रविवार, 10 मार्च 2013

कोनिक दोशी की कविता - खोया बचपन

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खोया बचपन

कुछ समय पहले जिस हृदय में 

चंचलता की लहरें तूफान मचाती थीं,

आज वही हृदय सागर- सा गंभीर पड़ा है। 

जिस मन पर लगे थे पंख 

चाँद तारों तक उड़ जाने के लिए,

वो मन, लाचार, कटे पंखों के साथ बैठा है।

जिन आँखों की पलकों पर 

सपने हजारों सवार होते थे,

आज वो पलकें बंद नहीं हो रहीं ।

सिसकियों की आवाज़ कम नहीं हो रही 

बंद हो गए वो कान जो इस दर्द को सुनते थे।

सुनकर उसके दर्द को वे भी खूब रोते थे।

हृदय पर क्रूरता का पत्थर गिरा था।

जब इन काले हाथों ने उन मासूम हाथों से 

छीन  ली थी कलम और एक हथौड़ा हाथ में धरा था।   

दब गया था बचपन उन जिम्मेदारियों के नीचे।

छिप गई वो मासूमियत खेत के खलिहानों के पीछे।

पूछा उस बाल मज़दूर से किसी ने 

पकड़कर उसके हाथों को-

क्या तुम बच्चे हो?

सोचने लगा वो बाल मज़दूर 

जो भूल गया था अपना बचपन।

रुका वो कई पलों तक फिर बोला अपनी आवाज़ में

जो दब गई थी समय की मार से।

आवाज़ में बहुत दर्द था, न जाने कौन-सा भय था।

बोला आवाज़ को धीमी कर-

क्या करोगे जानकार?

                             -कोनिक दोशी

2 blogger-facebook:

  1. कोनिक दोशी जी,
    'खोया बचपन' कविता पढ कर बहुत दुःख, पीडा हुई। भारत के सुंदर चेहरे पर बाल मजदूरी काला धब्बा है, उसका दूर होना भी उतना ही मुश्किल। 'क्या करोगे जानकार?' यह कविता की अंतिम पंक्तियां बाल मजदूरों की मजबूरी और निराशा को बयां करती है। इस स्थिति को स्वीकारना मुश्किल है पर क्या करे वास्तविकता जो ठहरी।

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