मंगलवार, 26 मार्च 2013

मोतीलाल की कविता - यंत्रणा

कविता - यंत्रणा

हमने कई-कई नगर बसाते हुए
महानगरीय चकाचौंध बुनते रहे
और ढालते रहे
अपने कस्बों को
नगरों की सुरत में
और नगरों को
महानगरों की दौड़ में ठेलते रहे ।

जीते रहे किसी तरह
बंद फ्लेटों के पिंजड़ों में
चैन से खड़े होने की चाह
टूटती रही इस भीड़ में
और अपनी आवाज
गुम होते रहे
अट्टालिकाओं के जंगल में ।

खोजते रहे
इन कंक्रीट के जंगलों में
एक भरा-पूरा मानव
लेकिन एक भी नहीं मिला
जो कुछ मिला
भीतर से टूटा कंकाल निकला ।

सराहते रहे
महानगरीय जीवन की धुन
लेकिन नहीं सोचा
सजाते रहने की चाह
अपने गाँव के खेतों को
हरायाते फसलों के बीच
गूंजते-झूमते
गाँव वधू के मधुर संगीत को ।

हाँ नहीं सजाये हमने
भरा-पूरा मानव
कि कहीं खंडित न हो जाए
और बदल न दिया जाए
कोई गाँव नगरों के शक्ल में ।
---
* मोतीलाल/राउरकेला
* 09931346271

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