रंग बरसे : सूरज पुरी की रचना - आज मनाना होली हमको

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आज मनाना होली हमको

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चलो हिमाला के आंगन में, आज मनाना होली हमको,

लिए निमंत्रण दौड रही है, ब्रम्हपुत्र और जमना- गंगा

हमें बुलाती संकेतों से, श्वेत, हिमावृत, कंचन- जंघा,

उठो बहाना शोणित हमको, चलो उडाना रोली हमको.

 

क्षुधा-विकल बोने आए हैं, बढो, खिला दे गोली इनको,

इन्हें बता दें मान अतिथिका, करना हमको आता है,

पंचशील देना आता है, रक्त बहाना भी आता है

उठॊ,सुना दें एक बार फ़िर, हर-हर, बम की बोली इनको.

 

होली है,शोणित के रंग से, कोई अभागा छूट न पाये

बंदूकें-पिचकारी भर लो, देख लो गोली, बारुद गोला,

टूट पडॊ मृत्यु बनकर के, दुश्मन कोई छूट ना जाये,

गुंजा दो पाताल-गगन में-जय शंकर, जय बम-बम भोला.

 

बर्फ़ समाधि दे दो इनको, जहाँ उठे थे, वहीं मसल दो,

सत्य, शांति के शत्रु हैं ये, रौंद दो इनके शीश कुचल दो.

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ये चाँद

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ये चाँद, मधु- विक्रेता बन, खोले बैठा है मधुशाला,

पूनम साकी-बाला बनकर,किरणॊं से ढाल रही हाला

ये किरण जहाँ, जिधर बिखरी,

मादक एक लहर उधर निखरी

क्या सागर-मन,क्या मरुभूमि,

सब कुछ कर डाला मतवाला.

ये चाँ, मधु विक्रेता बन, खोले बैठा है मधुशाला.

 

ये डगमग पवन, जिधर जाये,

सारा आलम बहका आये.

क्या ताड ,बबूल,क्या सोनजुही-

ले सभी खडॆ कर में प्याला

ये चाँद, मधु-विक्रेता बन,खोले बैठा है मधुशाला..

 

मंदिर के शिखर, भूले बोली,

मस्जिद की मीनारें डोलीं

क्या ईश-पुजारी,शेख- खुदा-

सबका दामन तर कर डाला.

ये चाँद, मधु-विक्रेता बन, खोले बैठा है मधुशाला.

 

इस शरद निशा को जो पी ले

वो उमर बहकती को जी ले

तुम भी पी लो दो-एक घूँट-

सुबह चुक जायेगी हाला .

ये चाँद, मधु-विक्रेता बन, खोले बैठा है मधुशाला.

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