मंगलवार, 19 मार्च 2013

विजय शिंदे का आलेख - जबरदस्त लड़ाई के आसार

जबरदस्त लड़ाई के आसार

डॉ. विजय शिंदे

देश में स्थितियां बदल रही है, चिंता इस बात की होती है कि कहीं देश में अमीरों एवं गरीबों में संघर्ष तो छिड़ेगा नहीं ना? हाल ही में खबर पढ़ी कि पूना के एक अंग्रेजी स्कूल में गरीब बच्चे के शिक्षा अधिकार को छिनने की कोशिश हो गई। परंपरागत शिक्षा का महत्त्व कम हो रहा है और व्यावसायिक स्कूलों में प्रवेश के लिए गरीबों के पास पैसे नहीं है। सरकार शिक्षा का कानूनी अधिकार तो दे रही है पर व्यावसायिक मानसिकता नकार रही है। अतः लग रहा है वर्तमान में आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोग दलित माने जाएंगे और उसके शिक्षा अधिकार को नकारे जाने पर संघर्ष होगा। अर्थात् संकेत मिल रहे हैं, अमीरों एवं गरीबों के बीच संघर्ष के।

खबर अच्छी है,‘कचरा उठाने वाले बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहे हैं।’ गरीबों के सकारात्मक और सामाजिक परिवर्तन की ओर संकेत करने वाली खबर पर आप कहें कि भाई इतनी छोटी खबर चिंतन का विषय थोडे ही बनती है? पर मैं कहूं कि बनती है और इस पर चिंतन भी करना उतना ही जरूरी है। कारण कि यह खबर भविष्य के खतरों को आगाह कर रही है, संकेत दे रही है। भारत विकासशील राष्ट्र है और इसके कई हिस्से एवं आयाम गतिमयता के साथ विकसित हो रहे हैं, परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं; उसमें एक पहलू शिक्षा भी है। शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक बच्चे का मूलभूत अधिकार है, चाहे वह गरीब हो या अमीर हो। परंतु वर्तमान भारत में शिक्षा की जो स्थिति है उससे लग रहा है कि वह अमीरों एवं गरीबों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करेगी। दोनों के बीच में एक जबरदस्त लड़ाई ठनेगी। भविष्य के इस खतरे को देख कर उचित कदम अब उठाए नहीं गए तो लड़ाई से कोई भी अपने-आपको बचा नहीं पाएगा।

अंग्रेजी स्कूल चला रहे नियामकों और ट्रस्टियों का दृष्टिकोण पूर्णतः व्यापारिक है। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा, साक्षरता.... जैसे उद्देश्यों से स्कूल खोले नहीं। उन्हें किसी भी प्रकार का अनुदान मिलता नहीं। अपनी ओर से पैसा लगा कर वे व्यापार के नाते स्कूल खोल चुके हैं और पैसा कमाना उनका उद्देश्य होता है। वे भी इसको स्वीकारते हैं, नकारते नहीं। ऐसे स्कूलों के ट्रस्टी, बच्चे, बच्चों के माता-पिता और परिवार वाले भी व्यापारिक, धंधे वाली तथा बाजारीकरण की दृष्टि रखते हैं। यहां पर एक लंबी दौड़ होती है जो पैसों के बलबूते पर चल रही है। प्रत्येक रुपए का हिसाब-किताब देख कर आऊटपुट आंका जाता है। अतः बच्चों पर लगाए गए पैसों से वह सौ फीसदी मुनाफा कमाने की फिराक में होते हैं। यहां संस्कार, देशभक्ति, परंपरा और नैतिकता की पढाई कोई मायने नहीं रखती। उनका मानना होता है कि ऐसी पढाई महानगरपालिका, जिल्हा परिषद और सरकारी स्कूलों में होती है; हमारा यह काम नहीं। हमसे बच्चों के परिवार वाले रिजल्ट मांगते हैं। और रिजल्ट होता है ऐसे स्कूलों से पढे-लिखे बच्चे जब बाजार में खडे किए जाए तो उनका मूल्य क्या है? खैर मेरा उद्देश्य यहां अंग्रेजी स्कूलों का मूल्यांकन करना नहीं; उसके बहाने अमीरों और गरीबों के भविष्यकालीन लडाई की ओर आकृष्ट करना है।

‘राईट टू एज्युकेशन’ के तहत प्रायव्हेट अंग्रेजी स्कूलों में गरीब घरों के बच्चे अब प्रवेश कर रहे हैं। यहां मेरा अर्थ ‘गरीब ’से यह है कि आर्थिक दृष्टिकोण से गरीब, कमजोर, पीडित। कुछ साल पहले हां कुछ साल पहले हमारे देश ने एक जबरदस्त लडाई देखी अब भी उससे गुजर रहे हैं- जातीयता की। दलित, पिछडे, निम्न वर्गियों की सवर्णों के साथ। अपनी शूद्र जिंदगी को सतह से उठा कर मूल प्रवाह में आने के लिए लडी गई लड़ाई। इस लड़ाई में ताकतवर पक्ष ने कमजोर पक्ष को कितने सालों से गुलाम बनाए रखा, कितने अत्याचार किए यह आपने-हमने देखे। यह लडाई जाति और धर्म के आधार पर लडी गई। और इसमें दलितों ने अपने अधिकार पाने में सफलता भी हासिल की। पर आज अंग्रेजी स्कूलों में गरीब परिवार का बच्चा ‘राईट टू एज्यकेशन’ के तहत जब प्रवेश करता है तब वह चाहे सवर्ण हो चाहे शूद्र उसकी जाति कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती; आर्थिक दृष्टिकोणों से वह दलित ही होता है। ऐसे बच्चों के साथ अंग्रेजी स्कूलों के ट्रस्टियों, शिक्षकों एवं साथी अमीर बच्चों का व्यवहार कौनसा रहेगा? क्या इन्हें क्लास में अलग बेंच पर बिठा कर अछूत माना जाएगा? इनको हिकारत भरी नजरों से देखा जाएगा? उनके शिक्षा अधिकार को नकारा जाएगा? जहां ऐसे गरीब बच्चों को प्रवेश दिए जाएंगे वहां अमीर बाप अपने बच्चों का ऍडमिशन करेंगे?.... एक नहीं हजारों सवाल जो कुछ साल पहले दलितों ने देखे थे अपने पढाई एवं सामाजिक स्थान पाते वक्त।

बाजारीकरण के दौर में निर्मित यह सवाल हमारे सामने मुंह खोले खडे हैं। गरीब और अमीरों के बच्चे एक साथ जब अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ना शुरू करेंगे तो यह लड़ाई होनी ही है। बच्चे तो अनजान निष्पाप होते हैं। लड़ाई शुरू करेंगे स्कूलों के नियामक ट्रस्टी, और अमीर मां-बाप। इनके देखा-देखी यह भाव उतरेंगे बच्चों में और बच्चों का बर्ताव भी वैसे ही होगा। अमीर बाप का अमीर बेटा अपने आपको तीस-मार-खां समझेगा और गरीब बाप का गरीब बेटा पारिवारिक स्थिति एवं मानसिकता के कारण अपराधी महसूस करेगा। और यह अपराध भाव जब तक उसकी या उसके परिवार की चेतनाएं जागृत होती नहीं तब-तक बना रहेगा। गरीबों की चेतनाएं जब जागृत होगी तब अमीरों के साथ लड़ाई होगी, और यह लड़ाई जबरदस्त होने के आसार है। क्या समाज के शुभचिंतकों को यह सवाल आगाह और चिंतित कर रहा है? इन स्थितियों को टालने का क्या कोई रास्ता है? या मैं ही बेवजह चिंतित हो रहा हूं?

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.

ई-मेल drvtshinde@gmail.com

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  1. आपका सोंचना सही है। समाज दो धडों में बंटा है और दोनों धडों के बीच बढ़ता अंतर इसी तरफ इशारा कर रहा है।

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    1. बिल्कुल सही कहां आशिष जी समाज दो धडों में बंटा है। पर इस तरह से बटना हमार देश के लिए अच्छा नहीं है समय रहते शिक्षा नियामकों को उचित कदम उठाने चाहिए।

      हटाएं

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