मंगलवार, 12 मार्च 2013

प्रेम मंगल की कविता - संस्‍कृति का सत्‍कार-नारी

संस्‍कृति का सत्‍कार-नारी

सर्वप्रथम तुम बेटी हो,औ साथ में बहिन भी तुम हो।

बाद उसके तुम पत्‍नी,बहू,नंद और भाभी हो।

ममतामयी मां तुम हो।

बनती सास भी तुम हो।

मत भूलो जब बेटी हो तो पुरुष बाप और भाई है।

पत्‍नी,बहू,नंद, भाभी, हो तो पुरुष पति, ससुर और देवर है।

मां जब बनती हो तो पिता पुरुष ही होता है।

सास बन जब तुम जाती हो तो ससुर पुरुष ही होता है।

जीवन की यह सुंदर गाडी दो पह्‍यिो से चलती है।

दोनों पहिये सुदृड़ और अच्‍छे हो तभी गति से चलती है।

जीवन में सामंजस्‍य बनाना बहुत जरुरी होता है।

इक दूजे को दोषी कहकर घर कभी नहीं चलता है।

सहनशीलता,संवेदनशीलता दोनों को बहुत जरुरी है।

केवल शक्‍ति की धाक नहीं दोनों में समझ जरुरी है।

केवल चांदी के टुकडों से ग्रहस्‍थी नहीं कोई चलती है।

प्‍यार और तकरार मीठी से घर की देहली सुंदर बनती है।

संस्‍कारों से हटकर जिन्‍दगी कभी सफल नहीं होती है।

संस्‍कारों की नींव सदा घर से ही मिल सकती है।

ओढ़ के चादर पाश्चात्‍य संस्‍कृति की कृत्रिम शांति मिल सकती है।

मेल मिलाप के बिना जिन्‍दगी कभी नहीं अच्‍छी होती है।

नर के बिना नारी अधूरी है।

नारी के बिना नर अधूरा है।

फिर पल पल में क्‍यों यह होता रहता झगडा है।

गर नारी सौंदर्य मूर्ति है, नर भी शक्‍ति की मूरत है।

गर नारी में धरा सी सहन शक्‍ति है, तो नर गगन सी छाया है।

गर दोनों ही शक्‍ति बन जायें, धराशायी होना जरुरी है।

इसलिये इक दूजे को समझो प्‍यारों।

जीवन को स्‍वर्ग बनाओ तुम।

संस्‍कृति का सत्‍कार करो तुम।

जीवन अपना और सबका सार्थक बनाओ तुम

श्रीमती प्रेम मंगल

कार्यालयीन अधीक्षक

स्‍वामी विवेकानंद कॉलेज अॉफ इंजीनियरिंग इन्‍दौर

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