रविवार, 24 मार्च 2013

मुरसलीन साकी की ग़ज़ल

मुरसलीन साकी

तस्‍वीर तेरी देखूं हर वक्‍त खयालों में।

उलझा ही मैं रहता हू बस तेरे सवालों में॥

 

जब शर्म से वो चेहरा आंचल में छुपाती है।

लगता है कमर कोई जैसे हो हिजाबों में॥

 

कुछ ऐसे तेरी यादें इस दिल में संजोता हूं।

रखता हूं दिये तेरे हर फूल किताबों में ॥

 

शायद है तेरी आमद इस खार गुलिस्‍तां में।

होने लगे चर्चे है फूलों में बहारों में॥

 

ये ‘उसका' करम है जो दीदार हुआ तेरा।

मांगा है तुझे मैंने हर रोज दुआओं में ॥

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मुरसलीन साकी

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

मो0 9044663196

पिनकोड 262701

jmursleen@gmail.com

कमर- चाँद हिजाब- पर्दा खार- कांटे गुलिस्‍तां- बाग

4 blogger-facebook:

  1. मुरसलीन साहब बहुत खूबसूरत गज़ल लिखी है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढिया गज़ल है, मुरसलीन भाई !!

    उत्तर देंहटाएं

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