प्रयत्न करते रहे| सभी के एक मानना, साथ रहना|

धर्मशास्त्र भी कहते हैं कि जो घर संयुक्त परिवार का पोषक नहीं है उसकी शांति और समृद्धि सिर्फ एक भ्रम है। घर है संयुक्त परिवार से। संयुक्त परिवार से घर में खुशहाली होती है।

संयुक्त परिवार की रक्षा होती है सम्मान, संयम और आपसी सहयोग से। संयुक्त परिवार से संयुक्त उर्जा का जन्म होता है, जो कि सुखवर्धक होती है। संयुक्त परिवार से कुटुम्ब बनते हैं। कुटुम्ब की भावना से कई तरह का दुख न्यूनतम होता है। इसे ही शास्त्रों में पितृयज्ञ की संज्ञा दी गयी है।

जब तक परिवार अपने दैनिक जीवन मे जीवन-मूल्यों, अर्थात सत्य, अहिंसा, समता, बंधुता, सदाचार, अनुशासन, संयम, कर्मशीलता, सहनशीलता, विनयशीलता, सादगी, ईमानदारी, धीरज, धर्म, नैतिकता तथा सन्तोष, को नहीं अपनाएंगे, तब तक परिवारों का सम्पूर्ण विकास नहीं हो सकता, यह ध्रुव सत्य है। उत्तम समाज के लिए उत्कृष्ट परिवारों की आवश्यकता है|

किसी भी शिक्षा का उद्देश्य उसके विषय में खाली मस्तिष्क को परिवर्तित कर खुला मस्तिष्क बनाना होता है लेकिन मानवीय मूल्यों के साथ और इसका प्रमुख लक्ष्य नए विचार उत्पन्न करना होना चाहिए, पुरानी पीढ़ियों की बातों को दोहराना नहीं| सहनशक्ति, गति, शक्ति, कौशल, और भावना के साथ आगे बढ़ते चले जाएँ तो शिक्षा परिवार पद्धति को उन्नत और सुदृढ़ बनायेगी अन्यथा विघटन तो सतत हो रहा है |

- चंद्रेश कुमार छतलानी

chandresh.chhatlani@gmail.com

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