मोतीलाल की कविता - यंत्रणा

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

कविता - यंत्रणा

हमने कई-कई नगर बसाते हुए
महानगरीय चकाचौंध बुनते रहे
और ढालते रहे
अपने कस्बों को
नगरों की सुरत में
और नगरों को
महानगरों की दौड़ में ठेलते रहे ।

जीते रहे किसी तरह
बंद फ्लेटों के पिंजड़ों में
चैन से खड़े होने की चाह
टूटती रही इस भीड़ में
और अपनी आवाज
गुम होते रहे
अट्टालिकाओं के जंगल में ।

खोजते रहे
इन कंक्रीट के जंगलों में
एक भरा-पूरा मानव
लेकिन एक भी नहीं मिला
जो कुछ मिला
भीतर से टूटा कंकाल निकला ।

सराहते रहे
महानगरीय जीवन की धुन
लेकिन नहीं सोचा
सजाते रहने की चाह
अपने गाँव के खेतों को
हरायाते फसलों के बीच
गूंजते-झूमते
गाँव वधू के मधुर संगीत को ।

हाँ नहीं सजाये हमने
भरा-पूरा मानव
कि कहीं खंडित न हो जाए
और बदल न दिया जाए
कोई गाँव नगरों के शक्ल में ।
---
* मोतीलाल/राउरकेला
* 09931346271

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "मोतीलाल की कविता - यंत्रणा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.